अफगानिस्तान में सूखे की मार, तालिबान शासन में पानी के लिए तरस रहे किसान

तालिबान के शासन में अफगानिस्तान के किसान भीषण सूखे की मार झेल रहे हैं. बारिश की कमी और पुरानी सिंचाई व्यवस्था के कारण पानी का भारी संकट पैदा हो गया है, जिससे लाखों किसान भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं.

तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान का कृषि क्षेत्र पहले से ही मुश्किलों में है, और अब गंभीर जल संकट ने किसानों की कमर तोड़ दी है. बारिश की कमी और सिंचाई व्यवस्था के बिगड़े हाल के चलते खेती-किसानी पर भारी असर पड़ रहा है, जिससे भुखमरी का खतरा और भी बढ़ गया है.

तालिबान के राज में खेती-बाड़ी की बिगड़ी हालत

2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफ़ग़ानिस्तान की आर्थिक स्थिति वैसे ही ख़राब है. विदेशी मदद में भारी कटौती और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के चलते देश भुखमरी और गरीबी से जूझ रहा है. इस मुश्किल घड़ी में कृषि क्षेत्र, जो कि देश की इकॉनमी का एक बड़ा हिस्सा है, एक और बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है - पानी की कमी.

जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ानिस्तान में बारिश बहुत कम हुई है, जिसका सीधा असर नदियों, नहरों और भूजल स्तर पर पड़ा है. कई इलाके ऐसे हैं जहाँ सिंचाई के लिए पानी बिल्कुल नहीं बचा है. इससे फसलें सूख रही हैं और किसानों को भारी नुकसान हो रहा है.

जल संकट के पीछे की वजहें

इस जल संकट की कई वजहें हैं, जो तालिबान के शासन से पहले भी मौजूद थीं, लेकिन अब और भी ख़तरनाक हो गई हैं:

  • मौसम में बदलाव: जलवायु परिवर्तन का असर अफ़ग़ानिस्तान पर साफ़ दिख रहा है. कम बारिश, लंबी गर्मी की लहरें और अप्रत्याशित मौसम के पैटर्न ने जल स्रोतों को ख़त्म कर दिया है.
  • पुरानी सिंचाई व्यवस्था: अफ़ग़ानिस्तान की ज़्यादातर सिंचाई व्यवस्था पुरानी और जर्जर हालत में है. नहरें ठीक से बनी नहीं हैं, पानी का रिसाव बहुत ज़्यादा होता है, और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल न के बराबर है.
  • प्रशासनिक अनदेखी: तालिबान गवर्नमेंट के सामने देश चलाने की कई प्राथमिकताएँ हैं, और कृषि और जल प्रबंधन पर उनका ध्यान कम है. पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत और नए प्रोजेक्ट्स का काम रुका हुआ है.
  • सीमा पार पानी का मुद्दा: अफ़ग़ानिस्तान के कई प्रमुख नदी स्रोत पड़ोसी देशों से आते हैं, जहां पानी के इस्तेमाल को लेकर अक्सर विवाद होते रहते हैं.

किसानों पर टूट पड़ा दुखों का पहाड़

पानी की कमी का सबसे सीधा और बुरा असर देश के उन लाखों किसानों पर पड़ रहा है जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर हैं.

खतरे में खेती

"कई रिपोर्टों के मुताबिक, देश के दक्षिणी और पश्चिमी इलाके, जो पहले से ही सूखे से जूझ रहे थे, अब सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं. काबुल और कंदहार जैसे बड़े शहरों के आसपास भी किसानों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

  • फसलें सूख रही हैं: गेहूं, मक्का और सब्ज़ियों जैसी मुख्य फसलें, जिन्हें पानी की बहुत ज़रूरत होती है, सूखने लगी हैं. इससे न सिर्फ किसानों की आमदनी ख़त्म हो रही है, बल्कि देश में अनाज की सप्लाई भी कम हो रही है.
  • पशुधन पर असर: पानी की कमी का असर पशुधन पर भी पड़ रहा है. चारे की कमी और सीधे पानी न मिलने के कारण जानवर बीमार पड़ रहे हैं और मर रहे हैं.
  • गांव खाली हो रहे हैं: जब खेती और पशुपालन संभव नहीं होता, तो लोग बेहतर ज़िंदगी की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगते हैं. अफ़ग़ानिस्तान में पहले से ही लोग विस्थापित हैं, और यह जल संकट इस समस्या को और बढ़ाएगा.

भुखमरी का बढ़ता खतरा

विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान में भुखमरी का संकट बहुत गहरा है. लगभग 2 करोड़ 80 लाख लोग, यानी देश की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा, हर दिन भूखे पेट सोने को मजबूर है. जल संकट इस स्थिति को और भी भयानक बना रहा है. जब किसान फसलें नहीं उगा पाएंगे, तो बाज़ारों में अनाज की कमी होगी, और कीमतें आसमान छूने लगेंगी.

अंतर्राष्ट्रीय मदद और तालिबान की भूमिका

अफगानिस्तान में जल संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की सख़्त जरूरत है. कई मानवीय संगठन और देश पानी के कुएं खोदने, सिंचाई के पुराने सिस्टम को ठीक करने और किसानों को सूखे से लड़ने के तरीके सिखाने में मदद कर रहे हैं.

हालांकि, तालिबान गवर्नमेंट के सहयोग और नीतियों का इस पर बड़ा असर पड़ सकता है. अगर वे जल प्रबंधन को प्राथमिकता दें, पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक कराएं, और किसानों को सीधे मदद पहुंचाएं, तो शायद कुछ हद तक इस संकट से निपटा जा सके. लेकिन फिलहाल, देश की अनिश्चित राजनीतिक और आर्थिक स्थिति के चलते इस दिशा में बड़े कदम उठाए जाने की उम्मीद कम नजर आ रही है.

इस स्थिति का सबसे ज़्यादा खामियाजा अफगानिस्तान के उन आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो पहले से ही युद्ध और गरीबी से त्रस्त हैं. जल संकट ने उनकी ज़िंदगी को और भी मुश्किल बना दिया है, और अगर जल्द ही कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो यह एक राष्ट्रीय आपदा का रूप ले सकता है.


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By अमिताभ कुमार

अमिताभ कुमार प्रभात खबर डिजिटल में Sr. Content writer हैं. पिछले 15 साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं.

अमिताभ 1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है.

प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है. 📩 संपर्क : amitabh.kumar@prabhatkhabar.in

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