बांग्लादेश-भारत संबंधों के लिए साल 2025 कैसा रहा? खटास, कूटनीतिक तनातनी और इन मुद्दों पर रहे आमने-सामने

India-Bangladesh relations in year 2025: भारत और बांग्लादेश के संबंधों के लिए साल 2025 राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से सबसे चुनौतीपूर्ण वर्षों में गिना जा रहा है. राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न के आरोपों के बीच इस साल भारत और बांग्लादेश के संबंधों में लगातार गिरावट दर्ज की गई.

India-Bangladesh relations in year 2025: 2025 बांग्लादेश के लिए राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से सबसे चुनौतीपूर्ण वर्षों में गिना जा रहा है. सत्ता परिवर्तन, अंतरिम सरकार का दौर, आम चुनाव की अनिश्चितता और क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव ने देश को अस्थिरता के चौराहे पर ला खड़ा किया. इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ा, जहां वर्षों से चले आ रहे भरोसे में दरार दिखी और द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव साफ नजर आया. राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक दबाव और अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न के आरोपों के बीच इस साल भारत और बांग्लादेश के संबंधों में लगातार गिरावट दर्ज की गई. 

अगस्त 2024 में सरकार-विरोधी आंदोलनों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना का सत्ता से हटना और भारत में शरण लेना रिश्तों में खटास का बड़ा कारण बना. आंदोलनों के दौरान कथित हिंसक कार्रवाई में भूमिका को लेकर इस वर्ष एक न्यायाधिकरण ने हसीना की अनुपस्थिति में उन्हें मौत की सजा सुनाई, जिसने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक असहजता और बढ़ा दी. ढाका ने विभिन्न मुद्दों पर भारत के उच्चायुक्त प्रणय वर्मा को पांच बार तलब किया, जबकि नई दिल्ली ने बांग्लादेश के उच्चायुक्त रियाज हामिदुल्ला को एक बार बुलाकर वहां की सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की. 

लंबे समय तक “भारत-समर्थक” मानी जाने वाली अवामी लीग सरकार के स्थान पर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के आने से बांग्लादेश की विदेश नीति का झुकाव बदला हुआ नजर आया. इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत करने की ढाका की कोशिशों ने दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय संतुलन को और जटिल बना दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में वैश्विक शक्तियों की सीमित दिलचस्पी ने बांग्लादेश की स्थिति को और कठिन बना दिया. कई विश्लेषकों के अनुसार, स्पष्ट दिशा के अभाव में ढाका कूटनीतिक रूप से भटकता रहा. निर्वाचित सरकार न होने के कारण 2025 को कुछ विश्लेषकों ने बांग्लादेश के लिए “गायब साल” तक करार दिया, क्योंकि प्रमुख अंतरराष्ट्रीय दूतावासों का संवाद अंतरिम प्रशासन से अधिक उन राजनीतिक दलों के साथ रहा, जिनके भविष्य में सरकार बनाने की संभावना थी.

भारत की ओर से नरमी और परिपक्वता के संकेत

पूर्व राजदूत महफूजुर रहमान ने कहा कि 2025 में बांग्लादेश किसी ठोस विदेश नीति के बिना आगे बढ़ता दिखा. उनके मुताबिक, द्विपक्षीय रिश्तों में आए तनाव को कम करने के लिए भारत की ओर से नरमी और परिपक्वता के संकेत जरूर मिले, लेकिन ढाका ने न तो पहल की और न ही इस अवसर का लाभ उठाया. उन्होंने यह भी कहा कि इसके बजाय अंतरिम सरकार का रवैया अपरिपक्व रहा, जो मुख्य रूप से घरेलू राजनीतिक वर्ग को संतुष्ट करने की कोशिश जैसा प्रतीत हुआ.

साल के अंत तक भारत विरोध चरम पर पहुंचा

साल के आखिरी महीनों में भारत-विरोधी तत्वों के उभार ने क्षेत्रीय चिंता को और गहरा कर दिया. 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद राजनीतिक हिंसा में भी इजाफा देखा गया. भारत-विरोधी बयानों के लिए पहचाने जाने वाले इंकलाब मंच के नेता शरीफ उस्मान हादी की 18 दिसंबर को हत्या के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन और हिंसा फैल गई. इसी दौरान हिंदू समुदाय और मुक्ति संग्राम के पूर्व सैनिकों पर हमलों की खबरें सामने आईं, वहीं मीडिया संस्थानों और सूफी दरगाहों को भी निशाना बनाए जाने के मामले दर्ज हुए.

खालिदा जिया की खराब सेहत भी चर्चा का विषय

राजनीतिक स्तर पर, बीएनपी प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की खराब सेहत भी 2025 में चर्चा का विषय बनी रही. अवामी लीग के राजनीतिक परिदृश्य से लगभग गायब हो जाने के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी, जबकि जमात-ए-इस्लामी ने छोटे दलों के साथ गठजोड़ कर खुद को एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की. यूनुस सरकार ने अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सीमित हो गई.

बांग्लादेश में चुनौतियों की भरमार

छात्र आंदोलनों से जन्मी नई राजनीतिक इकाइयों के उभरने से चुनावी परिदृश्य को नया आयाम मिला. वहीं आर्थिक मोर्चे पर बांग्लादेश को 2025 में सुस्त विकास दर, ऊंची महंगाई, कमजोर निवेश और बढ़ती बेरोजगारी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा. दिसंबर में राष्ट्रीय राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष ने चेताया कि देश “कर्ज के जाल” की ओर बढ़ रहा है. भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का वादा करने वाली यूनुस सरकार पर हाल के महीनों में खुद भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे.

साल के अंत तक बांग्लादेश राजनीतिक अनिश्चितता, आर्थिक संकट और अपने सबसे करीबी पड़ोसी भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बोझ तले खड़ा दिखाई दिया. ऐसे में 2026 के आम चुनाव देश के भविष्य की दिशा तय करने वाले निर्णायक मोड़ के रूप में देखे जा रहे हैं.

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By Anant narayan shukla

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अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने झारखंड विधान सभा 2024, दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 चुनाव और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है.

अनन्त कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं.

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.

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