Lunar Activity in 2026 Full Moons and Total Lunar Eclipse: 2026 में चंद्रमा की पूरी गतिविधियां जान लीजिए. क्योंकि इस साल लगने वाला चंद्रग्रहण न केवल इस साल का आखिरी होगा, बल्कि अगला लूनर इकलिप्स साल 2028 में दिखेगा. साल 2026 में कुल 13 पूर्णिमाएं देखने को मिलेंगी. इनमें तीन सुपरमून और दो चंद्र ग्रहण शामिल हैं. इनमें से एक ऐसा होगा, जिसके बाद 2028 के अंत तक कोई पूर्ण चंद्र ग्रहण देखने को नहीं मिलेगा. पूर्णिमा की रात मून सरफेस के गड्ढों को देखने के लिए सबसे अच्छी नहीं होती. लेकिन शाम के समय (क्षितिज) होराइजन से उगता हुआ गोल और चमकदार चांद कई लेखकों का सबसे पसंदीदा होता है. हमें लगता है कि आपका भी जरूर होगा. चलिए इस शॉर्ट इनफॉर्मेशन के बाद पूरी जानकारी लेते हैं.
पहली पूर्णिमा तो पार हो गई है. यह 3 जनवरी को थी. हां! हम आपको इन सभी फुल मून के अंग्रेजी नाम भी बता रहे हैं. उत्तरी अमेरिका में हर पूर्णिमा का अलग नाम है. तो इस जनवरी वाली पूर्णिमा का नाम था; वुल्फ मून. अब फरवरी की पूर्णिमा आने वाली है. इसे स्नो मून (Snow Moon) कहा जाता है. यह रविवार, 1 फरवरी को दिखाई देगी. चंद्रमा ठीक शाम 5:09 बजे (EST) पर पूर्ण होगा. यह शनिवार (31 जनवरी) और सोमवार (2 फरवरी) को भी लगभग पूरा और चमकदार दिखाई देगा. अब सभी को एक-एक कर बताएंगे, तो मुश्किल हो सकती है, समझने में. ऐसे में नीचे दिए गए इंफोग्राफिक से समझें.
2026 की सभी पूर्णिमाएं: एक नजर में
2026 में लगने वाले चंद्रग्रहण
2026 में दो चंद्र ग्रहण लगेंगे, लेकिन इनमें से केवल एक पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. पहला ग्रहण 2-3 मार्च को होगा, जो पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. इस दौरान पूर्णिमा का ‘वर्म मून’ पृथ्वी की गहरी उम्ब्रा (छाया) से गुजरेगा और 3 मार्च को सुबह 6:04 से 7:02 बजे (EDT) तक लगभग 58 मिनट के लिए लाल-नारंगी रंग का दिखाई देगा. इस घटना को ‘ब्लड मून’ भी कहा जाता है. इसे पश्चिमी उत्तरी अमेरिका तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र, हां भारत में भी, सबसे अच्छी तरह देखा जा सकेगा.
दूसरा चंद्र ग्रहण 27-28 अगस्त को लगेगा, जो आंशिक चंद्र ग्रहण होगा. इस दौरान ‘स्टर्जन मून’ का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा पृथ्वी की गहरी छाया में प्रवेश करेगा. ग्रहण के चरम पर, 28 अगस्त को रात 12:12 बजे (EDT) के आसपास, चंद्रमा लालिमा लिए हुए नजर आ सकता है. इस ग्रहण को उत्तर और दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका से बेहतर तरीके से देखा जा सकेगा.
चांद का घटना और बढ़ना
चांद के पास अपनी खुद की रोशनी नहीं होती, वह तो बस सूरज की रोशनी को शीशे की तरह चमकाता है. चूंकि चंद्रमा, पृथ्वी और सूरज अपनी जगह बदलते रहते हैं, इसलिए हमें धरती से मून के अलग-अलग रूप और आकार दिखाई देते हैं. चांद का यह पूरा चक्र करीब 29.5 दिन में पूरा होता है.
इस चक्र की शुरुआत अमावस्या से होती है, जब चांद पृथ्वी और सूरज के ठीक बीच में आ जाता है. इस समय चंद्रमा का अंधेरा वाला हिस्सा हमारी तरफ होता है, इसलिए वह आसमान में दिखाई नहीं देता. खास बात यह है कि सूर्य ग्रहण हमेशा अमावस्या के दिन ही लगता है. उदाहरण के लिए, साल 2026 में 17 फरवरी और 12 अगस्त को सूर्य ग्रहण लगेगा.
अमावस्या बीतने के बाद चंद्रमा का आकार धीरे-धीरे बढ़ना शुरू होता है, जिसे शुक्ल पक्ष कहते हैं. सबसे पहले यह एक पतली रेखा जैसा दिखता है, जिसे हम ‘दूज का चांद’ या नया चांद (वैक्सिंग) कहते हैं. इसके कुछ दिन बाद यह आधा दिखने लगता है (वैक्सिंग क्रेसेंट) और फिर धीरे-धीरे आधे से भी ज्यादा बड़ा हो जाता है (वैक्सिंग गिबस). अंत में आती है पूर्णिमा, जब चांद आसमान में एक पूरी गोल गेंद की तरह चमकता है.
पूर्णिमा के बाद चंद्रमा का घटना शुरू होता है, जिसे कृष्ण पक्ष (वेनिंग) कहा जाता है. अब चांद हर रात थोड़ा-थोड़ा छोटा होने लगता है. पहले यह गोल से कम होता है, फिर आधा रह जाता है (वेनिंग गिबस) और अंत में फिर से एक पतली रेखा जैसा दिखने लगता है (वेनिंग क्रेसेंट). लगभग 30 दिन पूरे होते ही चंद्रमा फिर से गायब हो जाता है यानी अमावस्या आ जाती है और यह सुंदर सिलसिला दोबारा शुरू हो जाता है.
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