नेपाल बाढ़ का खौफनाक मंजर: सुरंग में फंसे मजदूरों ने 6 घंटे मौत से लड़ी जंग, पहाड़ पर चढ़कर बचाई जान

Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने तबाही का ऐसा मंजर दिखाया, जिसे जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले श्रमिक शायद ही कभी भूल पाएंगे. कोई जान बचाने के लिए पहाड़ पर चढ़ता रहा, तो किसी ने सुरंग में पानी भरने के बाद लोहे की सीढ़ी पकड़कर घंटों मौत का इंतजार किया. बाढ़ के बाद अब भी सैकड़ों श्रमिकों के सुरंगों में फंसे होने की आशंका है.

Nepal Flood: नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद तबाही की तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं. सबसे दर्दनाक कहानियां उन लोगों की हैं, जो जलविद्युत परियोजनाओं में काम कर रहे थे और अचानक आए बाढ़ के पानी के बीच अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करते रहे. किसी ने ऊंची पहाड़ी पर पहुंचकर जिंदगी बचाई, तो किसी ने सुरंग के भीतर पानी के बढ़ते स्तर के बीच लोहे की सीढ़ियों को पकड़कर कई घंटे गुजारे.

'पीछे मुड़कर देखने का भी समय नहीं था'

रसुवा स्थित मैलुंग जलविद्युत परियोजना में तकनीकी कर्मचारी शिव गिरि उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने बाढ़ का खौफनाक मंजर अपनी आंखों से देखा. जब निचले इलाकों में पानी तेजी से बढ़ने लगा, तो गिरि और छह अन्य लोगों के पास जान बचाने के लिए पहाड़ी की ओर भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

ऊंचाई की ओर बढ़ते हुए उन्होंने अपनी आंखों के सामने घरों, बस्तियों और इमारतों को बाढ़ के पानी में बहते और फिर गायब होते देखा. गिरि के मुताबिक, उनके कई सहकर्मी और एक रिश्तेदार भी बाढ़ में बह गए.

तिमुरे और धुंचे को जोड़ने वाले सामान्य रास्ते बंद हो चुके थे. ऐसे में इस समूह ने जंगल के रास्ते करीब 12 घंटे तक पैदल सफर किया और आखिरकार एक गुफा में पहुंचकर रात बिताई.

जंगल से गुफा तक... फिर हेलीकॉप्टर ने पहुंचाया काठमांडू

अगले दिन गिरि और उनके साथी पहाड़ी से नीचे परियोजना स्थल की ओर आए. वहां मौजूद राहतकर्मियों को उन्होंने अपने फंसे होने की जानकारी दी और मदद की गुहार लगाई. बाद में नेपाली सेना के हेलीकॉप्टर की मदद से गिरि को काठमांडू पहुंचाया गया. वह त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में उपचाराधीन हैं.

933 लोग लापता, 600 से ज्यादा के सुरंग में फंसे होने की आशंका

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के अनुसार, 26 अगस्त से 933 श्रमिकों और कर्मचारियों के लापता होने की सूचना है. इनमें 600 से अधिक लोगों के सुरंगों के भीतर फंसे होने की आशंका जताई गई है.

प्राधिकरण ने सोमवार को बताया कि सुरंगों से अब तक 279 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है. फंसे हुए लोगों तक पहुंचने और लापता लोगों की तलाश के लिए भारत और चीन की विशेषज्ञ टीमें भी नेपाल के राहत एवं बचाव अभियान में शामिल हो गई हैं.

सायरन बजा और शुरू हो गई जिंदगी बचाने की दौड़

अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना में सिविल इंजीनियर संदीप राणा करीब 100 अन्य कर्मचारियों के साथ उस वक्त परियोजना कार्यालय में थे, जब अचानक आपातकालीन सायरन बजा.

कर्मचारी अभी निर्धारित असेम्बली पॉइंट तक पहुंच भी नहीं पाए थे कि उन्हें खबर मिली कि करीब 12 किलोमीटर ऊपर बांध स्थल पर भीषण बाढ़ आ गई है.

इसके बाद कर्मचारियों ने ऊंचाई की ओर चढ़ना शुरू कर दिया. वे त्रिशूली नदी से करीब 30 से 35 मीटर ऊपर एक सुरक्षित स्थान तक पहुंचे. वहां से उन्होंने अपनी आंखों के सामने परियोजना कार्यालय, कर्मचारियों के शिविर और सड़कें पानी में डूबते देखीं.

राणा ने बताया कि ऊपर चढ़ते वक्त लगातार पत्थर गिर रहे थे. उनके पास रुकने या सोचने का समय नहीं था. बस एक ही मकसद था—किसी तरह जान बचाना.

करीब सात से आठ घंटे की चढ़ाई के बाद यह समूह शाम करीब चार बजे ग्रैंग इलाके में सड़क तक पहुंच सका. जब राणा कालिकास्थान पहुंचे, तब उनके साथ सिर्फ दो लोग थे. बाकी लोग रास्ते में अलग हो गए थे.

सुरंग में घुसा पानी, लोहे की सीढ़ी बनी जिंदगी की आखिरी उम्मीद

बाढ़ के बीच सुरंग में फंसे रामचंद्र की कहानी और भी भयावह है. रतोपाटी समाचार पोर्टल के मुताबिक, त्रिशूली नदी के किनारे बनी एक सुरंग में रामचंद्र अपने पांच साथियों के साथ मौजूद थे. जब सुरंग में पानी घुसना शुरू हुआ, तब वे निकास द्वार से सैकड़ों मीटर दूर थे.

बढ़ते पानी से बचने के लिए उन्होंने सुरंग की छत पर लगी लोहे की सीढ़ी पकड़ ली. छह लोगों ने खुद को संभालने के लिए टीन की एक शीट का सहारा लिया और करीब छह घंटे तक एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर चढ़ते रहे.

रामचंद्र के मुताबिक, वे छह लोग थे. बाद में सुरंग के दरवाजे पर उन्हें एक और व्यक्ति मिला. उस वक्त उनके लिए हर अगला कदम जिंदगी और मौत के बीच का फैसला था.


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नेपाल के हाइड्रोपावर कॉरिडोर में बाढ़ ने मचाई तबाही

नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के खिसकने या भूस्खलन के कारण 26 अगस्त को अचानक बाढ़ आई. उत्तरी और मध्य नेपाल के कई शहरों और गांवों में इसका व्यापक असर पड़ा.

हिमालयी क्षेत्र से दक्षिण की ओर बहने वाली भोटेकोशी नदी का पानी अचानक बढ़ा और अपने साथ भारी तबाही लेकर आया. मकान, वाहन, सड़कें और पुल बाढ़ में बह गए. जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा.

इस आपदा के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है. लेकिन बाढ़ से प्रभावित जलविद्युत परियोजनाओं और सुरंगों में फंसे लोगों की कहानियां यह बता रही हैं कि उस दिन नेपाल में लोगों ने किस तरह कुछ घंटों के भीतर अपनी आंखों के सामने सब कुछ उजड़ते देखा.

Nepal Flood: हर तरफ पानी और सामने मौत

किसी ने पहाड़ पर चढ़कर जान बचाई, किसी ने जंगल में घंटों भटककर रात गुजारी और किसी ने सुरंग की लोहे की सीढ़ी को जिंदगी की आखिरी उम्मीद बना लिया. नेपाल की बाढ़ के बाद सामने आ रही ये आपबीतियां उस आपदा की भयावहता को शब्दों में बयान करती हैं.


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By अरबिंद कुमार मिश्रा

अरबिंद कुमार मिश्रा मुख्यधारा की पत्रकारिता में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वर्तमान में, वह प्रभात खबर डॉट कॉम (Prabhat Khabar) में सीनियर कंटेंट राइटर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. अरबिंद नेशनल, इंटरनेशनल और स्पोर्ट्स कैटेगरी में अपनी लेखनी के लिए जाने जाते हैं. गहरी रिसर्च पर आधारित स्पेशल स्टोरीज, रिपोर्टिंग और जटिल मुद्दों पर आसान भाषा में 'एक्सप्लेनर' लिखना उनकी मुख्य यूएसपी (USP) है.

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