जर्मनी से अपने 5000 सैनिक वापस बुलाएगा अमेरिका, ईरान युद्ध की वजह से ट्रंप और यूरोप के बीच बढ़ी दरार

US Troops Germany: अमेरिका यूरोप में अपने सैनिकों की सबसे बड़ी तैनाती वाले देश जर्मनी से 5000 जवानों को वापस बुलाएगा. यह फैसला जर्मन चांसलर के उस कमेंट के बाद लिया गया है, जिसमें उन्होंने ईरान युद्ध में अमेरिका के अपमानित होने वाली टिप्पणी की थी.

US Troops Germany: अमेरिका ने नाटो सहयोगी देश जर्मनी से अपने 5,000 सैनिक वापस बुलाएगा. यह घोषणा अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने शुक्रवार को घोषणा की. अमेरिका के इस कदम से ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूरोप के बीच बढ़ता मतभेद साफ दिख रहा है. पेंटागन ने कहा कि सैनिकों की यह वापसी अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी.  इससे यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 2022 से पहले के स्तर के करीब आ जाएगी. 

जर्मनी में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी काफी व्यापक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. यूरोप में आमतौर पर 80,000-100,000 अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं. वर्तमान में जर्मनी में लगभग 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. यह यूरोपीय महाद्वीप पर अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य मौजूदगी है. अमेरिकी सैनिकों के साथ जर्मनी में कई प्रमुख अमेरिकी ठिकाने भी सक्रिय हैं. रामस्टीन एयर बेस यूरोप में अमेरिकी वायु सेना का सबसे बड़ा केंद्र है. स्टटगार्ट में स्थित पैच बैरक्स में यूएस यूरोपियन कमांड और यूएस अफ्रीका कमांड के मुख्यालय हैं, जबकि विस्बाडेन अमेरिकी सेना का यूरोप और अफ्रीका की कमान का केंद्र है. 

ग्राफेनवोहर और विल्सेक क्षेत्र यूरोप के सबसे बड़े सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्रों में हैं. लैंडस्टुहल रीजनल मेडिकल सेंटर अमेरिका के बाहर स्थित सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य अस्पताल है. कैसरस्लॉटर्न में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य समुदाय मौजूद है, जहां कई बैरक्स स्थित हैं. इसके अलावा होहेनफेल्स में जॉइंट मल्टीनेशनल रेडीनेस सेंटर, स्पैंगडाहलेम एयर बेस और अनसबाख जैसे अन्य महत्वपूर्ण अमेरिकी ठिकाने जर्मनी में हैं.

क्यों बढ़ा अमेरिका और यूरोप का रार?

फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस यूक्रेन युद्ध में हाल के दिनों में बातचीत का सिलसिला बढ़ने के बाद से यूरोप सबसे पहले अमेरिकी सैनिकों की ही वापसी की उम्मीद जता रहा था. यह फैसला यूरोपीय नेताओं के साथ ट्रंप के बढ़ते तनाव के बाद आया है. खासकर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के उस बयान की वजह से, जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका अपमानित हो रहा है. इस टिप्पणी पर अमेरिका ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा था कि जर्मन चांसलर को ईरान मामले की जगह यूक्रेन युद्ध समाप्त करने और अपने टूटे हुए देश को संभालने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह निर्णय कुछ हद तक यूरोप द्वारा अमेरिकी अभियानों को पर्याप्त समर्थन न देने की वजह से लिया गया है. अधिकारी ने कहा कि सहयोगियों की समर्थन देने में विफलता और उनकी बयानबाजी से प्रशासन नाराज है. इसके साथ ही हालिया टिप्पणियों को भी उन्होंने अनुचित और असहयोगी बताया.

अमेरिका का तनाव केवल जर्मनी तक सीमित नहीं है. ट्रंप का इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और स्पेन के नेतृत्व के साथ भी टकराव हुआ है, क्योंकि उन्होंने ईरान के खिलाफ अभियानों का समर्थन करने में हिचक दिखाई, जिसमें बेस और हवाई क्षेत्र तक पहुंच देने से इनकार भी शामिल है. इसके साथ ही स्पेन ने भी ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका का साथ देने से मना कर दिया था.

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ट्रंप का आरोप यूरोप-नाटो का सहयोग नहीं मिला

ट्रंप पहले भी यूरोपीय साझेदारों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का लाभ उठाते हैं, लेकिन पर्याप्त योगदान नहीं देते. खासतौर पर ईरान संघर्ष के दौरान महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा के प्रयासों में यह मुद्दा उठाया गया. उन्होंने नाटो सहयोगियों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने श्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक अहम मार्ग- होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने में मदद के लिए नौसेना तैनात नहीं की.

सैनिकों को हटाने का यह कदम ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर और दबाव डाल सकता है. अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाए. ट्रंप यूरोप से नाटो में अधिक आर्थिक खर्च करने की बात कहते रहे हैं. इसके अलावा यूक्रेन युद्ध को रोकने की अमेरिका की कोशिश और ग्रीनलैंड को लेकर भी यूरोप और और अमेरिका के बीच मतभेद सामने आए थे. अब ईरान युद्ध को लेकर मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं.

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By Anant narayan shukla

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