नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में बताया कि 1816 में हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि की मूल हस्ताक्षरित प्रति फिलहाल सरकार को नहीं मिल रही है. एनडीटीवी के मुताबिक, यह वही दस्तावेज था जिससे भारत- नेपाल की सीमा के बंटवारे का साक्ष्य अंकित है. हालांकि, नेपाल सरकार यह भी पुष्टि नहीं कर सकी है कि मूल दस्तावेज अभी उसके पास मौजूद है या नहीं. लेकिन नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार में संधि से जुड़े रिकॉर्ड और प्रतियां सुरक्षित हैं. इस खुलासे के बाद ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
क्या है सुगौली संधि?
सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ एक महत्वपूर्ण समझौता था. दिसंबर 1815 में सुगौली में इस पर प्रारंभिक सहमति बनी और 4 मार्च 1816 को इसे औपचारिक रूप से लागू किया गया. इस संधि ने 1814-1816 के एंग्लो-नेपाली युद्ध को समाप्त किया और नेपाल की आधुनिक सीमाओं को तय करने में बड़ी भूमिका निभाई.
नेपाल के गोरखा साम्राज्य के विस्तार के दौरान उसकी सेनाएं पूर्व में सिक्किम और हिमालयी इलाकों, पश्चिम में कुमाऊं-गढ़वाल तथा दक्षिण में तराई के क्षेत्रों तक पहुंच गई थीं. इससे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जमीन, कर वसूली और व्यापारिक मार्गों को लेकर विवाद बढ़ने लगा. आखिरकार 1814 में युद्ध शुरू हुआ. सैन्य दबाव बढ़ने के बाद नेपाल को संधि के लिए बातचीत करनी पड़ी.
संधि में नेपाल को क्या खोना पड़ा?
सुगौली संधि के तहत नेपाल ने अपने कब्जे वाले बड़े भू-भाग पर दावा छोड़ दिया. पश्चिम में काली नदी के पार कुमाऊं और गढ़वाल जैसे क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में चले गए. पूर्व में मेची नदी सीमा का महत्वपूर्ण आधार बनी और सिक्किम से छीने गए क्षेत्रों से नेपाल को पीछे हटना पड़ा. तराई के बड़े हिस्से भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपे गए, हालांकि बाद में कुछ इलाके नेपाल को वापस मिले.
आज भी क्यों अहम है यह संधि?
सुगौली संधि आज भी भारत-नेपाल सीमा से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण मानी जाती है. सबसे बड़ा विवाद कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर है. संधि में काली नदी को सीमा माना गया था, लेकिन नदी का वास्तविक उद्गम कहां है, इसे लेकर भारत और नेपाल की अलग-अलग व्याख्या है. नेपाल लिम्पियाधुरा को काली नदी का स्रोत मानता है, जबकि भारत की सीमा की व्याख्या अलग है.
क्या नेपाल ब्रिटिश शासन का हिस्सा बना था?
संधि के बाद नेपाल ने काफी क्षेत्र गंवाया, लेकिन वह ब्रिटिश भारत का उपनिवेश नहीं बना. नेपाल अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहा. हालांकि संधि ने उसकी क्षेत्रीय और कूटनीतिक स्वतंत्रता पर कई महत्वपूर्ण सीमाएं जरूर लगाईं.
मूल कागज गायब होने से क्या बदलेगा?
किसी मूल दस्तावेज के नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि सुगौली संधि का ऐतिहासिक अस्तित्व ही खत्म हो जाता है. अलग-अलग अभिलेखागारों में इसकी प्रतियां, रिकॉर्ड और संदर्भ मौजूद हैं. फिर भी मूल हस्ताक्षरित दस्तावेज का मिलना ऐतिहासिक और कानूनी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. दो सदियों से अधिक पुरानी यह संधि आज भी नेपाल की सीमाओं और भारत-नेपाल संबंधों से जुड़े विवादों में अहम भूमिका निभाती है.
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