एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार के लिए आर्कटिक का नॉर्दर्न सी रूट (NSR) तेजी से चर्चा में आ रहा है. चीन के बाद अब दक्षिण कोरिया ने भी इस रास्ते का व्यावसायिक परीक्षण शुरू कर दिया है. दक्षिण कोरिया का PanStar Acro कंटेनर जहाज 22 अगस्त को बुसान से यूरोप के लिए रवाना हुआ. यह ब्रिटेन, नीदरलैंड और पोलैंड के बंदरगाहों पर रुकेगा और करीब 45 दिनों में वापस बुसान लौटने की योजना है.
यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण कोरिया पहली बार किसी कंटेनर जहाज के जरिए इस रूट की व्यावसायिक क्षमता परख रहा है. जहाज में केमिकल उत्पाद, इस्तेमाल की गई कारें, ऑटो पार्ट्स और खाली कंटेनर समेत 837 TEU कार्गो लदा है.
आखिर आर्कटिक रूट इतना अहम क्यों?
नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक क्षेत्र से होकर एशिया को यूरोप से जोड़ता है. पारंपरिक समुद्री रास्तों की तुलना में यह दूरी और यात्रा समय कम कर सकता है. कुछ अनुमानों के मुताबिक, चीन से यूरोप के बीच इस रास्ते से यात्रा 40 दिन से ज्यादा से घटकर करीब 18 दिन तक हो सकती है, हालांकि वास्तविक समय मौसम, बर्फ और जहाज की स्थिति पर निर्भर करेगा.
दक्षिण कोरिया के मौजूदा परीक्षण का उद्देश्य भी यही देखना है कि इस रूट पर दूरी, समय, ईंधन और लागत के लिहाज से नियमित व्यावसायिक संचालन कितना फायदेमंद और संभव है. कोरियाई अधिकारियों ने इसे बुसान को भविष्य के वैश्विक समुद्री हब के रूप में विकसित करने की योजना से भी जोड़ा है.
चीन पहले ही बढ़ा चुका है कदम
आर्कटिक समुद्री व्यापार में चीन पहले से सक्रिय है. हाल में चीनी कंपनी Sea Legend ने नॉर्दर्न सी रूट पर नियमित साप्ताहिक कंटेनर सेवा शुरू की है. इसे चीन की ‘Polar Silk Road’ रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
इससे आर्कटिक सिर्फ रूस के लिए ऊर्जा और संसाधनों का क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि एशियाई देशों के लिए यूरोपीय बाजारों तक पहुंच का संभावित वैकल्पिक समुद्री रास्ता भी बन रहा है.
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क्या इससे Suez Canal को चुनौती मिलेगी?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. आर्कटिक रूट छोटा जरूर है, लेकिन यह सालभर इस्तेमाल होने वाला आसान समुद्री रास्ता नहीं है समुद्री बर्फ, मौसम, सीमित बंदरगाह और बचाव सुविधाएं इसकी बड़ी चुनौतियां हैं. इंटरनेशनल चैंबर ऑफ शिपिंग के मुताबिक, आर्कटिक रूट में संभावनाएं हैं, लेकिन इसे चलाने की चुनौतियों और भू-राजनीतिक कारणों से यह फिलहाल मुख्य वैश्विक व्यापार मार्गों का विकल्प नहीं बना है
इसके अलावा इस रूट पर रूस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. जहाजों को रूसी नियमों और परमिट व्यवस्था से गुजरना पड़ता है. यही वजह है कि दक्षिण कोरिया के परीक्षण को लेकर उसके पश्चिमी सहयोगियों के बीच भी चिंता जताई गई है.
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भारत के लिए क्या मायने?
भारत भी इस नए समुद्री रास्ते को लेकर दिलचस्पी दिखा रहा है. ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, भारत 2027 में नॉर्दर्न सी रूट पर अपना पहला कार्गो जहाज भेजने की योजना पर रूस के साथ चर्चा कर रहा है. इसका मकसद भारत-रूस व्यापार और आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री कनेक्टिविटी की संभावनाओं को परखना है.
भारत के लिए यह रास्ता खासकर रूस और यूरोप के साथ व्यापार के लिहाज से उपयोगी हो सकता है. साथ ही, अगर भविष्य में लाल सागर, स्वेज नहर या दूसरे पारंपरिक समुद्री मार्गों में भू-राजनीतिक संकट पैदा होता है, तो आर्कटिक रूट एक वैकल्पिक विकल्प दे सकता है. हालांकि भारत के लिए भी मौसम, बर्फ, बीमा, रूसी नियम और सीमित बुनियादी ढांचा बड़ी चुनौतियां रहेंगे.
