पिछले 24–48 घंटे में यूरोप से आई खबरों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की तरफ बढ़ रही है?
फ्रांस रूस के बढ़ते ‘हाइब्रिड खतरे’ की बात कर रहा है. पोलैंड रूस के संभावित ड्रोन और मिसाइल हमलों को लेकर चेतावनी दे रहा है. ब्रिटेन अपने नागरिकों को आपात स्थिति के लिए जरूरी सामान रखने की तैयारी कर रहा है. स्विट्जरलैंड ने भी अपनी सुरक्षा रणनीति को नए सिरे से मजबूत किया है.
इसी बीच अमेरिका ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने वाला नया कानून लागू किया है और Greenland को लेकर Washington और Copenhagen के बीच एक बड़ा सुरक्षा समझौता सामने आया है.
तो क्या ये सब एक ही बड़ी तस्वीर के टुकड़े हैं?
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सबसे पहले सवाल: क्या रूस NATO पर हमला करने वाला है?
अभी ऐसा कोई सार्वजनिक प्रमाण नहीं है कि रूस ने NATO देश पर पूर्ण पैमाने के हमले का फैसला कर लिया है.
लेकिन यूरोप की चिंता पूरी तरह काल्पनिक भी नहीं है.
पोलैंड के प्रधानमंत्री Donald Tusk ने चेतावनी दी है कि रूस NATO देशों के खिलाफ ड्रोन या रॉकेट आधारित ‘हाइब्रिड’ हमले कर सकता है. फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने भी कहा है कि यूरोप के खिलाफ रूसी हाइब्रिड खतरा बढ़ रहा है.
यानी फिलहाल सबसे बड़ा खतरा World War 3 नहीं, बल्कि छोटे-छोटे हमलों से बड़े सैन्य टकराव की तरफ बढ़ने का खतरा है.
Macron ने ऐसा क्या कहा?
Macron ने फ्रांस की critical infrastructure को रूसी साइबर और ड्रोन हमलों से बचाने के लिए नई योजना बनाने का निर्देश दिया है.
फ्रांस का आरोप है कि रूस यूरोप में cyberattacks, sabotage और drone operations के जरिए यूक्रेन के लिए यूरोपीय समर्थन को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है.
यही वजह है कि यूरोपीय देशों की भाषा अब पहले से ज्यादा सख्त सुनाई दे रही है.
लेकिन ध्यान रहे—
किसी देश का युद्ध की तैयारी बढ़ाना और युद्ध शुरू करना—दो अलग बातें हैं.
ब्रिटेन लोगों से घर में सामान रखने को क्यों कह रहा है?
ब्रिटेन में सरकार national resilience campaign की तैयारी कर रही है.
लोगों को संभावित emergency situations के लिए भोजन, पानी, power bank, torch, radio और first-aid जैसी जरूरी चीजें रखने की सलाह दी जा रही है.
इसमें केवल युद्ध नहीं, बल्कि cyberattack, power cuts, extreme weather और दूसरी national emergencies भी शामिल हैं.
इसलिए इसे सीधे 'Britain युद्ध की तैयारी कर रहा है' कहना सही नहीं होगा.
लेकिन संदेश जरूर महत्वपूर्ण है—
यूरोप अब नागरिकों को भी बड़े संकटों के लिए psychologically और practically तैयार कर रहा है.
Switzerland भी क्यों बदल रहा है?
स्विट्जरलैंड की पहचान लंबे समय से neutrality से जुड़ी रही है.
लेकिन 18 सितंबर को Swiss Federal Council ने 2026 Security Policy Strategy को मंजूरी दी.
इसमें resilience, critical infrastructure की सुरक्षा, resistance capabilities और defence capabilities को मजबूत करने पर जोर है. सरकार ने Russia-Ukraine war और hybrid threats को बदलते सुरक्षा माहौल की बड़ी वजहों में शामिल किया है.
इसका मतलब यह नहीं कि Switzerland NATO में शामिल हो गया.
लेकिन एक बात साफ है—
Europe का security environment इतना बदल गया है कि neutral Switzerland भी अपनी तैयारी बढ़ा रहा है.
Putin क्या कह रहे हैं?
यहां कहानी का दूसरा पक्ष भी समझना जरूरी है.
Putin ने पहले ही कहा है कि Russia की European Union पर हमला करने की कोई योजना नहीं है.
रूसी पक्ष का कहना है कि ‘Russian threat’ की चर्चा का इस्तेमाल Europe द्वारा defence spending बढ़ाने और Ukraine को समर्थन देने के लिए किया जा रहा है.
यानी Moscow और European capitals एक-दूसरे के इरादों को लेकर गहरे अविश्वास में हैं.
और यही किसी भी बड़ी geopolitical crisis को खतरनाक बनाता है.
फिर अमेरिका ने Russia पर नया आर्थिक हथियार क्यों चलाया?
18 सितंबर को Donald Trump ने Russia sanctions legislation पर हस्ताक्षर किए.
इस कानून से अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% तक tariff लगाने की शक्ति मिलती है जो बड़े पैमाने पर Russian oil और gas खरीदते हैं.
भारत और China इस बहस के केंद्र में हैं क्योंकि दोनों Russia से बड़ी मात्रा में energy खरीदते हैं.
लेकिन एक जरूरी बात—
100% tariff अभी अपने-आप लागू नहीं हुआ है.
कानून Trump को इसे लगाने की शक्ति देता है. इसका इस्तेमाल कब और किस देश पर किया जाएगा, यह अलग राजनीतिक फैसला है.
भारत के लिए खतरा क्या है?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है.
अगर अमेरिका Russian oil खरीदने वाले देशों पर भारी tariff लागू करता है, तो भारत के सामने तीन मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं—
पहली—तेल की कीमत.
Russia से सस्ता crude मिलने का फायदा कम हो सकता है.
दूसरी—भारत-अमेरिका trade.
भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण export market है. नए tariffs व्यापार पर दबाव डाल सकते हैं.
तीसरी—global energy market.
अगर Russian oil की बड़ी मात्रा international market से हटती है, तो crude prices पर ऊपर की तरफ दबाव बन सकता है.
और फिर आया Greenland वाला मोड़
इसी बीच अमेरिका और Denmark के बीच Greenland को लेकर एक बड़ा security agreement सामने आया. Trump ने कहा कि अमेरिका को Greenland की security पर permanent control मिलेगा.
लेकिन Denmark और Greenland ने तुरंत स्पष्ट किया कि Greenland की sovereignty और self-determination बरकरार रहेगी. समझौते के तहत अमेरिका वहां अपनी military presence बढ़ा सकेगा और Russia तथा China जैसे non-NATO देशों की military presence को रोकने की दिशा में व्यवस्था होगी.
इसलिए इसे 'अमेरिका ने Greenland अपने कब्जे में ले लिया' कहना गलत होगा. लेकिन strategic message बहुत बड़ा है.
Greenland इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
Greenland सिर्फ बर्फ का एक विशाल द्वीप नहीं है. यह Arctic में स्थित है. इसके आसपास—
महत्वपूर्ण shipping routes
missile-warning systems
military bases
rare-earth और दूसरे strategic minerals
Russia और North America के बीच महत्वपूर्ण geographical position
मौजूद हैं.
अमेरिका पहले से Greenland में Pituffik Space Base संचालित करता है. इसलिए Greenland पर अमेरिकी military presence बढ़ना Arctic power competition को और महत्वपूर्ण बना सकता है.
क्या ये तीनों घटनाएं जुड़ी हुई हैं?
अब तस्वीर को एक साथ देखिए.
एक तरफ—
Russia के खिलाफ Europe की security warnings.
दूसरी तरफ—
America का Moscow पर economic pressure.
तीसरी तरफ—
Arctic में US military presence को मजबूत करने वाला Greenland agreement.
इन तीनों को देखकर यह जरूर लगता है कि US-Europe-Russia strategic competition तेजी से कठोर हो रही है.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि NATO और Russia के बीच युद्ध शुरू हो चुका है.
असली खतरा कहाँ है?
सबसे बड़ा खतरा शायद किसी planned World War से ज्यादा miscalculation है.
मान लीजिए—
एक Russian drone NATO territory में गिरता है.
या कोई missile सीमा पार कर जाती है.
या cyberattack से किसी महत्वपूर्ण infrastructure को भारी नुकसान होता है.
या जवाबी कार्रवाई में कोई सैनिक मारा जाता है.
फिर दूसरा पक्ष जवाब देता है.
फिर पहला पक्ष और बड़ा जवाब देता है.
यही escalation धीरे-धीरे उस सीमा तक पहुंच सकती है जहां दोनों पक्ष पीछे हटना मुश्किल समझें. युद्ध हमेशा घोषणा से शुरू नहीं होता. कभी-कभी वह घटनाओं की एक श्रृंखला से शुरू होता है.
क्या World War 3 अभी शुरू हो रही है?
सीधा जवाब—नहीं.
अभी NATO और Russia के बीच औपचारिक युद्ध नहीं चल रहा है.
लेकिन दूसरा जवाब ज्यादा महत्वपूर्ण है—
World War 3 का risk पहले से ज्यादा दिखाई दे रहा है.
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