जैसा कि हमने Part 1 में समझा, आदिवासी कला और सांस्कृतिक विरासत का डिजिटल दस्तावेजीकरण पहली नजर में संरक्षण का प्रयास दिखाई देता है.
किसी पारंपरिक चित्र, नृत्य, अनुष्ठान या मौखिक परंपरा को डिजिटल रूप में सुरक्षित करने से वह आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकती है.
लेकिन असली सवाल केवल संरक्षण का नहीं, बल्कि अधिकार और नियंत्रण का है.
आदिवासी कला अक्सर किसी एक व्यक्ति की निजी रचना नहीं होती. वह समुदाय की सामूहिक स्मृति, परंपरा और पहचान से जुड़ी होती है. इसलिए जब ऐसी कला को बिना समुदाय की स्पष्ट अनुमति के स्कैन करके डिजिटल संग्रह, वेबसाइट या व्यावसायिक प्लेटफॉर्म पर डाल दिया जाता है, तो संरक्षण और ‘डिजिटल एक्सट्रैक्शन’ के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है.
समुदाय की कला डिजिटल दुनिया में तो पहुंच जाती है, लेकिन समुदाय के पास यह तय करने का अधिकार नहीं रहता कि उसका इस्तेमाल कौन करेगा, किस संदर्भ में होगा और उससे होने वाले लाभ में उसकी हिस्सेदारी क्या होगी. यहीं भारतीय कॉपीराइट कानून... पूरा लेख यहां पढ़ें: Tribalpedia: आदिवासी कला डिजिटल हुई, लेकिन अधिकार किसका हुआ? Part 1
‘डेटा कॉलोनियलिज्म’ का नया रूप?
औपनिवेशिक दौर में बाहरी शक्तियां संसाधन ले जाती थीं.
आज डिजिटल दुनिया में संसाधन का रूप बदल गया है. वह जमीन, जंगल या खनिज ही नहीं, बल्कि डेटा और सांस्कृतिक ज्ञान भी हो सकता है.
आदिवासी कला को बाहर से आकर इकट्ठा करना, उसे वर्गीकृत करना, डिजिटल संग्रह बनाना और फिर उसके इस्तेमाल के नियम खुद तय करना- इसे स्रोत सामग्री ‘Data Colonialism’ के संदर्भ में देखती है.
इसमें जरूरी नहीं कि कोई प्रत्यक्ष बल प्रयोग हो. कई बार केवल कानूनी चुप्पी ही पर्याप्त होती है.
यहां एक और रूपक समझना उपयोगी है.
अगर किसी समुदाय की संस्कृति एक नदी है, तो डिजिटाइजेशन उसका नक्शा बनाने जैसा हो सकता है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब नक्शा बनाने वाला व्यक्ति यह भी तय करने लगे कि नदी का पानी कौन ले सकता है.
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संस्कृति संग्रहालय की वस्तु नहीं, जीवित परंपरा है
आदिवासी कला को केवल पुराने चित्रों या संग्रहालय की वस्तुओं के रूप में देखना भी समस्या है. वह आज भी कई समुदायों के जीवन, त्योहारों, विश्वासों और सामाजिक संबंधों का हिस्सा है.
सुप्रीम कोर्ट ने Nandini Sundar v. State of Chhattisgarh में आदिवासी गरिमा और जीवन-पद्धति की संवैधानिक सुरक्षा पर जोर दिया था. इसी तर्क को डिजिटल संस्कृति तक बढ़ाने पर सवाल उठता है कि क्या किसी जीवित संस्कृति को उसकी इच्छा के विरुद्ध सिर्फ डिजिटल रिकॉर्ड में बदल देना उसकी स्वायत्तता को कमजोर करता है?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आदिवासी समुदायों के सांस्कृतिक अधिकारों को अधिक महत्व मिला है. संयुक्त राष्ट्र की Declaration on the Rights of Indigenous Peoples सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान को बनाए रखने और नियंत्रित करने के अधिकार को मान्यता देती है. लेकिन भारत में कला के डिजिटलीकरण के लिए सहमति, श्रेय और लाभ-साझेदारी को लेकर स्पष्ट कानूनी ढांचा अभी भी एक बड़ी जरूरत के रूप में सामने आता है.
समाधान क्या हो सकता है?
सबसे जरूरी बदलाव यह होगा कि आदिवासी समुदायों को ‘अध्ययन की वस्तु’ नहीं, ‘अधिकार रखने वाले सांस्कृतिक संरक्षक’ के रूप में देखा जाए.
इसके लिए कम से कम तीन चीजें जरूरी हैं-
- पूर्व सूचित सहमति. किसी कला या सांस्कृतिक सामग्री को डिजिटल करने से पहले संबंधित समुदाय की सहमति ली जाए.
- सामुदायिक श्रेय. कला को किसी अज्ञात या लोक कला के नाम से छोड़ने के बजाय संबंधित समुदाय और उसकी परंपरा को स्पष्ट पहचान मिले
- लाभ-साझेदारी. अगर डिजिटल संग्रह से व्यावसायिक लाभ होता है, तो उसका उचित हिस्सा समुदाय तक पहुंचे.
स्रोत सामग्री सामुदायिक अखंडता की रक्षा के लिए नैतिक अधिकारों की व्यापक व्याख्या और नए विधायी ढांचे की जरूरत पर भी जोर देती है.
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असली सवाल: डिजिटल युग में संस्कृति का मालिक कौन?
डिजिटाइजेशन अपने आप में समस्या नहीं है.
इसके जरिए बहुत-सी विलुप्त होती परंपराओं को बचाया जा सकता है.
दूर-दराज के गांवों की कला दुनिया तक पहुंच सकती है और आने वाली पीढ़ियां अपने सांस्कृतिक अतीत को देख सकती हैं.
लेकिन संरक्षण और अधिकार साथ-साथ चलें, तभी यह प्रक्रिया न्यायपूर्ण होगी.
किसी आदिवासी चित्र को डिजिटल बनाना ऐसा नहीं होना चाहिए कि चित्र बच जाए और समुदाय पीछे छूट जाए.
अंततः सवाल यह नहीं है कि आदिवासी कला को डिजिटल संग्रह में रखा जाए या नहीं. असली सवाल यह है कि किसकी अनुमति से, किसके नियंत्रण में और किसके लाभ के लिए उसे डिजिटल बनाया जा रहा है.
अगर इन सवालों का जवाब समुदाय के पास नहीं है, तो संरक्षण की कहानी अधूरी है. और अगर जवाब समुदाय के पास है, तो डिजिटल तकनीक सांस्कृतिक कब्जे का नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जीवन का माध्यम बन सकती है.
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