नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह UN को करेंगे संबोधित, विनाशकारी बाढ़ के लिए मांग सकते हैं मुआवजा

26 अगस्त को नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के लिए कौन है जिम्मेदार? यह सवाल उठाने के लिए नेपाली प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करने वाले हैं. ऐसी उम्मीद है कि वे उन देशों की जिम्मेदारी तय करने की बात करेंगे जिनका योगदान ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में सर्वाधिक है.

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह इस महीने के आखिर में संयुक्त राष्ट्र (UN) के जनरल असेंबली के 81वें सेशन को संबोधित करने के लिए अमेरिका जाने वाले हैं. संभावना है कि वे वहां क्लाइमेट चेंज का मुद्दा उठा सकते हैं और नेपाल में अचानक आई भयानक बाढ़ के लिए इंटरनेशनल कम्युनिटी से मुआवजे की मांग कर सकते हैं.


नेपाल ने बाढ़ के लिए क्लाइमेंट चेंज को बताया है कारण

नेपाल में 26 अगस्त को अचानक जो बाढ़ आई, उसकी वजह यह थी ग्लेशियर का टूटना. विश्व में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन क्लाइमेंट चेंज के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है. इसकी वजह से पृथ्वी का तापमान बढ़ता है. ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में नेपाल की भूमिका बेहद कम है. वैश्विक कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का हिस्सा 0.05% से 0.1% के बीच है. बावजूद इसके उसे जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों का शिकार होना पड़ा है.

नेपाल ने चीन-भारत और अमेरिका से मांगा है मुआवजा

नेपाल में आई भयंकर बाढ़ के बाद नेपाल के विदेश मंत्री ने यह बयान दिया था कि भारत-चीन और अमेरिका जैसे देश ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन बड़े पैमाने पर करते हैं. जिसका परिणाम नेपाल को भुगतना पड़ा है, इसलिए इन देशों को नेपाल को मुआवजा देना चाहिए.

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By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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