भारत में इलेक्ट्रिक कारों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, लेकिन आज भी बहुत से लोगों के मन में एक सवाल रहता है कि आखिर EV इतनी ज्यादा एफिशिएंट कैसे होती है. हाल ही में एक टेस्ट के दौरान एक इलेक्ट्रिक कार ने पेट्रोल के बराबर ऊर्जा पर करीब 89 किलोमीटर चलकर सभी को चौंका दिया. यह आंकड़ा किसी पेट्रोल, डीजल, CNG या यहां तक कि मजबूत हाइब्रिड कार के लिए भी लगभग असंभव माना जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर EV के पीछे ऐसा कौन-सा विज्ञान काम करता है जो उसे पारंपरिक इंजन वाली कारों से कई गुना ज्यादा एफिशिएंट बना देता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने इसपर एक रोचक रिपोर्ट प्रकाशित की है.
एक लीटर पेट्रोल में कितनी ऊर्जा होती है?
ऊर्जा के हिसाब से देखें तो एक लीटर पेट्रोल में लगभग 8.9 kWh ऊर्जा मौजूद होती है. आमतौर पर जब कोई पेट्रोल कार सड़क पर चलती है तो इस ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इंजन के अंदर ही गर्मी, घर्षण और आवाज के रूप में बर्बाद हो जाता है. यही वजह है कि कई पेट्रोल कारें शहर के ट्रैफिक में 12 से 14 किलोमीटर प्रति लीटर के आसपास का माइलेज देती हैं.
दूसरी तरफ इलेक्ट्रिक कारें इसी ऊर्जा का कहीं बेहतर इस्तेमाल करती हैं. एक हालिया परीक्षण में देखा गया कि एक EV ने एक kWh बिजली में लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय की. अगर इसी गणना को पेट्रोल की ऊर्जा के बराबर रखा जाए तो यह आंकड़ा करीब 89 किलोमीटर प्रति लीटर के बराबर बैठता है.
पेट्रोल इंजन में कहां बर्बाद होती है ऊर्जा?
पारंपरिक इंटरनल कम्बशन इंजन यानी ICE तकनीक पिछले कई दशकों से विकसित हो रही है, लेकिन इसके बावजूद इसकी ऊर्जा दक्षता सीमित है. इंजन में पिस्टन, वाल्व, गियरबॉक्स, कूलिंग सिस्टम और कई मैकेनिकल पार्ट्स होते हैं. हर चरण में ऊर्जा का कुछ हिस्सा नष्ट होता रहता है.
ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ी कार भी लगातार ईंधन खर्च करती रहती है. यही कारण है कि पेट्रोल इंजन आमतौर पर अपनी कुल ऊर्जा का केवल 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा ही पहियों तक पहुंचा पाते हैं, जबकि बाकी ऊर्जा बर्बाद हो जाती है.
EV ट्रैफिक में और ज्यादा एफिशिएंट क्यों होती है?
जहां भारी ट्रैफिक पेट्रोल और डीजल कारों के माइलेज को नुकसान पहुंचाता है, वहीं EV के लिए यह स्थिति फायदे की साबित हो सकती है. इलेक्ट्रिक कारों में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक होती है. जब ड्राइवर एक्सीलेटर छोड़ता है या ब्रेक लगाता है, तब मोटर जेनरेटर की तरह काम करने लगती है और कुछ ऊर्जा वापस बैटरी में जमा कर देती है.
यही वजह है कि बार-बार रुकने और चलने वाले शहर के ट्रैफिक में भी कई EV अपेक्षाकृत बेहतर एफिशिएंसी हासिल कर लेती हैं. पहाड़ी रास्तों से नीचे उतरते समय भी बैटरी में कुछ प्रतिशत चार्ज वापस जुड़ सकता है.
EV बैटरी और पर्यावरण का गणित
EV को लेकर अक्सर यह बहस होती है कि बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाले खनिजों का क्या होगा. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यहां एक बड़ा अंतर समझना जरूरी है. पेट्रोल एक बार जलने के बाद हमेशा के लिए खत्म हो जाता है, जबकि EV बैटरी के अंदर मौजूद कई महत्वपूर्ण पदार्थों को दोबारा रिकवर किया जा सकता है.
आधुनिक बैटरी रीसाइक्लिंग तकनीक के जरिये लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण तत्वों का बड़ा हिस्सा वापस प्राप्त किया जा सकता है. इससे भविष्य में नई बैटरियां तैयार करने में मदद मिलती है और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो पाता है.
EV और ICE में किसे चुनना चाहिए?
कार खरीदते समय केवल माइलेज ही एकमात्र पैमाना नहीं होता. चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, ड्राइविंग पैटर्न, बजट, बिजली की उपलब्धता और रीसेल वैल्यू जैसे कई पहलू भी महत्वपूर्ण हैं. फिर भी ऊर्जा दक्षता के मामले में EV का पलड़ा स्पष्ट रूप से भारी दिखाई देता है.
यही कारण है कि दुनिया भर में ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रही है. आने वाले वर्षों में बेहतर बैटरी तकनीक और चार्जिंग नेटवर्क के साथ EV और भी ज्यादा लोकप्रिय हो सकती हैं.
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