कौन से यूरोपीय देश पाकिस्तान को देते हैं हथियार? जिससे भारत पर हुए हमले; जयशंकर ने उठाए सवाल

Europe Weapon Supply Pakistan: विदेश मंत्री एस. जयशंकर के यूरोपीय हथियारों पर दिए बयान के बाद पाकिस्तान की सैन्य ताकत को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. चीन आज उसका सबसे बड़ा रक्षा साझेदार है, लेकिन पाकिस्तान की सेना, वायुसेना और नौसेना अब भी कई अहम यूरोपीय हथियारों और प्लेटफॉर्म पर निर्भर है.

Europe Weapon Supply Pakistan: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया बयान के बाद पाकिस्तान के रक्षा तंत्र को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. पाकिस्तान की सैन्य ताकत लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर हो चुकी है, लेकिन उसकी थलसेना, वायुसेना और नौसेना आज भी कई महत्वपूर्ण यूरोपीय हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म पर निर्भर है. तो आखिर कौन से देश हैं, जो पाकिस्तान को सैन्य सहायता देते हैं. 

फिनलैंड में आयोजित कुलतारांता टॉक्स कार्यक्रम के दौरान जयशंकर ने यूरोपीय देशों द्वारा पाकिस्तान को हथियार बेचने के मुद्दे को उठाया. भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत ने अमेरिका के कहने पर तेल खरीदा था. इसी के बाद उन्होंने यूरोप के दोहरे रवैये पर भी कटाक्ष किया और कहा कि भारत ने कभी यूरोप की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाला, लेकिन यूरोप से मिले हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया गया. उनके कहने का अर्थ था कि यूरोपीय देश उन्हें हथियार बेचते हैं जो इस्तेमाल भारत पर हमले के लिए करते हैं. 

लंबे समय से यूरोप रहा है पाकिस्तान का सप्लायर

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, 1990 के दशक से लेकर 2010 के दशक तक पाकिस्तान ने अपनी वायुसेना और नौसेना के आधुनिकीकरण के लिए यूरोपीय देशों पर काफी भरोसा किया. उस दौर में पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में यूरोपीय देशों की हिस्सेदारी लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक पहुंच गई थी.

हालांकि हालात अब पहले जैसे नहीं हैं. SIPRI की 2021-2025 अवधि की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान की यूरोपीय हथियारों पर निर्भरता काफी कम हो चुकी है. वर्तमान में नीदरलैंड्स, तुर्किये और ब्रिटेन सीमित स्तर पर पाकिस्तान को रक्षा सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं. 

यूरोपीय देशों में पाकिस्तान को सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने वालों में नीदरलैंड्स सबसे आगे माना जाता है. SIPRI के अनुसार 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में नीदरलैंड्स की हिस्सेदारी 4.6 प्रतिशत रही. डच कंपनी डेमन पाकिस्तान नौसेना के लिए जहाज और गश्ती पोत निर्माण से जुड़ी रही है. 

पाकिस्तान की सेना में आज भी इस्तेमाल हो रहे यूरोपीय हथियार

पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां और सैन्य इकाइयां कई यूरोपीय हथियारों का इस्तेमाल करती हैं. इनमें इटली की बेरेटा और ऑस्ट्रिया की ग्लॉक पिस्तौलें शामिल हैं. इसके अलावा एसआईजी कंसोर्टियम के हथियार, जर्मनी की हेकलर एंड कोच द्वारा निर्मित एमपी-5 सबमशीन गन और जी-3 राइफल भी पाकिस्तान के शस्त्रागार का हिस्सा हैं.

बेल्जियम की एफएन हर्स्टल कंपनी की एफएन पी-90 सबमशीन गन भी पाकिस्तानी बलों के पास मौजूद है. दुनिया के कई देशों की विशेष सुरक्षा इकाइयां और वीआईपी सुरक्षा दस्ते भी इन हथियारों का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा ऑस्ट्रिया निर्मित आर्गेस 84 पी2ए1 ग्रेनेड लांचर, स्पेन का अलकोतान-100 और फ्रांस का एमओ-120-आरटी मोर्टार भी पाकिस्तान के सैन्य उपकरणों में शामिल हैं.

जमीनी वाहनों में भी यूरोप की मौजूदगी

सिर्फ हथियार ही नहीं, पाकिस्तान कुछ यूरोपीय सैन्य वाहनों का भी इस्तेमाल करता है. ब्रिटेन की लैंड रोवर डिफेंडर गाड़ियां और ब्रिटिश मूल का आर्डवार्क माइनस्वीपिंग वाहन आज भी विभिन्न सैन्य भूमिकाओं में इस्तेमाल किए जाते हैं. पिछले साल ब्रिटेन के सैन्य अधिकारियों ने पाकिस्तान का दौरा भी किया था. 

वायुसेना की ताकत में यूरोप का अहम योगदान

हालांकि पाकिस्तान वायुसेना ने हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में चीनी लड़ाकू विमानों को शामिल किया है, लेकिन उसके बेड़े में कई यूरोपीय प्लेटफॉर्म अब भी सक्रिय हैं. फ्रांस के डसॉल्ट मिराज लड़ाकू विमान पाकिस्तान की वायु शक्ति का लंबे समय से हिस्सा रहे हैं. इसके अलावा स्वीडन का साब एरीआई एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम भी पाकिस्तान के पास है, जो हवाई निगरानी और कमांड क्षमताओं को मजबूत बनाता है. 

फ्रांस निर्मित डसॉल्ट फाल्कन-20 विमान का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर मिशनों में किया जाता है. वहीं एमबीडीए स्पाडा-2000 एयर डिफेंस सिस्टम भी पाकिस्तान की वायु रक्षा व्यवस्था में शामिल है.

समुद्री सुरक्षा में भी यूरोपीय प्लेटफॉर्म की भूमिका

पाकिस्तान नौसेना भी यूरोप से मिले प्लेटफॉर्म पर काफी हद तक निर्भर रही है. उसके बेड़े में 1970 के दशक में विकसित फ्रांसीसी अगोस्ता श्रेणी की पनडुब्बियां शामिल हैं. ये लंबे समय से पाकिस्तान की समुद्री रणनीति का अहम हिस्सा रही हैं. इसके अलावा ब्रिटेन निर्मित सी किंग हेलीकॉप्टर भी पाकिस्तान नौसेना के पास हैं. ये हेलीकॉप्टर पनडुब्बी रोधी अभियानों में इस्तेमाल किए जाते हैं और अमेरिकी सिकोरस्की एस-61 के लाइसेंस प्राप्त संस्करण माने जाते हैं.

तुर्किये बना महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार

पाकिस्तान के लिए तुर्किये भी एक अहम रक्षा सहयोगी है. SIPRI के आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान के हथियार आयात में तुर्किये की हिस्सेदारी करीब 7 प्रतिशत है. पाकिस्तान ने तुर्किये से बैयराक्तार टीबी-2 ड्रोन, सैन्य वाहन और नौसेना के लिए विभिन्न जहाज खरीदे हैं. दोनों देश संयुक्त रूप से लड़ाकू विमान विकास परियोजनाओं पर भी काम कर चुके हैं.

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चीन बना पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता

वर्तमान समय में पाकिस्तान की सैन्य जरूरतों का सबसे बड़ा आधार चीन है. SIPRI के अनुसार 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के कुल बड़े हथियार आयात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया. वहीं 2015 से 2024 की अवधि में भी चीन की हिस्सेदारी करीब 78 प्रतिशत रही थी.

पाकिस्तान लंबे समय से चीन से लड़ाकू विमान, युद्धपोत और अन्य उन्नत सैन्य उपकरण खरीदता रहा है. मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के बाद चीन ने पाकिस्तान को जे-10सी लड़ाकू विमान उपलब्ध कराए. इसके अलावा पाकिस्तान ने एफसी-31 स्टेल्थ फाइटर विमान भी हासिल किए हैं. पाकिस्तान को चीन से तोप और टैंक तकनीक में भी चीन से सहायता मिली है. 

वहीं हाल ही में पाकिस्तान को चीन से हैंगोर क्लास की पनडुब्बियों की भी सप्लाई मिलने लगी है. दोनों देशों के बीच 5 अरब डॉलर समझौते के तहत इस तरह की 8 सबमरीन बनाई जानी है, जिसमें से चार चीन में बनेंगी, जबकि चार का निर्माण कराची शिपयार्ड में होगा.  

इसके अलावा पाकिस्तान को अमेरिका से बड़ी सैन्य सहायता मिलती रहती है. पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने 68 करोड़ डॉलर के सैन्य पैकेज को मंजूरी दी थी. 

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By Anant narayan shukla

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उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

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