26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास भोटेकोशी नदी में आई अचानक बाढ़ के कारण नेपाल में हालात बिगड़े हुए है. इस जलप्रलय में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है तो हजारों लोग लापता हैं. यह बाढ़ क्यों आयी ? इसको लेकर कई दावे किए जा रहे हैं.
नेपाल सरकार द्वारा जारी अधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इस विनाशकारी बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल-तिब्बत सीमा पर उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों का टूटना (आइस-रॉक एवलांच) तथा उससे बनी अस्थायी मलबे की झील का अचानक फटना बताया गया है.
इस हादसे को लेकर दावा किया जा रहा कि चीन द्वारा समय पर घटना की जानकारी नहीं देने के कारण नेपाल को इस भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा है. हालांकि चीन ने भी इस दावे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. इन सब के बीच अहम सवाल ये है कि क्या सच में इस बाढ़ की भयावहता को रोका जा सकता था?
बाढ़ की जानकारी नेपाल को कब मिली?
नेपाली मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक
- तिब्बत के केरुंग इलाके में बुधवार सुबह अचानक बाढ़ आई.
- चीनी समय के मुताबिक इसका समय करीब 10:30 बजे बताया गया है.
- नेपाल और चीन के समय में 2 घंटे 15 मिनट का अंतर है. इस हिसाब से नेपाल में उस समय करीब 8:15 बजे थे.
- नेपाल के रसुवा जिले के प्रमुख जिला अधिकारी नरेंद्र परियार ने बताया कि उन्हें सुबह करीब 9:00 बजे तिब्बत की तरफ से बड़ी बाढ़ आने की जानकारी मिली थी. जो कि उन्हें स्थानीय स्तर पर दी गई.
- यानी नेपाल प्रशासन को जानकारी मिलने और तिब्बत में घटना होने के बीच 45 मिनट का अंतर था और चीन ने आधिकारिक तौर पर नेपाल को इस बाढ़ पर कोई सूचना नहीं दी.
इसके इतर विदेश और रणनीतिक मामलों के नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने चीन पर आरोप लगाते हुए कहा कि नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ चीन से किए गए एकतरफा प्यार का नतीजा है.
हालांकि यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. इसे सीधे-सीधे यह कहना सही नहीं होगा कि चीन ने 45 मिनट तक चेतावनी जानबूझकर रोककर रखी.
क्या चीन ने नेपाल को चेतावनी नहीं दी?
- नेपाल की तरफ से कहा गया कि घटना से पहले ऐसी कोई आधिकारिक चेतावनी नहीं मिली, जिससे लोगों को समय रहते सुरक्षित जगह पहुंचाया जा सके.
- हालांकि चीन ने इन आरोपों को खारिज किया है. नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने कहा कि चीन ने समय पर चेतावनी नहीं दी, यह दावा गलत है.
- चीन ने यह भी कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय बचाव और राहत पर ध्यान देनी चाहिए.
हालांकि अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि चीन के पास पहले से बाढ़ की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसे नेपाल से छिपाया.
फिर 45 मिनट की देरी का सवाल क्यों अहम है?
अचानक आने वाली बाढ़ में कुछ मिनट भी बहुत मायने रखता है, क्योंकि अगर नदी के जलस्तर में अचानक भारी बढ़ोतरी होने वाली हो और सीमा के दूसरी तरफ इसकी जानकारी पहले मिल जाए, तो नदी किनारे रहने वाले लोगों, सुरक्षा बलों और व्यापारिक इलाकों को तुरंत खाली कराया जा सकता है और जान-माल की नुकसान को कम किया जा जा सकता है.
नेपाल में बाढ़ को लेकर पहले भी हो चुकी है समस्या
- ये पहली बार नहीं है जब नेपाल में इस तरह की घटना हुई हो. भोटेकोशी क्षेत्र में ही इससे पहले अचानक बाढ़ आ चुकी है.
- जुलाई 2025 में इसी सीमा क्षेत्र में ल्हेन्दे नदी में आई बाढ़ के बाद भी सीमा पार से सूचना साझा करने और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को लेकर सवाल उठे थे.
- उस समय इसको लेकर बातचित करने और इस तरह की मजबूत व्यवस्था करने की जरूरत बताई गई थी. हालांकि इसको लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है
- यानी 2026 की घटना ने कोई बिल्कुल नया सवाल पैदा नहीं किया है,उसने पुराने सवाल को और गंभीर बना दिया है.
आगे क्या होना चाहिए?
- फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भोटेकोशी की तबाही सिर्फ चीन की सूचना न देने की वजह से हुई. लेकिन यह घटना जरूर बताती है कि सीमा-पार आपदाओं के लिए नेपाल और चीन को रियल-टाइम चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है.
- क्योंकि हिमालय जैसे संवेदनशील इलाके में आपदा आने के बाद चेतावनी देने और आपदा आने से पहले चेतावनी देने के बीच का अंतर ही कई लोगों की जान बचा सकता है.
- सीमा के दूसरी तरफ अगर ग्लेशियर टूटता है, भूस्खलन होता है, नदी का रास्ता रुकता है या अचानक पानी बढ़ता है, तो ऐसी सूचना तुरंत और सीधे संबंधित अधिकारियों तक पहुंचनी चाहिए.
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