भारत छोड़ो आंदोलन - 1: इस पहले भाग में बताया गया है कि कैसे ब्रिटेन ने आजादी के मुद्दे पर चुप्पी साधे रखते हुए भारत को दूसरे विश्व युद्ध में धकेल दिया.
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1942 का साल था. द्वितीय विश्व युद्ध अपने निर्णायक दौर में पहुंच रहा था.
जापान तेजी से एशिया में आगे बढ़ रहा था और ब्रिटिश साम्राज्य को भारत की मदद की पहले से कहीं ज्यादा जरूरत थी.
इसी दबाव के बीच ब्रिटेन ने भारत को एक नया प्रस्ताव दिया.
इसे लेकर भारत आए सर स्टैफर्ड क्रिप्स.
लेकिन जो मिशन भारतीय नेताओं को साथ लाने आया था, वह कुछ ही दिनों में असफल होकर लौट गया.
यही वह दौर था, जिसके कुछ महीनों बाद महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ (Do or Die) का आह्वान किया और भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ.
जापान की तेजी ने बढ़ाया ब्रिटेन पर दबाव
दिसंबर 1941 में जापान द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्रों (Axis Power) की ओर से शामिल हुआ. इसके बाद एशिया में जापान की सैन्य सफलताएं तेजी से बढ़ने लगीं.
ब्रिटेन के सामने अब केवल यूरोप का युद्ध नहीं था. भारत भी युद्ध की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हो गया था. उसे सैनिकों, संसाधनों और रणनीतिक सहयोग की जरूरत थी.
लेकिन भारत के राजनीतिक नेतृत्व और ब्रिटिश सरकार के बीच पहले से ही गहरा गतिरोध था.
ऐसे समय में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने 11 मार्च 1942 को घोषणा की कि ब्रिटिश वॉर कैबिनेट ने भारत की संवैधानिक समस्या को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया है.
इस प्रस्ताव को लेकर सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा गया.
क्रिप्स ब्रिटिश सरकार में महत्वपूर्ण पद पर थे और उन्हें भारतीय नेताओं से बातचीत करके किसी समझौते तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई थी.
क्रिप्स मिशन भारत क्यों आया?
क्रिप्स मिशन का मकसद तत्काल भारत को स्वतंत्र करना नहीं था.
ब्रिटिश प्रस्ताव में कहा गया था कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत के लिए नया संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी.
इसके लिए एक संविधान बनाने वाली संस्था गठित करने का प्रस्ताव था.
भारतीय रियासतों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करने की बात कही गई थी.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि प्रस्ताव में पहली बार इस तरह स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया गया कि भारत अपना संविधान खुद बनाएगा और ब्रिटिश सरकार उसे स्वीकार करेगी.
लेकिन इसके साथ एक ऐसी शर्त भी थी, जिसने आगे चलकर पूरे प्रस्ताव को विवादित बना दिया.
भारत एक रहेगा या अलग-अलग हिस्सों में बंटेगा?
क्रिप्स प्रस्ताव में ब्रिटिश भारत के किसी प्रांत को नए भारतीय संविधान को स्वीकार न करने का विकल्प दिया गया था.
यानी कोई प्रांत चाहे तो भारतीय संघ में शामिल न होने का फैसला कर सकता था.
बाद में वह ब्रिटिश सरकार के साथ अलग संवैधानिक व्यवस्था पर बातचीत कर सकता था.
यही प्रावधान Congress के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया.
Congress को लगा कि यह भारत की एकता के लिए गंभीर खतरा है.
दूसरी तरफ Muslim League की मांग थी कि भारत के मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए.
क्रिप्स प्रस्ताव में पाकिस्तान को सीधे स्वीकार नहीं किया गया था.
इसलिए मुस्लिम लीग भी इससे संतुष्ट नहीं हुई.
यानी एक ही प्रस्ताव था, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को उसमें अपनी-अपनी बड़ी कमियां नजर आ रही थीं.
कांग्रेस की आपत्ति सिर्फ भविष्य को लेकर नहीं थी
कांग्रेस की सबसे बड़ी आपत्ति तत्कालीन शासन व्यवस्था को लेकर थी.
प्रस्ताव के अनुसार युद्ध समाप्त होने तक भारत की रक्षा की जिम्मेदारी ब्रिटिश सरकार के पास ही रहने वाली थी. वायसराय की शक्तियां भी बनी रहतीं.
कांग्रेस चाहती थी कि तत्काल एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार बने, जिसमें भारतीय नेताओं की वास्तविक भूमिका हो और वायसराय संवैधानिक प्रमुख की तरह काम करे.
लेकिन यह मांग पूरी नहीं हुई.
जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव की इसी कमजोरी पर सवाल उठाया था. उनके अनुसार मौजूदा शासन संरचना लगभग वैसी ही बनी रहती और भारतीय नेताओं को वायसराय की सत्ता के अधीन सीमित भूमिका मिलती.
महात्मा गांधी ने भी क्रिप्स प्रस्ताव को लेकर तीखी टिप्पणी की.
उन्होंने इसे एक डूबते बैंक का पोस्ट-डेटेड चेक कहा.
अर्थात- भुगतान का वादा भविष्य की किसी तारीख के लिए था, लेकिन भरोसा उस बैंक पर नहीं था.
प्रस्ताव में क्या था?
क्रिप्स प्रस्ताव की प्रमुख बातें सरल भाषा में समझें तो-
- युद्ध समाप्त होने के बाद भारत के लिए नया संविधान बनाया जाना था.
- संविधान बनाने वाली संस्था के गठन का प्रस्ताव था.
- भारतीय रियासतों को भी इसमें भाग लेने का अवसर दिया जाना था.
- ब्रिटिश सरकार नए संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार थी.
- किसी प्रांत को नए भारतीय संघ में शामिल न होने का विकल्प दिया गया था.
- ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के साथ संबंध बनाए रखने या भविष्य में अलग होने की संभावना खुली रखी गई थी.
- युद्ध समाप्त होने तक भारत की रक्षा ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण में रहने वाली थी.
- अंतरिम व्यवस्था में भारतीय नेताओं की भूमिका बढ़ाने की बात कही गई थी.
कागज पर देखें तो यह प्रस्ताव पहले के August Offer की तुलना में आगे बढ़ा हुआ था.
लेकिन राजनीति में केवल यह मायने नहीं रखता कि क्या दिया जा रहा है। यह भी मायने रखता है कि कब दिया जा रहा है और किस शर्त पर दिया जा रहा है.
Muslim League भी क्यों नहीं मानी?
मुस्लिम लीग को लगा कि प्रस्ताव पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करता.
मुस्लिम लीग एक ऐसे संविधान-निर्माण की प्रक्रिया से भी संतुष्ट नहीं थी, जिसमें पूरे भारत के लिए एक केंद्रीय संघ की संभावना बनी रहे.
उसकी मांग थी कि मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था और आत्मनिर्णय के अधिकार को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाए.
इसलिए क्रिप्स मिशन, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौते का रास्ता नहीं बना सका.
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दूसरी आवाजें भी प्रस्ताव के खिलाफ थीं
क्रिप्स प्रस्ताव की आलोचना केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने नहीं की.
हिंदू महासभा ने भी प्रांतों को अलग होने का विकल्प देने का विरोध किया.
सिख नेताओं को आशंका थी कि पंजाब के भविष्य पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है.
कुछ उदारवादी नेताओं ने भी भारत को एक से अधिक संघों में बांटने की संभावना को खतरनाक माना.
दलित समुदायों की ओर से भी यह चिंता सामने आई कि उनके हितों की पर्याप्त सुरक्षा का स्पष्ट प्रावधान नहीं था.
इस तरह प्रस्ताव के सामने राजनीतिक असहमति का दायरा बहुत व्यापक था.
असली समस्या थी भरोसे की कमी
क्रिप्स मिशन की असफलता को केवल प्रस्ताव की कुछ शर्तों से समझना पर्याप्त नहीं है.
इसके पीछे एक बड़ा सवाल विश्वास का था.
भारतीय नेताओं को संदेह था कि ब्रिटिश सरकार वास्तव में सत्ता हस्तांतरण के लिए तैयार है या युद्ध के समय भारतीय समर्थन हासिल करने के लिए राजनीतिक आश्वासन दे रही है.
क्रिप्स मिशन ऐसे समय भारत आया था जब ब्रिटेन को तत्काल भारतीय सहयोग चाहिए था.
इसलिए भारतीय नेताओं के एक हिस्से को लगा कि आजादी का वादा भविष्य के लिए टाल दिया गया है, जबकि युद्ध में सहयोग की मांग तत्काल की जा रही है.
यही वजह थी कि मिशन की बातचीत करीब दो सप्ताह चली, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका.
क्रिप्स मिशन की विफलता और भारत छोड़ो आंदोलन
क्रिप्स मिशन मार्च-अप्रैल 1942 में आया और बिना किसी समझौते के वापस चला गया.
लेकिन इसकी विफलता का असर बहुत दूर तक गया.
कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार से केवल बातचीत और प्रस्तावों के जरिए तत्काल सत्ता हस्तांतरण की उम्मीद करना कठिन है.
दूसरी तरफ युद्ध की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी. जापानी सेना भारत के पूर्वी हिस्से के करीब पहुंच रही थी.
ऐसे माहौल में भारतीय राजनीति भी निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रही थी.
कुछ ही महीनों बाद, अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया.
महात्मा गांधी ने देश के सामने स्पष्ट संदेश रखा-
करो या मरो.
इस तरह क्रिप्स मिशन केवल एक असफल संवैधानिक बातचीत नहीं था. यह उस राजनीतिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना, जिसने भारत को भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुंचाया.
इतिहास में इसकी विडंबना यही रही कि जिस ब्रिटिश सरकार को युद्ध जीतने के लिए भारत का सहयोग चाहिए था, वह भारत के राजनीतिक नेतृत्व को ऐसा भरोसा नहीं दे सकी कि युद्ध के बाद सत्ता वास्तव में भारतीयों के हाथ में होगी.
और जब भरोसे की वह आखिरी कोशिश भी विफल हुई, तो कुछ महीनों बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने बातचीत की मेज से उठकर सड़क का रास्ता पकड़ लिया.
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