क्या पाकिस्तान ने खुद ही बम ब्लास्ट करवाए? पाकिस्तान के पुराने पैटर्न क्या बताते हैं?

पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव के बीच 18 सितंबर को कोहाट में पुलिस परिसर पर बड़ा हमला हुआ. इससे ठीक पहले तालिबान ने पाकिस्तान को अफगान संप्रभुता के खिलाफ किसी कार्रवाई पर ‘क्रशिंग रिस्पॉन्स’ की चेतावनी दी थी. क्या दोनों घटनाओं का कोई संबंध है? और क्या पाकिस्तान के पुराने घटनाक्रम इस शक को मजबूत करते हैं?

कहानी शुरू होती है एक चेतावनी से. 18 सितंबर को अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी.

उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान की जमीन पर सैन्य कार्रवाई करता है या उसकी संप्रभुता का उल्लंघन करता है, तो अफगानिस्तान इसका 'क्रशिंग रिस्पॉन्स' देगा.

मुजाहिद ने पाकिस्तान के उस आरोप को भी खारिज किया कि अफगान जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान में हमले करने वाले आतंकियों को ट्रेनिंग, हथियार या पनाह देने के लिए हो रहा है.

सवाल यह है कि तालिबान को अचानक इतनी कड़ी चेतावनी देने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

क्या उसे अंदाजा था कि पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर कुछ करने की तैयारी में है?

या फिर यह सिर्फ दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव की सामान्य प्रतिक्रिया थी?

यहीं से कहानी दिलचस्प होती है.

पाकिस्तान की पूरी कहानी, यहां पढ़ें

और फिर कोहाट में धमाका

तालिबान की चेतावनी के तुरंत बाद पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में बड़ा आतंकी हमला हुआ.

18 सितंबर को शुक्रवार की नमाज के दौरान पुलिस लाइन परिसर की मस्जिद के पास विस्फोट हुआ। इसके बाद हथियारबंद हमलावरों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ हुई.

शुरुआती रिपोर्ट में 21 लोगों की मौत और 103 लोगों के घायल होने की बात सामने आई. मरने वालों में बड़ी संख्या पुलिसकर्मियों की थी. बाद में कुछ रिपोर्टों में मृतकों की संख्या बढ़कर 31 तक बताई गई.

यानी हमला कोई छोटा-मोटा धमाका नहीं था.

यह एक सुरक्षा प्रतिष्ठान को निशाना बनाकर किया गया समन्वित हमला था.

और यही वह बिंदु है जहां सोशल मीडिया और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाना शुरू किया—

क्या यह महज एक आतंकी हमला था या इसके पीछे कोई बड़ा रणनीतिक खेल भी था?

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लेकिन क्या पाकिस्तान ने खुद हमला करवाया?

यहां सबसे जरूरी बात समझना होगा.

इस बात का कोई स्वतंत्र और विश्वसनीय सबूत सामने नहीं आया है कि पाकिस्तानी सरकार या सेना ने कोहाट हमला खुद करवाया.

इसलिए इसे तथ्य की तरह कहना गलत होगा.

लेकिन सवाल यह भी है कि पाकिस्तान में होने वाले आतंकी हमलों का इस्तेमाल वहां की सत्ता अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए कैसे करती है?

यही असली कहानी है.

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा ब्लास्ट (Photo/X)

पाकिस्तान का पुराना पैटर्न क्या कहता है?

पाकिस्तान के इतिहास में कई ऐसे मौके जरूर रहे हैं जब किसी सैन्य अभियान या बाहरी दबाव के बाद देश में आतंकवादी हिंसा बढ़ी.

लेकिन इसे 'पाकिस्तान ने खुद हमला करवाया' कहना और 'हमले का इस्तेमाल राजनीतिक-सैन्य नैरेटिव बनाने के लिए किया गया' कहना—दो बिल्कुल अलग बातें हैं.

उदाहरण: लाल मस्जिद, 2007

2007 में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद पर पाकिस्तान सेना ने कार्रवाई की.

ऑपरेशन के बाद पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों में तेज बढ़ोतरी हुई. अमेरिकी National Counterterrorism Center की रिपोर्ट के मुताबिक, लाल मस्जिद कार्रवाई के बाद FATA के आतंकियों ने पुलिस, सेना और नागरिक ठिकानों पर बदले की कार्रवाई के तौर पर कई हमले किए और 2007 के बाकी महीनों में हमलों की औसत संख्या तेजी से बढ़ी.

यानी यहां उपलब्ध सबूत 'फॉल्स फ्लैग' नहीं, बल्कि retaliatory terrorism की ओर इशारा करते हैं.

यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है.

2009: दक्षिण वजीरिस्तान और पाकिस्तान की सुरक्षा मुश्किल

2009 में पाकिस्तान ने दक्षिण वजीरिस्तान में सैन्य अभियान चलाया.

उसी दौर में पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठानों और सुरक्षा बलों पर कई बड़े हमले हुए.

इन घटनाओं को बाद में पाकिस्तान के आतंकवाद-विरोधी अभियान के संदर्भ में देखा गया.

लेकिन फिर वही सवाल—

क्या ये हमले पाकिस्तान ने खुद करवाए?

ऐसा साबित करने वाला विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है.

बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड में TTP और दूसरे आतंकी संगठनों को इन हमलों का जिम्मेदार बताया गया.

2011: ओसामा बिन लादेन और कराची का नौसैनिक अड्डा

मई 2011 में अमेरिकी SEAL टीम ने पाकिस्तान के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया.

इसके कुछ ही हफ्तों के भीतर कराची के PNS Mehran नौसैनिक अड्डे पर बड़ा आतंकी हमला हुआ.

हमले में सुरक्षा बलों के जवान मारे गए और नौसेना के विमान नष्ट हुए. उस समय तालिबान ने हमले की जिम्मेदारी ली थी.

यह घटना जरूर पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल थी.

लेकिन इसे भी पाकिस्तानी राज्य द्वारा करवाया गया हमला साबित करने वाला प्रमाण नहीं है.

फिर 2014 का पेशावर हमला क्यों महत्वपूर्ण है?

16 दिसंबर 2014 को पेशावर के Army Public School पर हमला हुआ.

यह पाकिस्तान के इतिहास के सबसे भयावह आतंकी हमलों में से एक था.

TTP ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए इसे Operation Zarb-e-Azb का बदला बताया था.

यानी पाकिस्तान की सेना जिस समय आतंकियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन चला रही थी, उसी समय TTP ने सेना के प्रतीकात्मक ठिकाने को निशाना बनाया.

यह पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक त्रासदी थी.

लेकिन यहां भी उपलब्ध प्रमाण TTP की कार्रवाई की ओर इशारा करते हैं, न कि पाकिस्तानी सेना द्वारा कराए गए किसी फॉल्स-फ्लैग ऑपरेशन की ओर.

तो फिर 'फॉल्स फ्लैग' वाली थ्योरी आई कहां से?

यहीं पर इस पूरी कहानी का सबसे विवादित हिस्सा आता है.

पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था में सेना की भूमिका बहुत बड़ी रही है.

जब भी देश किसी बाहरी सैन्य या रणनीतिक दबाव में आता है, वहां सुरक्षा संकट को राजनीतिक और सैन्य नैरेटिव में बदलने की संभावना पर बहस होती रही है.

मसलन—

'हमारे देश के अंदर आतंकवाद बढ़ रहा है.'
'हमें अपनी सेना की जरूरत है.'
'सीमा के दूसरी तरफ आतंकियों के ठिकाने हैं.'
'इसलिए हमें जवाबी कार्रवाई करनी होगी.'

यह नैरेटिव पाकिस्तान के लिए नया नहीं है.

लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि हर आतंकी हमला पाकिस्तानी सेना ने खुद करवाया, तथ्यात्मक रूप से बहुत बड़ा दावा होगा.

फिर कोहाट हमले में नया क्या है?

कोहाट का समय इसे महत्वपूर्ण बनाता है. एक तरफ पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच तनाव बढ़ रहा है.

पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के हमलावर अफगान जमीन का इस्तेमाल करते हैं.

तालिबान इस आरोप को खारिज करता है.

और इसी तनाव के बीच तालिबान का प्रवक्ता कहता है—

अफगान संप्रभुता का उल्लंघन हुआ तो जवाब 'क्रशिंग' होगा.

इसके बाद पाकिस्तान में एक बड़ा हमला होता है.

पाकिस्तान की मस्जिद में आत्मघाती हमले के बाद का नजारा, फोटो ANI

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है:

अभी उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टें इस बात को साबित नहीं करतीं कि कोहाट हमला पाकिस्तानी राज्य ने करवाया था.

AP की 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, हमले में 21 लोगों की मौत हुई, 103 घायल हुए और आठ हमलावर मारे गए. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि किसी संगठन ने तत्काल आधिकारिक तौर पर जिम्मेदारी नहीं ली थी और TTP पर संदेह था.

दूसरी ओर कुछ रिपोर्टों में Hafiz Gul Bahadur से जुड़े गुट द्वारा जिम्मेदारी लेने का दावा किया गया.

इसलिए कहानी अभी पूरी तरह साफ नहीं है.

असली सवाल बम किसने लगाया से बड़ा है

कोहाट की कहानी में सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि—

'बम किसने लगाया?'

बल्कि यह है कि—

'इस हमले से किसे क्या राजनीतिक और रणनीतिक फायदा मिलता है?'

अगर पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर सैन्य कार्रवाई करता है, तो उसका तर्क क्या होगा?

TTP.
आतंकवाद.
सीमा पार आतंकियों के ठिकाने.
राष्ट्रीय सुरक्षा.

और अगर देश के अंदर लगातार बड़े आतंकी हमले होते हैं, तो पाकिस्तान की सेना के पास यह कहने का और मजबूत आधार होगा कि—

'देखिए, हमें पहले अपने घर की सुरक्षा करनी है.'

यही वह जगह है जहां पाकिस्तान की सुरक्षा राजनीति को समझने की जरूरत है.

क्या यह पाकिस्तान का “डबल गेम” है?

पाकिस्तान पर वर्षों से आरोप लगता रहा है कि वह आतंकवादी संगठनों के मामले में दोहरी नीति अपनाता रहा है—कुछ समूहों को रणनीतिक संपत्ति की तरह देखना और कुछ को अपने खिलाफ खतरा मानना.

TTP इसी विरोधाभास की सबसे बड़ी मिसालों में से एक है.

TTP पाकिस्तान राज्य के खिलाफ युद्ध लड़ता है.

उसके निशाने पर पुलिस, सेना और सुरक्षा प्रतिष्ठान रहे हैं.

इसलिए यह कहना कि TTP का हर हमला पाकिस्तान की सेना का बनाया हुआ ड्रामा है, उपलब्ध प्रमाणों से समर्थित नहीं है.

लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि—

क्या पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था इन हमलों को अपने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करती है?

यह एक वैध राजनीतिक-सामरिक प्रश्न है.

और यही कोहाट की असली पहेली है

एक तरफ अफगानिस्तान कह रहा है—

हमारी सीमा में घुसे तो जवाब देंगे।

दूसरी तरफ पाकिस्तान कह रहा है—

अफगान जमीन से हमारे खिलाफ आतंकवाद हो रहा है।

और इसी बीच पाकिस्तान के अंदर एक बड़ा आतंकी हमला हो जाता है.

इन तीनों घटनाओं को जोड़कर 'पाकिस्तान ने खुद बम ब्लास्ट करवाया' कहना अभी जल्दबाजी होगी.

लेकिन इन घटनाओं की टाइमिंग, नैरेटिव और उसके बाद होने वाली संभावित सैन्य कार्रवाई पर नजर रखना बेहद जरूरी है.

क्योंकि दक्षिण एशिया की राजनीति में कभी-कभी असली कहानी बम से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है—

बम के बाद किसे क्या करने का कारण मिल गया.

और कोहाट के मामले में आने वाले दिनों में सबसे बड़ा संकेत यही होगा कि पाकिस्तान इस हमले के बाद अफगानिस्तान के खिलाफ क्या कदम उठाता है.

यही इस पूरी कहानी का अगला अध्याय तय करेगा.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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