Ali Khamenei Death Fallout: अमेरिका भले ही अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या को अपनी बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस घटना ने मिडिल ईस्ट में उसकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दी हैं. 86 वर्षीय खामेनेई की मौत से अमेरिका के लिए वे लक्ष्य हासिल करना और कठिन हो गया है, जिन्हें वह बातचीत और दबाव की राजनीति के जरिए पाना चाहता था. इसके साथ ही ईरान में सत्ता परिवर्तन या तख्तापलट की संभावनाएं भी पहले से कहीं ज्यादा उलझ गई हैं. वहीं ईरान पर हमला करके अमेरिका ने ग्लोबल समस्या भी खड़ी कर दी है. 8 पॉइंट्स में समझें दुनिया को आने वाले समय में किन समस्याओं से जूझना पड़ सकता है.
1. उत्तराधिकारी का पता नहीं
ईरान को अंदेशा था कि इस बार के हमले में उसके सुप्रीम लीडर को निशाना बनाया जा सकता है. इसी वजह से उसने पहले ही “4-प्लस फॉर्मूला” तैयार कर लिया था. इसके तहत हर अहम पद के लिए चार संभावित उत्तराधिकारी तय किए गए थे. यानी खामेनेई के भी चार उत्तराधिकारी पहले से चिन्हित थे. हालांकि, पहले यह साफ था कि सत्ता किसके हाथ में है, लेकिन अब हालात धुंधले हो गए हैं. फिलहाल यह तय नहीं है कि फैसले कौन ले रहा है. ईरान ने अभी तक नए सुप्रीम लीडर का ऐलान नहीं किया है, जिससे पर्दे के पीछे रणनीति तैयार की जा रही है. यह स्थिति अमेरिका के हित में नहीं है. क्योंकि जिन नेताओं को खामेनेई के बाद संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है, वे उनसे भी ज्यादा कट्टर विचारधारा वाले हैं और उन्हें दबाव में लाना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा.
2. तख्तापलट की राह अब धूमिल दिख रही
ईरान में सत्ता बदलना अमेरिका के लिए पहले भी आसान नहीं था और अब यह और मुश्किल हो गया है. सिर्फ हवाई हमलों से सरकार बदलना संभव नहीं है. अगर अमेरिका वास्तव में ईरान पर नियंत्रण चाहता है, तो उसे अपने सैनिक जमीन पर उतारने होंगे. रिपोर्ट्स के मुताबिक सत्ता पर पकड़ बनाने के लिए अमेरिका को कम से कम 10 लाख सैनिक ईरान भेजने पड़ सकते हैं. यह फैसला न सिर्फ सैन्य बल्कि राजनीतिक तौर पर भी बेहद जोखिम भरा है. अमेरिकी जनता इस तरह के युद्ध के लिए तैयार नहीं है. सर्वे बताते हैं कि आधे से ज्यादा अमेरिकी नागरिक 10 से ज्यादा सैनिकों की मौत तक को स्वीकार नहीं कर पाएंगे.
3. अमेरिका के खिलाफ ‘लॉन्ग वॉर’ की शुरुआत
खामेनेई की हत्या को ईरान सिर्फ एक सैन्य हमला नहीं, बल्कि इस्लामिक क्रांति पर सीधा हमला मान रहा है. यही वजह है कि अब ईरान की रणनीति “तुरंत जवाब” से आगे बढ़कर लॉन्ग वॉर (दीर्घकालिक युद्ध) की तरफ जाती दिख रही है. रणनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, ईरान जानता है कि वह अमेरिका से सीधे युद्ध में नहीं जीत सकता, लेकिन वह अमेरिका को धीरे-धीरे थकाने की नीति पर काम करेगा, जैसा रूस यूक्रेन युद्ध में हुआ था. अमेरिका को ईरान के आस-पास हैवी मिलिट्री प्रेजेंस बनाए रखनी पड़ सकती है. इसका मतलब यह है कि आने वाले महीनों और सालों में- मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर छिटपुट हमले हो सकते हैं.
4. प्रॉक्सी वॉर में तेजी
ईरान अब तक इजराइल के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर लड़ता आया है. ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्रॉक्सी आर्मी है, जिसमें हिज़्बुल्लाह, हूती, इराक और सीरिया के मिलिशिया शामिल हैं. खामेनेई की मौत के बाद इन सभी संगठनों को अब एक धार्मिक मिशन मिल गया है- “शहीद लीडर का बदला”. ऐसे में आने वाले समय में इजरायल पर खतरा और बढ़ेगा. हालांकि, इजरायल ने समय रहते हमास और हिज्बुल्लाह की लीडरशिप को काफी हद तक कमजोर कर दिया है, लेकिन खत्म नहीं कर पाया है.
5. तेल सप्लाई रूट्स पर दबाव
ईरान की लोकेशन ऐसी जगह है, जहां से दुनिया का 20 % तेल और गैस का परिवहन होता है. फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का पूरा शासन माना जा सकता है. इस संकरे जलमार्ग पर कुछ इलाकों में समुद्र की चौड़ाई 3 किमी तक ही है. ऐसे में ईरान जैसी बड़ी सैन्य ताकत इसे बंद करेगी, तो तेल महंगा हो सकता है, जिसकी वजह से दुनिया भर में अन्य कमोडिटीज की कीमतों में भी तेजी आएगी.
6. अमेरिका के सहयोगियों पर बढ़ता खतरा
खामेनेई की हत्या अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त कार्रवाई थी. इसका सीधा असर अब अमेरिका के उन सहयोगी देशों पर पड़ सकता है, जो मिडिल ईस्ट में ईरान की नजर में हैं. ईरान पहले ही यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और जॉर्डन जैसे देशों को चेतावनी के दायरे में ले चुका है. ईरान की सुरक्षा सर्वोच्च परिषद के सचिव अली लारिजानी ने कहा कि अमेरिका ने “ईरान के दिल पर हमला किया है” और जवाब में ईरान भी “उसके दिल” पर वार करेगा. उनका इशारा सऊदी अरब की तरफ था, जिसे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी रणनीति का केंद्र माना जाता है. इन हमलों की वजह से मिडिल ईस्ट के इन देशों ने अपने एयरपोर्ट बंद कर दिए हैं. भारतीय यात्रियों के साथ दुनिया भर के यात्रियों को इससे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.
7. साइबर अटैक और ड्रोन स्ट्राइक
ईरान वेनेजुएला नहीं है. उसके पास एजुकेटेड लेकिन कट्टर धार्मिक जनता भी है. साइबर हमले भी ईरान की राडार पर होंगे. इसके साथ ही ईरान के पास शाहेद ड्रोन की अच्छी खासी संख्या है. इन्हें दुनिया के बेस्ट ड्रोन माना जाता है और ईरान के पास कुल 80,000 शाहेद ड्रोन हैं. ऐसे में ईरान की ओर से साइबर अटैक और ड्रोन स्ट्राइक्स की बाढ़ आ सकती है.
8. सहानुभूति से मजबूत हुआ इस्लामिक गणराज्य
हालांकि ईरान में लोग सरकार से नाराज़ थे, लेकिन खामेनेई की व्यक्तिगत लोकप्रियता बहुत मजबूत थी. वे आखिरी समय तक आम लोगों से मिलते-जुलते रहे. उनकी मौत ने इस्लामिक गणराज्य को एक बड़ा “सिंपैथी फैक्टर” दे दिया है. रणनीतिक मामलों के जानकार एडम कोचनर के मुताबिक, अमेरिका ने खामेनेई को मारकर उन्हें धार्मिक रूप से ‘शहीद’ बना दिया है. अब ईरानी नेतृत्व इस भावना का इस्तेमाल पूरे देश में करेगा. खामेनेई के नाम पर उनके उत्तराधिकारी अपने कट्टर एजेंडे को और मजबूती से आगे बढ़ा सकेंगे.
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ईरान की सैन्य क्षमता कितनी है?
ईरान के पास भले ही परमाणु हथियार न हों, लेकिन उसकी मिसाइल और ड्रोन क्षमता उसे बेहद खतरनाक बनाती है. ईरान के पास करीब 3,000 मिसाइलें हैं, जिनमें लगभग 1,200 लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं. इसके अलावा शाहेद ड्रोन को दुनिया के सबसे घातक ड्रोन सिस्टम्स में गिना जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के पास करीब 80 हजार शाहेद ड्रोन हैं. जमीनी ताकत की बात करें तो ग्लोबल फायर पावर के अनुसार ईरान के पास लगभग 6 लाख सक्रिय सैनिक हैं. वहीं कुख्यात इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पास करीब 1.5 लाख जवान हैं. इसके अलावा ‘बासिज फोर्स’ के तहत ईरान ने लगभग 1 करोड़ लोगों को सैन्य प्रशिक्षण दे रखा है, जो सीधे IRGC के नियंत्रण में रहते हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संघर्ष अब किसी एक ऑपरेशन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अमेरिका के लिए एक अंतहीन संकट बन सकता है. अमेरिका को हर जगह हाई अलर्ट पर रहना होगा—चाहे वह इराक हो, सीरिया हो, लाल सागर हो या खाड़ी क्षेत्र. यही वजह है कि कई अमेरिकी विश्लेषक कह रहे हैं कि खामेनेई की हत्या से अमेरिका ने भले एक व्यक्ति को खत्म किया हो, लेकिन उसने पूरे सिस्टम को और ज्यादा कट्टर, ज्यादा खतरनाक और ज्यादा संगठित बना दिया है.
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