US-इजरायल अटैक से पहले अली खामेनेई बंकर में क्यों नहीं गए? पूर्व सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि ने खोला राज

Ayatollah Ali Khamenei Death: ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामनेई को सुरक्षित बंकर में जाने की सलाह दी गई थी, लेकिन 28 फरवरी को वह वहां नहीं गए. आखिर, बार बार मिल रही चेतावनी के बावजूद उन्होंने ऐसा क्यों किया?

Iran Ayatollah Ali Khamenei Death: 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया. इस अटैक में ईरान के तत्कालीन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. तेहरान में उनके आधिकारिक परिसर पर में बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया था. उनके साथ शीर्ष सैन्य लीडरशिप भी समाप्त हो गई. 86 साल के खामेनेई ने 6 अगस्त 1989 को देश की कमान सुप्रीम लीडर के तौर पर संभाली थी. तब से लगातार वे इजरायली खतरे को मात दे रहे थे, लेकिन 2026 के इस अटैक में उनकी मौत कैसे हो गई, जबकि वे आसानी से सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ सकते थे? भारत में ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने इसका खुलासा किया है. 

हकीम इलाही ने बताया कि अयातुल्ला अली खामेनेई ने बार-बार अनुरोध के बावजूद तेहरान स्थित अपने आवास को छोड़कर किसी सुरक्षित स्थान या बंकर में जाने से इनकार कर दिया था. उनका कहना था कि जब तक ईरान के 9 करोड़ नागरिकों के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध न हो, तब तक वह खुद सुरक्षा नहीं लेंगे.इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि इलाही ने बताया कि 37 वर्षों तक ईरान के सुप्रीम लीडर रहे अली खामेनेई ने उस समय भी अपने घर में ही रहने का फैसला किया, जब तेहरान, वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच तनाव तेजी से बढ़ रहा था.

इलाही ने कहा, ‘मैंने उनकी सुरक्षा टीम से पूछा कि उन्हें किसी सुरक्षित जगह या दूसरे शहर में क्यों नहीं ले जाया जा रहा, क्योंकि उनका कार्यालय और निवास स्थान सबको पता था. उन्होंने बताया कि खामेनेई ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने कहा था कि अगर ‘आप तेहरान के 9 करोड़ नागरिकों के लिए सुरक्षित शरण स्थल उपलब्ध करा सकते हैं, तभी मैं अपना घर छोड़कर कहीं और जाने को तैयार हूं.’

इलाही ने आगे बताया कि उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों से यह भी कहा कि अगर उन्हें दूसरे शहर नहीं ले जाया जा सकता, तो कम से कम उनके लिए घर के बेसमेंट में एक बंकर बना दिया जाए. लेकिन सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि खामेनेई ने इसकी भी अनुमति नहीं दी. उन्होंने कहा था, ‘अगर आप 9 करोड़ ईरानियों के लिए 9 करोड़ बंकर बना सकते हैं, तभी मैं अपने लिए एक बंकर बनाने को तैयार हूं.’

ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यही सवाल खामेनेई के परिवार से भी पूछा गया था. इस पर उन्होंने सुप्रीम लीडर के हवाले से कहा, ‘मैं इस देश का नेता हूं और एक नेता को गरीबों और वंचितों के समान होना चाहिए. अगर मैं अपने लिए अलग और विशेष जीवन जीऊं, तो मैं इस देश का नेता नहीं रह सकता.’

‘खामेनेई शहादत चाहते थे’

अली खामेनेई की मौत रमजान के महीने में हुई है. इलाही ने कहा कि इस्लामी शिक्षाओं में शहादत को सबसे बड़े गुणों में माना जाता है. उन्होंने बताया कि खामेनेई लंबे समय से शहादत प्राप्त करने की इच्छा रखते थे. इलाही ने यह भी कहा कि रमजान के महीने में खामेनेई की शहादत का इस्लाम में विश्वास रखने वालों के लिए अहम स्थान है.

इलाही ने कहा अली खामेनेई ने कहा था, ‘मैं अब बूढ़ा हो चुका हूं, मेरी उम्र 86 साल है और मुझे डर है कि कहीं मेरी मौत अस्पताल में या किसी दुर्घटना या बुखार से न हो जाए. यह मेरे लिए अच्छा नहीं होगा. मैं शहादत प्राप्त करना ज्यादा पसंद करूंगा.’ इलाही के अनुसार, खामेनेई के लिए शहादत उनके जीवन से भी अधिक कीमती थी. 

खामेनेई की शहादत से क्या फायदा हुआ?

इलाही ने कहा, पहला- ‘उनकी शहादत ने सबसे पहले शिया और सुन्नी दोनों मुसलमानों के बीच एकता पैदा की है.’ दूसरा- ‘उनकी शहादत ने उन देशों के अन्याय को उजागर किया है, जो बिना किसी कारण दूसरे देशों पर हमला करते हैं. इस तरह उनकी शहादत से समाज को कई महत्वपूर्ण लाभ और उपलब्धियां मिली हैं.’ उन्होंने कहा, ‘अयातुल्ला अली खामेनेई ने अपना जीवन अल्लाह और अपने लोगों के लिए समर्पित कर दिया था. अल्लाह ने उन्हें सबसे बड़ा सम्मान दिया, जो कि शहादत है, और वह भी अल्लाह के महीने में.’

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‘हम और खून बहाने के लिए तैयार हैं’

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान बातचीत करना चाहता है लेकिन इसके बावजूद अमेरिका का हमला जारी रहेगा. इस पर डॉ. इलाही ने एएनआई से बातचीत में कहा, ‘…यह युद्ध हम पर थोपा गया है और हमें अपना बचाव करना ही होगा. हम अपनी गरिमा, अपनी आजादी और अपने देश के लिए खून बहाने को तैयार हैं. हम अपने दुश्मनों के सामने झुकने के लिए तैयार नहीं हैं. हम इस युद्ध के अंत तक डटे रहेंगे. अगर दुनिया के नेता इस युद्ध को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी आवाज एक साथ उठानी होगी और इसे रोकने की कोशिश करनी होगी…’

ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के इस युद्ध में ईरान को काफी नुकसान झेलना पड़ा है. युद्ध के 15 दिन से ज्यादा बीत जाने के बाद भी यह जारी है. ईरान में अब तक इसकी वजह से 1300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. उसके कई प्रमुख संस्थान तबाह हो चुके हैं. शनिवार को अमेरिका ने ईरान के प्रमुख ऑयल एक्सपोर्टिंग टर्मिनल- खार्ग आईलैंड पर बम बरसाए. ईरान यहां से अपने कुल तेल निर्यात का 90% एक्सपोर्ट करता है. 

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हालांकि, ईरान ने यूएस-इजरायल की इस आक्रामकता का जवाब भी दिया है. उसने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बेस और इजरायल पर काफी मिसाइल और ड्रोन हमला किया है. शनिवार को उसने यूएई के तेल ठिकानों पर भी हमला किया. ईरान ने चेतावनी दी है कि अब अमेरिका और उससे संबंद्ध कंपनियां उसके टारगेट पर हैं. 

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लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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