मौत से चंद कदम दूर, फिर भी रोज 12 घंटे काम कर रहा चीन का ये बिजनेसमैन; दूसरों की जान बचाने के मिशन में लगा

China Cai Lei: चीन के पूर्व ई-कॉमर्स अधिकारी कै लै गंभीर ALS बीमारी से जूझ रहे हैं. वह कंप्यूटर के जरिए अपनी बात कह पाते हैं. लेकिन शरीर का साथ छूटने के बावजूद वह इलाज खोजने के लिए रोज 12 घंटे काम कर रहे हैं.

China Cai Lei: चीन आज विकास और ताकत के सबसे ऊंचे पायदानों पर खड़ा है. वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. उसके पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. उसकी सेना भी टॉप 3 देशों में शुमार है. इसके पीछे चीन का आत्मविश्वास, नेताओं की दूरदर्शिता और ऐसे मेहनतकश लोगों का हाथ है, जिन्होंने अपना सबकुछ खपा दिया. ऐसे ही एक कारोबारी हैं, कै ले; जो मौत के करीब हैं, फिर भी रोज करीब 12 घंटे काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें केवल मौत ही काम करने से रोक सकती है. 

दुर्लभ बीमारी से जूझते हुए भी उम्मीद और हिम्मत की मिसाल बने चीन के कै लै आज भी इलाज की तलाश में जुटे हुए हैं. शरीर धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ रहा है, लेकिन बीमारी को हराने का उनका जुनून अब भी पहले जैसा मजबूत है. वह अपनी बची हुई जिंदगी का हर पल एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) बीमारी का इलाज खोजने में लगा रहे हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, कै लै 48 साल के हैं और वह चीन की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी जेडी डॉट कॉम (JD.com) के पूर्व उपाध्यक्ष रह चुके हैं. 

करीब सात साल पहले उन्हें एएलएस बीमारी का पता चला था. यह एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें धीरे-धीरे शरीर की नसों को नियंत्रित करने वाली मोटर न्यूरॉन्स कमजोर होने लगती हैं. फिलहाल इसका कोई स्थायी इलाज मौजूद नहीं है.

कंप्यूटर की मदद से कहते हैं अपनी बात

समय के साथ कै लै की हालत काफी बिगड़ गई. अब वह न तो ठीक से चल सकते हैं और न ही बोल सकते हैं. कंप्यूटर पर आंखों की मदद से काम करने वाली आई-ट्रैकिंग तकनीक के जरिए वह अपनी बात लिखते हैं और इसी के सहारे अपने काम को आगे बढ़ाते हैं.

उनके सहायक ने चीनी मीडिया संस्थान यितियाओ को बताया कि कै लै कई बार जिंदगी और मौत के बीच की स्थिति से गुजर चुके हैं. एक बार उनके गले में बलगम फंस गया था, जिससे वह करीब एक मिनट तक सांस नहीं ले पाए थे.

अब उनके लिए रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी बेहद मुश्किल हो चुके हैं. कुर्सी से उठने या बिस्तर तक पहुंचने के लिए चार लोगों की मदद लेनी पड़ती है. लंबे समय तक बैठे रहने से मांसपेशियों के कमजोर होने के कारण उन्हें दर्द और सुन्नपन भी महसूस होता है.

इलाज की खोज में करोड़ों रुपये लगाए

कै लै अब बीजिंग एसिकांग मेडिकल टेक्नोलॉजी के चेयरमैन हैं. उन्होंने एएलएस बीमारी पर शोध के लिए 100 मिलियन युआन यानी करीब 15 मिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का दान किया है. उन्होंने इस बीमारी के लिए चार चैरिटी फंड भी बनाए हैं और कई बड़े वैज्ञानिकों व डॉक्टरों के साथ मिलकर रिसर्च लैब स्थापित की हैं.

करीब 200 साल पहले एएलएस बीमारी की पहचान हुई थी, लेकिन आज भी ऐसी कोई दवा नहीं है जो इसके बढ़ने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक सके. कै लै की टीम ने कथित तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा एएलएस रिसर्च डेटा प्लेटफॉर्म तैयार किया है. टीम का दावा है कि इससे दवा बनाने की प्रक्रिया 20 गुना तेज हुई है.

नई दवा से जगी उम्मीद

फिलहाल उनकी टीम 300 से ज्यादा दवा विकास कार्यक्रमों पर काम कर रही है. इस साल की शुरुआत में कै लै ने घोषणा की कि उनकी टीम द्वारा विकसित दवा आरएजी-17 (RAG-17) ने क्लिनिकल ट्रायल में उम्मीद जगाई है. उनका दावा है कि उनकी कंपनी द्वारा बनाई गई एक दवा ने कुछ मरीजों की जिंदगी बचाने में मदद की है. 

यह एक खास जीन म्यूटेशन को निशाना बनाती है. लेकिन वह कै लै और ज्यादातर सामान्य एएलएस मरीजों के लिए कारगर नहीं है. कै लै ने कहा, ‘सबसे अंधेरी रात में भी विश्वास ही पहली चीज है जिसे डगमगाना नहीं चाहिए.’

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चीन में हजारों मरीजों के लिए मदद की कोशिश

चीन में करीब 2 लाख लोग एएलएस बीमारी से प्रभावित हैं. इनमें से कई मरीजों को लगातार मेडिकल सहायता और देखभाल की जरूरत होती है. लेकिन इलाज और देखभाल की तलाश में कई परिवार धोखाधड़ी का भी शिकार हो जाते हैं. इस समस्या को कम करने के लिए कै लै की टीम ने एक ऑनलाइन मिनी-प्रोग्राम भी बनाया है, जो मरीजों को सीधे देखभाल करने वालों से जोड़ता है और इसके लिए कोई एजेंसी फीस नहीं ली जाती.

कै लै की पत्नी डुआन रुई फार्मेसी की पढ़ाई कर चुकी हैं. दोनों का एक बेटा है. डुआन सोशल मीडिया पर ‘ब्रेकिंग द आइस स्टेशन’ नाम से अकाउंट चलाती हैं, जहां वह लाइव स्ट्रीम के जरिए उत्पाद बेचकर वैज्ञानिक शोध के लिए पैसे जुटाने में मदद करती हैं. डुआन ने कहा, ‘मुझे अब भी उनसे बिछड़ने का डर लगता है, लेकिन इसी वजह से मैं उनके साथ बिताए हर पल को और ज्यादा कीमती समझती हूं.’

कै लै की लड़ाई ने चीन के सोशल मीडिया पर भी लोगों को प्रभावित किया है. एक यूजर ने लिखा, ‘एएलएस मरीजों की जिंदगी ऐसी होती है जैसे दिमाग एक ऐसे शरीर में कैद हो जाए जो धीरे-धीरे काम करना बंद कर रहा हो. कै लै एक योद्धा हैं. इंसानी इतिहास साहस की कहानी है.’

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By Anant narayan shukla

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उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

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