अयातुल्ला अली खामेनेई: एक युग का अंत, आखिरी सांस तक इजरायल-US से लड़ते रहे, ऐसा रहा 86 साल का सफर

Iran Ayatollah Ali Khamenei Death: इजरायल और अमेरिकी हमले में ईरान को सबसे बड़ा झटका उनके सुप्रीम लीडर की मौत से लगा है. अयातोल्लाह अली खामनेई अपने कार्यालय में इजरायली एयरस्ट्राइक का शिकार बने. 86 साल के नेता ने ईरान को कई दशकों तक लीड किया. उनकी मौत के बाद मिडिल ईस्ट में भारी उथल पुथल मच सकती है.

Iran Ayatollah Ali Khamenei Death: मध्य पूर्व की राजनीति में शायद ही कोई घटना इतनी दूरगामी साबित हो जितनी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई घोषणा और बाद में ईरानी मीडिया की पुष्टि ने न सिर्फ ईरान बल्कि पूरे क्षेत्र की शक्ति-संरचना को हिला दिया है. यह घटना ऐसे समय में हुई है जब ईरान और इजरायल के बीच सीधा सैन्य टकराव अपने चरम पर है और अमेरिका खुलकर इजरायल के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है. इसी साझा कार्रवाई में 28 फरवरी को ईरान के सुप्रीम लीडर की हवाई हमले में मौत हो गई. 86 साल के खामेनेई का जीवन सफर कैसा रहा? आइए इस पर एक नजर डालते हैं.

मशहद से तेहरान तक: खामेनेई का सफर

अली खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के पवित्र शहर मशहद में हुआ. धार्मिक परिवार में पले-बढ़े खामेनेई ने कम उम्र में कुरान और इस्लामी शिक्षा ग्रहण की. बाद में क़ोम जाकर उन्होंने उन्नत इस्लामी अध्ययन किया, जहाँ वे अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए. 1960 और 70 के दशक में उन्होंने शाह के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. 1979 की इस्लामिक क्रांति ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. क्रांति के बाद वे सत्ता के केंद्र में तेजी से उभरे और रिवोल्यूशनरी काउंसिल के सदस्य बने, फिर रक्षा मंत्रालय में अहम जिम्मेदारी संभाली और अंततः 1981 में ईरान के राष्ट्रपति चुने गए.

सर्वोच्च नेता के रूप में 36 साल

1989 में खोमैनी की मृत्यु के बाद, Assembly of Experts ने खामेनेई को सर्वोच्च नेता नियुक्त किया. यहीं से उनका सबसे लंबा और विवादास्पद अध्याय शुरू हुआ. खामेनेई ने खुद को सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि धार्मिक सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्थापित किया. धीरे-धीरे उन्होंने यह धारणा मजबूत की कि वे ‘धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि’ हैं. इसका संकेत उनके भाषणों और दावों में बार-बार दिखा. उनके शासनकाल में इस्लामिक रिवोल्यूश्नरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ईरान की सबसे ताकतवर संस्था बनकर उभरी. सेना, नौसेना, वायुसेना, खुफिया तंत्र और विदेशी अभियानों तक फैला IRGC, खामेनेई की असली शक्ति था. राष्ट्रपति और संसद से ऊपर, खामेनेई सीधे इसी ढांचे के जरिए अपने फैसले लागू करते थे.

अमेरिका ‘सबसे बड़ा दुश्मन’

खामेनेई की राजनीति का केंद्रबिंदु हमेशा अमेरिका विरोध रहा. वे अमेरिका को ‘ईरान का नंबर वन दुश्मन’ कहते रहे. उनके नेतृत्व में ईरान का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम आगे बढ़ा, जिसने पश्चिमी देशों के साथ तनाव को और गहरा किया. भले ही उन्होंने परमाणु हथियारों पर धार्मिक फ़तवा जारी किया हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय कभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ. इस टकराव की कीमत ईरान को भारी पड़ी. कड़े आर्थिक प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और देश के भीतर बढ़ती बेरोज़गारी व महंगाई. महिलाओं पर सख्ती, राजनीतिक विरोध का दमन और बार-बार कुचले गए जनआंदोलन उनके शासन की पहचान बन गए.

खामेनेई की मौत और क्षेत्रीय भूचाल

अब उनकी मौत ने पूरे मध्य पूर्व को अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया है. ईरान ने 40 दिनों के शोक की घोषणा की है, लेकिन सड़कों पर सन्नाटा और सत्ता के गलियारों में बेचैनी साफ महसूस की जा रही है. सवाल यह है कि क्या इस्लामिक गणराज्य बिना खामेनेई के उसी तरह टिक पाएगा? इजरायल और अमेरिका के लिए यह रणनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इसके परिणाम खतरनाक भी हो सकते हैं. ईरान बदले की कार्रवाई कर सकता है, और क्षेत्रीय युद्ध और व्यापक रूप ले सकता है. खाड़ी देश, इजरायल, लेबनान और इराक सब इसकी चपेट में आ सकते हैं. जिसका संकेत ईरान ने हमले करके दर्शा भी दिए थे. 

ईरान को लगा भारी झटका

पिछले कुछ वर्षों से इजरायल और ईरान के बीच छद्म युद्ध चल रहा था. जिसमें, सीरिया, लेबनान, गाजा और यमन इसके प्रमुख मोर्चे रहे. लेकिन फरवरी के आखिरी सप्ताह में यह संघर्ष खुली जंग में बदल गया, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु, मिसाइल और नेतृत्व से जुड़े ठिकानों पर संयुक्त हमले किए. तेहरान में खामेनेई के कंपाउंड को निशाना बनाया जाना इसी रणनीति का सबसे बड़ा और निर्णायक कदम था. इन हमलों का उद्देश्य केवल सैन्य ढांचे को कमजोर करना नहीं था, बल्कि ईरानी सत्ता की वैचारिक रीढ़ को तोड़ना भी था. खामेनेई की मौत की खबर इसी संदर्भ में सामने आई. यह एक ऐसा झटका जो ईरानी इस्लामिक गणराज्य के लिए केवल सैन्य नहीं बल्कि वैचारिक हार भी मानी जा रही है.

एक युग का अंत

अली खामेनेई का जीवन एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने शाह के खिलाफ संघर्ष से लेकर इस्लामी शासन की सबसे ऊंची कुर्सी तक का सफर तय किया. समर्थकों के लिए वे इस्लामी प्रतिरोध के प्रतीक थे, तो आलोचकों के लिए दमन और तानाशाही का चेहरा. उनकी मौत के साथ ही ईरान के इतिहास का एक निर्णायक अध्याय बंद हो गया है. अब सवाल यह नहीं कि खामेनेई कौन थे, बल्कि यह है कि उनके बाद ईरान क्या बनेगा? 

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लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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