US Israel Attack on Iran: अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर 28 फरवरी 2026 को ईरान के ऊपर हमला किया गया, जिसकी वजह होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी का संकट पैदा हो गया. जब इसकी आग पूरी दुनिया में महसूस की गई, तो तीनों पक्षों के बीच 8 सीजफायर पर सहमति बनी, जो 8 अप्रैल से चल रहा है. हालांकि, यूएस और इजरायल के बीच ईरान को लेकर सैन्य गतिविधियां एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही हैं. अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के सुरक्षा और सैन्य अधिकारी संभावित ऑपरेशन की तैयारी में जुटे हैं और ईरान के अहम ठिकानों की पहचान की जा रही है.
टाइम्स ऑफ इजरायल ने द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि दोनों देश अगले सप्ताह तक कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहने की कोशिश कर रहे हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने मिडिल ईस्ट के दो पूर्व अधिकारियों के हवाले से यह रिपोर्ट दी है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैन्य अभियान के एक संभावित विकल्प में विशेष कमांडो दस्तों को जमीन पर उतारना शामिल हो सकता है, ताकि मलबे के नीचे दबे परमाणु सामग्री को बाहर निकाला जा सके. रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि संभावित लक्ष्यों की सूची में परमाणु कार्यक्रम से जुड़े प्रतिष्ठान, मिसाइल निर्माण केंद्र, सैन्य ठिकाने और कमांड कंट्रोल फैसिलिटी शामिल हो सकती हैं.
अमेरिका और इजरायल के अपने-अपने हित
बताया जा रहा है कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड और इजरायली रक्षा अधिकारियों के बीच लगातार उच्चस्तरीय बैठकों का दौर चल रहा है. इजरायल का मानना है कि ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को सीमित करने के लिए दबाव बनाए रखना जरूरी है. वहीं अमेरिका भी पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों और सहयोगी देशों की सुरक्षा को लेकर सतर्क नजर आ रहा है. दोनों देशों का आकलन है कि यदि ईरान को समय मिला तो वह अपनी सैन्य क्षमताओं को और मजबूत कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ने की आशंका है.
हमले के दौरान क्या किया जा सकता है?
सैन्य अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि इस तरह का अभियान बेहद जटिल और जोखिमभरा होगा. इसके लिए ऑपरेशन वाले इलाके के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाने हेतु हजारों सैनिकों की जरूरत पड़ेगी और ईरानी जमीनी बलों के साथ सीधा संघर्ष होने की भी संभावना रहेगी. ऐसे अभियान में भारी संख्या में हताहत होने का खतरा बताया गया है. अधिकारियों के मुताबिक, सैनिकों का इस्तेमाल फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर नियंत्रण हासिल करने के लिए भी किया जा सकता है.
कूटनीति फेल- वैश्विक संकट बरकरार
इस बीच अप्रैल में लागू हुआ संघर्षविराम भी बेहद नाजुक स्थिति में बताया जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ रही हैं. पाकिस्तान जैसे देशों द्वारा कि जा रहीं, क्षेत्रीय मध्यस्थता की कोशिशें भी अब तक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी हैं.
तनाव की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य बना हुआ है. यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वैश्विक तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग के रूप में खुला रखने पर जोर दे रहे हैं.
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चीन से लौटे ट्रंप ने ईरान पर फिर दिया कड़ा बयान
हालांकि अभी तक अमेरिका या इजरायल की ओर से किसी संभावित सैन्य अभियान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन बढ़ती सैन्य तैयारियां और कड़े बयान यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय तनाव और गहरा सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन से अपनी यात्रा समाप्त करके लौट चुके हैं. उन्होंने यह बयान भी दिया कि चीन/शी जिनपिंग भी चाहते हैं कि ईरान परमाणु ताकत न बने. ऐसे में आने वाले समय में ट्रंप की ओर से तीखे बयान आ सकते हैं और सैन्य हमले की इजाजत भी जा सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आने की आशंका है, जिसका प्रभाव भारत समेत कई आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है. भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी अहम है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है.
