SpaceX के फाल्कन-9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा बुधवार चंद्रमा की सतह से टकरा गया. बताया गया है कि टक्कर के समय रॉकेट का यह हिस्सा 5000 मील प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से चांद से टकराया. चिली स्थित पैरानल वेधशाला में लगे यूरोपियन सदर्न ऑब्जर्वेटरी के वेरी लार्ज टेलीस्कोप ने इस घटना से पैदा हुए गैस और धूल के गुबार का पता लगाया. वैज्ञानिकों के अनुसार, टक्कर चंद्रमा के आइंस्टीन क्रेटर के पास हुई. टक्कर के बाद चांद की सतह से धूल और गैस का गुबार करीब पांच से दस मिनट तक दिखाई देता रहा.
स्पेसएक्स रॉकेट की चांद से हुई जोरदार टक्कर
- रॉकेट का हिस्सा 5,000 मील प्रति घंटे से अधिक की गति से चांदी की सतह से टकराया
- करीब चार हजार किलोग्राम था रॉकेट का वजन
- यह टक्कर चंद्रमा के आइंस्टीन क्रेटर के पास हुई
- गैस और धूल का गुबार कई किलोमीटर तक फैला
- गुबार में सोडियम और लिथियम के संकेत मिले
- चंद्रमा पर 20 से 30 मीटर चौड़ा गड्ढा बनने का अनुमान लगाया गया है
- रॉकेट के रसायनों की तलाश कर रहे थे वैज्ञानिक
जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ था फाल्कन-9
फाल्कन-9 रॉकेट को जनवरी 2025 में फ्लोरिडा से अमेरिका और जापान के संयुक्त चंद्र मिशन के तहत लॉन्च किया गया था. रॉकेट का पहला चरण मिशन के बाद पृथ्वी पर लौट आया था, जबकि ऊपरी चरण ने दोनों रोबोटिक लैंडरों को चंद्रमा की दिशा में आगे बढ़ाया. मिशन पूरा होने के बाद रॉकेट का दूसरा चरण अंतरिक्ष में ही रह गया था. बाद में सौर गतिविधियों और गुरुत्वाकर्षण बलों के प्रभाव से उसका रास्ता बदलता गया और वह चंद्रमा से टकराने वाली कक्षा में पहुंच गया.
लाइव नहीं दिखी टक्कर, अब ऑर्बिटर भेजेंगे सबूत
यह घटना भारतीय समयानुसार बुधवार दोपहर होने की संभावना जतायी गयी थी, लेकिन इसे लाइव रिकॉर्ड नहीं किया जा सका. उस समय चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा कोई भी अंतरिक्ष यान ऐसी स्थिति में नहीं था कि टक्कर को सीधे कैद कर सके. दक्षिण कोरिया का दानुरी ऑर्बिटर और नासा का लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर आने वाले दिनों में उस क्षेत्र की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेंगे.
20 से 30 मीटर चौड़ा गड्ढा बनने का अनुमान
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टक्कर से पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है. हालांकि, चंद्रमा की सतह पर करीब 65 से 90 फीट यानी 20 से 30 मीटर चौड़ा नया गड्ढा बन सकता है. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक यह अनुमान डॉ. फर्नांडो और नासा से जुड़े शोधकर्ताओं के एक समूह ने शुरुआती जांच के बाद पाया है.
क्या धरती से देखी जा सकती थी टक्कर?
चांद से टकराते रॉकेट को धरती से देखना संभव नहीं था, क्योंकि चंद्रमा पृथ्वी से करीब 2.25 लाख मील दूर है. शक्तिशाली दूरबीनों के लिए भी इस घटना को सीधे दर्ज करना चुनौतीपूर्ण रहा. शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण के बाद घटना की तस्वीरें या अन्य दृश्य प्रमाण सामने आ सकते हैं. वहीं वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टक्कर से धरती को कोई खतरा नहीं है.
चंद्रमा और अंतरिक्ष मलबे पर मिलेगा नया डेटा
वैज्ञानिक इस दुर्लभ कृत्रिम टक्कर का उपयोग चंद्रमा की सतह, वहां की मिट्टी और तेज गति से होने वाली टक्करों के प्रभाव को समझने के लिए कर सकते हैं. इससे यह जानने में भी मदद मिल सकती है कि भविष्य में चंद्रमा पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों, उपकरणों और स्थायी ढांचों को ऐसी घटनाओं से कैसे सुरक्षित रखा जाए.
चांद पर बढ़ रहा इंसानी कचरा
घटना के बाद चंद्रमा पर इंसानों द्वारा छोड़ी गयी या दुर्घटनाग्रस्त वस्तुओं की संख्या लगभग तीन हजार और कुल वजन करीब 190 टन हो गया है. सितंबर 1959 में सोवियत संघ का लूना-2 चंद्रमा तक पहुंचने वाली पहली मानव निर्मित वस्तु थी, जबकि नासा के अपोलो मिशनों से जुड़ी सैकड़ों वस्तुएं आज भी वहां मौजूद हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि चांद पर वातावरण नहीं होने से इससे किसी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान नहीं होता, लेकिन भविष्य में बढ़ते लूनर ट्रैफिक से ऐतिहासिक लैंडिंग साइटों और नये मिशनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है.
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