भोटेकोशी बाढ़ ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग इलाकों में भारी तबाही मचाई. सोशल मीडिया पर आई तस्वीरों और वीडियो से बाढ़ की भयावहता का अंदाजा लग रहा था. सिर्फ घर, सड़कें और पुल नहीं बहाए, बल्कि देखते ही देखते न जाने कितने परिवारों की पूरी दुनिया उजाड़ दी. अचानक उमड़े सैलाब में लोग संभलने तक का मौका नहीं पा सके. कहीं घरों में चीख-पुकार मची, तो कहीं आंखों के सामने अपने ही पानी की तेज धार में बह गए.नेपाल लाइव के मुताबिक, बाढ़ में लोगों ने घर, जमीन, सामान और कई मामलों में अपने अपनों तक को खो दिया.
जेसीबी के सहारे पहुंची रेस्क्यू टीम
बाढ़ के कुछ ही घंटों बाद रेस्क्यू टीम के साथ प्रभावित इलाकों की ओर रवाना हुए. रास्ते में पुलिस ने खतरे को देखते हुए आगे जाने से सावधान किया, लेकिन पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए टीम आगे बढ़ती रही. धादिंग के बैरेनी बाजार तक पहुंचते-पहुंचते सड़क पर कीचड़ और मलबा जमा था. सामान्य वाहनों से आगे जाना मुश्किल था. इसके बाद टीम ने निर्माण कार्य में लगे जेसीबी की मदद से आगे का सफर तय किया.
‘जिंदगी बची, लेकिन सबकुछ चला गया’
प्रभावित इलाकों में लोगों की हालत बेहद खराब थी. कई लोग किसी तरह अपनी जान बचाकर ऊंचे स्थानों पर पहुंचे थे. उनके घर पानी और मलबे में दब चुके थे. खेतों में लेदो भर गया था और घर का सामान बर्बाद हो चुका था. रसुवा के एक गांव की लक्ष्मी देवी ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने दो बच्चों के साथ बहती नदी से जान बचाई, लेकिन उनका घर, मवेशी और खेत सब कुछ बाढ़ में बह गया. अब उनके पास सिर छिपाने की भी जगह नहीं है.
पुल पर अपनों की तलाश में जुटे लोग
त्रिशूली नदी के पुलों के आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा थे. कुछ लोग बाढ़ से हुए नुकसान को देखने आए थे तो कई अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे थे. किसी का घर बह चुका था तो किसी का अपना ही व्यक्ति लापता था. लोगों की आंखों में अपनों को खोजने की बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी.
बचाव हुआ, लेकिन राहत पहुंचने में लगी देर
बाढ़ के शुरुआती दिनों में सरकारी तंत्र का ध्यान मुख्य रूप से बचाव अभियान पर रहा. स्थानीय निकायों ने भी अपने स्तर पर राहत और अस्थायी व्यवस्था शुरू की. हालांकि, कई प्रभावित गांवों तक राहत सामग्री पहुंचने में कई दिन लग गए. कुछ लोगों ने शुरुआती दो-तीन दिनों तक भोजन और रहने की समस्या की शिकायत की.
वायरल वीडियो के पीछे छिप गई असली कहानी
बाढ़ के भयावह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, लेकिन प्रभावित परिवारों की पूरी कहानी अक्सर सामने नहीं आ पाई. किसका घर था, परिवार कितनी पीढ़ियों से वहां रह रहा था, उसकी आजीविका का आधार क्या था और बाढ़ के बाद उसका भविष्य क्या होगा—इन सवालों पर पर्याप्त ध्यान नहीं गया.
14 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंची टीम
प्रभावित इलाकों में रिपोर्टिंग के दौरान टीम को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. कई जगह सड़कें टूट चुकी थीं. नदी पार करने और मलबे से भरे रास्तों के बीच टीम ने करीब 14 किलोमीटर पैदल चलकर भी प्रभावित बस्तियों तक पहुंचने की कोशिश की. वहां लोगों के सामने घर और खेत खोने के बाद भविष्य की चिंता सबसे बड़ी चुनौती थी.
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