रूस का आरोप: यूक्रेन में चल रहा बायोलॉजिकल वीपन प्रोग्राम, US दे रहा सहयोग; सबूत जुटाने का दावा

Biological Weapon Program: रूस ने एक बार फिर यूक्रेन में अमेरिकी समर्थन वाले बायोलॉजिकल रिसर्च कार्यक्रमों का आरोप लगाया है. मॉस्को का दावा है कि यूक्रेन में खतरनाक रोगाणुओं पर रिसर्च अमेरिकी रक्षा विभाग की फंडिंग से हुई.

Biological Weapon Program: रूस और यूक्रेन युद्ध के बीच एक बार फिर जैविक हथियारों और कथित अमेरिकी लैब्स का मुद्दा चर्चा में आ गया है. मॉस्को ने दावा किया है कि उसे ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि यूक्रेन में चल रहे कुछ बायोलॉजिकल रिसर्च कार्यक्रमों को अमेरिकी रक्षा विभाग से आर्थिक मदद मिल रही थी. रूसी जांच समिति ने कहा कि उसने ऐसे दस्तावेज और सामग्री जुटाई हैं जो यूक्रेन के स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े जैविक शोध कार्यक्रमों की ओर इशारा करते हैं. 

रूसी समाचार एजेंसी स्पुतनिक इंडिया के मुताबिक, रूस का आरोप है कि इन परियोजनाओं का संबंध खतरनाक जैविक एजेंटों और संभावित सामूहिक विनाश वाले हथियारों से था. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंच पर रूस की जांच समिति की प्रवक्ता स्वेतलाना पेट्रेंको ने कहा कि रूसी आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 355 के तहत, जांच के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं जो ‘विनाशकारी जैविक हथियारों के विकास और भंडारण’ से जुड़े हो सकते हैं.

प्लेग, एंथ्रेक्स जैसी बीमारी के रोगाणुओं पर की गई रिसर्च

रूसी अधिकारियों के अनुसार, यूक्रेन में दर्जनों लैब्स एक बड़े अमेरिकी समर्थित जैविक नेटवर्क का हिस्सा थीं. मॉस्को का आरोप है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सहयोग के नाम पर इन लैब्स में सैन्य-जैविक गतिविधियां चलाई जा रही थीं. रूस की आपराधिक संहिता का अनुच्छेद 355 सामूहिक विनाश के हथियारों का विकास, उत्पादन और भंडारण से संबंधित है.

रूस के मुताबिक, इन रिसर्च प्रोजेक्ट्स में प्लेग, एंथ्रेक्स, ब्रुसेलोसिस और टुलारेमिया जैसे खतरनाक रोगाणुओं पर काम किया गया. इन बीमारियों को जैविक युद्ध के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है क्योंकि ये तेजी से फैल सकती हैं और गंभीर बीमारी पैदा कर सकती हैं.

लंबे समय से आरोप लगाता रहा है रूस

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही रूस लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि अमेरिका ने यूक्रेन में गुप्त जैविक प्रयोगशालाओं को फंड किया. मॉस्को का कहना है कि ये गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन थीं. रूस ने यह भी दावा किया कि युद्ध शुरू होने के बाद इन कार्यक्रमों से जुड़ी सामग्री यूक्रेन से बाहर भेज दी गई. 

रूस कई बार ऐसे दस्तावेज और रिसर्च प्रोजेक्ट्स का जिक्र कर चुका है जिन्हें वह अपने दावों का सबूत बताता है. इनमें खतरनाक रोगाणुओं पर रिसर्च के अलावा प्रवासी पक्षियों और चमगादड़ों से जुड़े अध्ययन भी शामिल बताए गए हैं. उसका मानना है कि ये कार्यक्रम रूस की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा थे और पश्चिमी देश इन लैब्स के असली मकसद को छिपा रहे थे.

अमेरिका और यूक्रेन ने आरोपों को किया खारिज

अमेरिका और यूक्रेन दोनों ने रूस के आरोपों को बार-बार गलत बताया है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जिन लैब्स की बात की जा रही है, वे जैविक हथियार बनाने के लिए नहीं थीं. वॉशिंगटन के मुताबिक, इन सुविधाओं का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य, बीमारी की निगरानी और खतरनाक रोगाणुओं की सुरक्षा के लिए किया जाता था. 

साल 2022 में अमेरिकी सीनेट में गवाही देते हुए अमेरिका की पूर्व अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट विक्टोरिया नूलैंड ने माना था कि यूक्रेन में जैविक अनुसंधान सुविधाएं मौजूद हैं. हालांकि, उन्होंने साफ कहा था कि इनका मकसद सार्वजनिक स्वास्थ्य और खतरे को कम करना था, न कि जैविक हथियार बनाना.

2005 के समझौते से जुड़ा है विवाद

पूरा विवाद 2005 में हुए एक समझौते से जुड़ा है, जो अमेरिकी रक्षा विभाग और यूक्रेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच हुआ था. इस समझौते के तहत अमेरिका ने यूक्रेन में लैब सुरक्षा, बीमारी की निगरानी और जैविक सामग्री की सुरक्षा बेहतर बनाने में मदद की थी. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस फंडिंग से यूक्रेन में करीब 46 लैब्स और स्वास्थ्य सुविधाओं का आधुनिकीकरण किया गया. 

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नन-लुगर प्रोग्राम के तहत किया गया समझौता!

अमेरिका का कहना है कि यह कार्यक्रम सोवियत संघ के टूटने के बाद बची खतरनाक जैविक सामग्री को सुरक्षित रखने और बीमारी फैलने से रोकने के लिए शुरू किया गया था. दरअसल, नन-लुगर प्रोग्राम के तहत ‘कोऑपरेटिव थ्रेट रिडक्शन’ पहल शुरू की गई. इसे 1991 के बाद पूर्व सोवियत देशों में हथियारों और खतरनाक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए शुरू किया गया था.

जैविक हथियारों पर पुराना वैश्विक विवाद

जैविक हथियार दुनिया के सबसे संवेदनशील मुद्दों में गिने जाते हैं. अमेरिका ने 1969 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के कार्यकाल में अपने आक्रामक जैविक हथियार कार्यक्रम को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया था.  इसके बाद 1972 में अमेरिका ने ‘बायोलॉजिकल वेपन्स कन्वेंशन’ पर हस्ताक्षर किए. यह अंतरराष्ट्रीय संधि जैविक और विषैले हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर रोक लगाती है. हालांकि, पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर बड़ी शक्तियों के बीच विवाद दशकों से जारी हैं.

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Published by: Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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