समुद्र में तैर रहा है 12.4 करोड़ बैरल तेल, अमेरिकी छूट के बाद भारत को होगा सबसे बड़ा फायदा?

Russian Oil on Sea: अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने शुक्रवार को दुनिया भर में रूसी तेल खरीद पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए 30 दिन की खरीद छूट दे दी. यह छूट उन कार्गो शिप के लिए हैं, जो ऑलरेडी समुद्र में हैं. इनमें से ज्यादातर जहाज भारत के ही नजदीक हैं.

Russian Oil on Sea: मिडिल ईस्ट में ईरान युद्ध के कारण तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो गई है. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने का ऐलान 4 मार्च को किया था, 10 मार्च तक आते-आते तेल संकट ने विकराल रूप ले लिया. हालांकि, भारत में गैस संकट ज्यादा है, क्योंकि कतर से होने वाली आपूर्ति बाधित हो गई है. हालांकि, तेल सबसे बड़ी जरूरत है. समुद्र में रूस का 12.4 करोड़ बैरल तेल तैर रहा है. अभी तक इसका कोई खरीददार मुश्किल से मिल रहा था, लेकिन अब इसे लेने के लिए आपाधापी मच गई है. कैसे?

दरअसल, अमेरिका ने गुरुवार को ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के उद्देश्य से समुद्र में फंसे रूसी तेल की खरीद को अस्थायी रूप से मंजूरी दे दी. अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यह ‘सीमित और अल्पकालिक कदम’ है, जो केवल उस तेल पर लागू होगा जो पहले से ही समुद्र में परिवहन के दौरान है. बेसेंट ने कहा, ‘तेल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी एक अल्पकालिक और अस्थायी व्यवधान है, लेकिन लंबे समय में इससे हमारे देश और अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ होगा.’

अमेरिका भले ही इसमें फायदा देख रहा हो, लेकिन अन्य देश जिनके पास रिजर्व नहीं हैं, या जो देश छोटे हैं, उनके लिए मुश्किलें पैदा हो गईं. इसके साथ ही तेल के दाम भी बढ़ने लगे. 2022 के बाद पहली बार तेल ने प्रति बैरल 100 डॉलर का आंकड़ा भी पार कर लिया. सोमवार को कच्चे तेल की कीमत लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थी. मुश्किलें देखकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सभी बड़े पैट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज से अपने रिजर्व तेल को निकालने की अपील की. लेकिन इसके बाद भी मामला शांत नहीं हुआ. तब यूएस ने रूस के तेल की वैश्विक खरीद को मंजूरी दी.

सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 12 मार्च तक दुनिया भर में करीब 30 स्थानों पर लगभग 12.4 करोड़ बैरल रूसी मूल का तेल समुद्र में मौजूद है. यह मात्रा लगभग पांच से छह दिनों की वैश्विक आपूर्ति के बराबर मानी जा रही है. इनमें से सबसे ज्यादा तेल भारत पहुंच सकता है. 

भारतीय सीमा के पास कितना तेल है?

6 मार्च की ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जहाज ट्रैकिंग डेटा के अनुसार यह कच्चा तेल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में मौजूद एक दर्जन से ज्यादा टैंकरों में भरा हुआ है. इन कार्गो के बारे में माना जा रहा है कि या तो इन्हें अभी तक बेचा नहीं गया है या फिर इनके लिए किसी खास बंदरगाह का गंतव्य तय नहीं किया गया है. ऐसे में ये टैंकर एक हफ्ते या उससे भी कम समय में भारत पहुंच सकते हैं. 

इसके अलावा करीब 70 लाख बैरल रूसी यूराल्स तेल लेकर आठ और जहाज सिंगापुर के पास खड़े हैं, जो एक हफ्ते के भीतर भारत पहुंच सकते हैं. इसके आगे भी कई कार्गो भूमध्य सागर और स्वेज नहर के रास्ते पूर्व की ओर बढ़ रहे हैं, जो संभावित रूप से एक महीने से भी कम समय में भारत पहुंच सकते हैं.

भारत क्यों पहुंच सकता है? 

अमेरिका द्वारा तेल खरीद की अस्थायी अनुमति सबसे पहले भारत को ही मिली थी. वॉशिंगटन ने पिछले गुरुवार को भारत को रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की छूट दी थी. हालांकि, भारत ने अमेरिकी बयान का जवाब देते हुए कहा था कि उसे रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिका की इजाजत नहीं है. अब इस खुली छूट के बाद 1.5 करोड़ बैरल से ज्यादा रूसी तेल भारत की पहुंच के भीतर समुद्र में मौजूद है. यह मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति में आई कमी को पूरा करने के लिए भारत के लिए एक त्वरित समाधान साबित हो सकता है.

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रूस को बड़ा आर्थिक फायदा नहीं होगा

यूरोपीय आर्थिक विश्लेषकों ने इस नियम पर कहा कि यह खरीद रूस को बहुत फायदा पहुंचाएगी. हालांकि, अमेरिकी ट्रेजरी बेसेंट ने यह भी कहा कि यह अस्थायी कदम रूसी सरकार को ‘कोई बड़ा आर्थिक फायदा’ नहीं देगा. उन्होंने बताया कि रूस को ऊर्जा क्षेत्र से मिलने वाली ज्यादातर आय तेल के उत्पादन (एक्सट्रैक्शन) के समय लगाए जाने वाले टैक्स से मिलती है. और यह छूट केवल समुद्र में पहले से मौजूद तेल से जुड़े लेन-देन को ही अनुमति देता है.

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की वेबसाइट पर जारी नोटिस के अनुसार, यह छूट उन रूसी कच्चे तेल उत्पादों पर लागू होगी जिन्हें पूर्वी समयानुसार 12 मार्च रात 12:01 बजे तक जहाजों पर लोड किया गया था. ऐसे तेल की खरीद 11 अप्रैल रात 12:01 बजे तक की जा सकेगी.

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भारत ने हाल ही में खरीदा बड़ा कार्गो

इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के दिनों में भारतीय रिफाइनरियों ने 1 करोड़ बैरल से ज्यादा यूराल्स तेल खरीद लिया है. इन कार्गो के लिए उन्होंने ब्रेंट के मुकाबले प्रीमियम कीमत चुकाई है, जिसमें माल ढुलाई और डिलीवरी लागत भी शामिल है. बताया जा रहा है कि इनकी कीमतें पिछले हफ्तों की तुलना में प्रति बैरल लगभग 12 डॉलर तक ज्यादा हैं.

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