अमेरिका के सामने इस समय कई बड़ी आर्थिक चुनौतियां खड़ी हैं. देश पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ और दूसरी आर्थिक नीतियों को लेकर भी कारोबार और निवेश में अनिश्चितता बनी हुई है. उधर, अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड 5% के करीब पहुंच रही है.
इसी बीच खबरें हैं कि कुछ बड़े विदेशी निवेशक अमेरिका में अपना निवेश घटाकर दूसरे बाजारों का रुख करने पर विचार कर रहे हैं. यहां तक कि केंद्रीय बैंक भी अपने भंडार में सोने और दूसरी संपत्तियों की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं.
ऐसे में सवाल ये है कि क्या दुनिया धीरे-धीरे अमेरिका से दूरी बना रही है? और अगर ऐसा हो रहा है, तो इसका फायदा भारत को कैसे मिल सकता है? समझते हैं इस लेख में.
अमेरिका पर बढ़ता कर्ज क्यों बना चिंता का कारण?
सबसे पहले बात अमेरिका के बढ़ते कर्ज की.
- रिपोर्ट की मानें तो अमेरिकी सरकार का कुल कर्ज अब 40 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल चुका है. कर्ज बढ़ने के साथ सरकार पर ब्याज का बोझ भी बढ़ रहा है. इसका मतलब हुआ कि है कि अमेरिकी सरकार को अपने कर्ज पर पहले के मुकाबले ज्यादा रकम ब्याज के तौर पर चुकानी पड़ रही है. बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने इस चिंता को और बढ़ाया है.
- अमेरिकी ट्रेजरी ने भी आने वाले कर्ज की जरूरत का बड़ा आंकड़ा पेश किया है. जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में ट्रेजरी को निजी निवेशकों से 739 अरब डॉलर का शुद्ध बाजार आधारित कर्ज लेने का अनुमान है. यह अनुमान मई में लगाए गए अनुमान से 68 अरब डॉलर ज्यादा है.
अब बात करते हैं अमेरिकी बॉन्ड की
- सितंबर में 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी की यील्ड करीब 5% तक पहुंच गई. 11 सितंबर को यह 4.979% के स्तर तक गई और बाद में 4.93% पर आ गई. 16 सितंबर को भी यह करीब 5% के आसपास बनी रही और 5.04% तक पहुंची. इससे अमेरिका के पहले से बड़े ब्याज खर्च पर और दबाव पड़ सकता है.
बॉन्ड की यील्ड बढ़ने का मतलब हुआ कि निवेशक सरकार से ज्यादा रिटर्न मांग रहे हैं. और अगर लंबे समय तक यील्ड ऊंची रहती है, तो नए कर्ज की लागत भी बढ़ सकती है.
- हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि निवेशकों ने अमेरिकी बॉन्ड खरीदना बंद कर दिया है. अमेरिकी ट्रेजरी बाजार अभी भी दुनिया के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा कारोबार वाले वित्तीय बाजारों में शामिल है.
मौजूदा स्थिति को आसान तरीके से ऐसे समझा जा सकता है कि कुछ निवेशक अपने जोखिम को अमेरिका तक सीमित रखने के बजाय दूसरे बाजारों और संपत्तियों में भी पैसा फैला रहे हैं.
विदेशी निवेशक अमेरिका से दूसरे विकल्प क्यों देख रहे हैं?
जानकारों का कहना है कि निवेशकों के सामने सिर्फ अमेरिका का बढ़ता कर्ज ही मुद्दा नहीं है.
- ट्रंप प्रशासन की टैरिफ और व्यापार नीतियों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है. साथ ही, ब्याज दरों का फैसला राष्ट्रपति नहीं बल्कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व करता है. सितंबर 2026 में फेड ने अपनी प्रमुख ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी करके इसे 3.75% से 4% कर दिया.
- ऐसे माहौल में बड़े निवेशक आम तौर पर अपने पैसे को एक ही जगह रखने के बजाय अलग-अलग बाजारों में फैलाने की कोशिश करते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वे अमेरिका छोड़ रहे हैं. बल्कि अमेरिका के साथ यूरोप, जापान, चीन, भारत और सोने जैसे दूसरे विकल्पों पर भी ध्यान बढ़ सकता है.
- इस बदलाव का एक संकेत अमेरिका के केंद्रीय बैंकों के व्यवहार में भी दिखता है. IMF के मुताबिक, 2025 की चौथी तिमाही में दुनिया के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 56.77% थी, जो पिछली तिमाही के 56.93% से थोड़ा कम है. हालांकि डॉलर की हिस्सेदारी घटी जरूर है, लेकिन वह अब भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है.
यानी निवेशक जोखिम कम करने और नए विकल्प तलाशने पर जोर दे रहे हैं और अगर यह आगे बढ़ता है, तो अगला सवाल है ये होगा कि इसका फायदा भारत को कितना मिल सकता है?
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भारत के लिए क्यों बन रहा है बड़ा मौका?
अब सवाल है कि अगर कुछ बड़े निवेशक अमेरिका के अलावा दूसरे बाजारों में मौके तलाश रहे हैं, तो भारत को इसका फायदा कैसे मिल सकता है?
- सीधी बात ये है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस समय मजबूत रफ्तार से बढ़ रही है. अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8% बढ़ी. इस दौरान निजी निवेश करीब 11.9% और विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि 9.2% रही. यानी भारत में खपत के साथ निवेश और उत्पादन भी बढ़ रहा है.
- यही वजह है कि वैश्विक कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार और उत्पादन केंद्र बन सकता है. अगर अमेरिका में टैरिफ, कर्ज और नीतिगत अनिश्चितता के बीच कंपनियां अपने कारोबार का जोखिम अलग-अलग देशों में बांटती हैं, तो भारत को इसका फायदा मिल सकता है.
- इसका असर विदेशी निवेश के रूप में भी दिख सकता है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI बढ़कर 81.04 अरब डॉलर पहुंच गया था, जो एक साल पहले से 14% ज्यादा था.
- मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, दवा, ऑटोमोबाइल और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में नए निवेश की गुंजाइश बन सकती है. किसी विदेशी कंपनी के भारत में कारखाना लगाने का फायदा सिर्फ उस कंपनी को नहीं, बल्कि स्थानीय सप्लायर, लॉजिस्टिक्स और रोजगार को भी मिल सकता है.
- भारत की एक और बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है. यहां आने वाली कंपनियां सिर्फ निर्यात पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि देश के भीतर भी अपना कारोबार बढ़ा सकती हैं.
हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि अमेरिका से निकलने वाला पैसा सीधे भारत आएगा. निवेशक जापान, यूरोप, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे दूसरे बाजारों का रुख भी कर सकते हैं. लेकिन अगर वैश्विक निवेश का नक्शा बदलता है, तो भारत के पास निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार बढ़ाने का बड़ा मौका है.
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