नेपाल : रासुवा में अबतक सामान्य नहीं हुई जिंदगी, 7 हजार की आबादी मदद के इंतजार में; गांवों तक पहुंचने के रास्ते बंद

नेपाल के रासुवा जिले में भोटेकोशी नदी की बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। 203 लोग लापता हैं, जबकि 7 हजार से ज्यादा लोग खाने-पीने के संकट से जूझ रहे हैं. ऐसे मुश्किल हालात में अब लोगों की उम्मीदें आसमान से मिलने वाली राहत पर टिकी हैं.

नेपाल के रासुवा जिले में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद तबाही का मंजर अभी भी कायम है. द काठमांडू पोस्ट के मुताबिक, आमाछोदिंगमो ग्रामीण नगरपालिका में अब भी कम से कम 203 लोगों के लापता होने की खबर है, जिनमें जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कई स्थानीय लोग भी शामिल हैं. इलाके में अपर त्रिशूली-1, चिलिमे और लांगटांग जैसी परियोजनाएं भी बाढ़ की चपेट में आई हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि 7 हजार से ज्यादा आबादी वाले इस इलाके तक राहत पहुंचाना बेहद मुश्किल हो गया है. बाढ़ की तेज धार में रासुवा को नेपाल के दूसरे हिस्सों से जोड़ने वाला मुख्य हाईवे बह चुका है, जिससे गांवों का संपर्क टूट गया है और राहत-बचाव अभियान के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.

दूरदराज के गांवों को भुला दिया गया

स्थानीय प्रतिनिधियों ने राहत व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है. बुचुंग तामांग का आरोप है कि सरकार का ध्यान उन इलाकों पर ज्यादा है, जहां राहत दलों और मीडिया के लिए पहुंचना आसान है. उनका कहना है कि दूरदराज के गांवों में फंसे लोग भोजन और जरूरी सामान के अभाव में मुश्किल हालात का सामना कर रहे हैं.

संपर्क बहाल करने के लिए ‘तुइन’ का सहारा

स्थानीय प्रशासन दूरदराज के गांवों से संपर्क जोड़ने के लिए अस्थायी ‘तुइन’ का सहारा ले रहा है. यह कठिन परिस्थिति में जीवन रेखा का काम कर रहा है. अधिकारियों के मुताबिक, सस्पेंशन ब्रिज या बेली ब्रिज बनाने में काफी समय लग सकता है. ऐसे में फिलहाल तुइन के जरिए नदी पार करने का रास्ता तैयार करने पर जोर है. हालांकि, इसके लिए नदी के सुरक्षित हिस्से का चयन करना और वहां तक पहुंचने का रास्ता बनाना भी बड़ी चुनौती है.

आसमान की ओर टिकी ग्रामीणों की निगाहें

भोटेकोशी की बाढ़ ने रासुवा में सिर्फ सड़कें और पुल ही नहीं बहाए, बल्कि हज़ारों लोगों की जिंदगी का सहारा भी छीन लिया है. कई गांव आज भी दूसरे इलाकों से कटे हुए हैं. ऐसे में प्रभावित लोगों की निगाहें अब आसमान पर टिकी हैं. उन्हें इंतजार है कि कब राहत लेकर हेलिकॉप्टर पहुंचेगा, कब उन्हें भोजन, दवाइयां और जरूरी सामान मिलेगा, और कब उनकी सुरक्षित निकासी होगी. यह इंतज़ार जितना लंबा होता जा रहा है, उतनी ही उनकी हताशा भी बढ़ती जा रही है.

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By सत्येन्द्र गिरि

सत्येन्द्र गिरि प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. यहां वे मुख्य रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों से जुड़ी खबरों का लेखन करते हैं. सरल, तथ्यात्मक और पाठक-केंद्रित लेखन उनकी प्रमुख पहचान है. उन्होंने एशिया के प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से मास्टर ऑफ आर्ट्स इन मास कम्युनिकेशन (बैच 2023–25) की डिग्री प्राप्त की है.

पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, रिपोर्टिंग और समसामयिक विषयों की गहन समझ विकसित की. पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके पास एक वर्ष का पेशेवर अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला के गोरखपुर एडिशन से की, जहां समाचार लेखन और रिपोर्टिंग की बारीकियों को नजदीक से सीखने और समझने का अवसर मिला. इसके बाद उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता में कदम रखते हुए प्रभात खबर डिजिटल से जुड़कर देश-विदेश की महत्वपूर्ण खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया.

सत्येन्द्र की विशेष रुचि इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंध, राजनीति, कूटनीति और समसामयिक घटनाक्रम से जुड़े विषयों में है. वे जटिल और गंभीर मुद्दों को भी सरल, संतुलित और विश्वसनीय तरीके से प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं. राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाओं पर उनकी गहरी नजर रहती है तथा वे तथ्यपरक और निष्पक्ष पत्रकारिता को अपनी कार्यशैली का आधार मानते हैं. वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के निवासी हैं.

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