”चौरासी” दंगों के बीच सांस लेती एक प्रेम कहानी

इन दिनों नयी हिंदी के दीवानों के बीच सत्य व्यास के नये उपन्यास ‘चौरासी’ का जिक्रेआम है. क्योंकि उनकी दो किताबें ‘बनारस टॉकीज’ और ‘दिल्ली दरबार’ बेस्टसेलर हो चुकी हैं, इन पर फिल्में भी बनने जा रही हैं. पिछले दिनों जब इस किताब की प्री बुकिंग चल रही थी, तो इतने ऑर्डर आये कि प्रकाशक […]

इन दिनों नयी हिंदी के दीवानों के बीच सत्य व्यास के नये उपन्यास ‘चौरासी’ का जिक्रेआम है. क्योंकि उनकी दो किताबें ‘बनारस टॉकीज’ और ‘दिल्ली दरबार’ बेस्टसेलर हो चुकी हैं, इन पर फिल्में भी बनने जा रही हैं. पिछले दिनों जब इस किताब की प्री बुकिंग चल रही थी, तो इतने ऑर्डर आये कि प्रकाशक को पहले संस्करण का प्रिंट ऑर्डर बढ़ाना पड़ा.
चौरासी उपन्यास 1984 के सिख दंगों के दौर में घटी एक प्रेम कहानी है. यह कथा नायक ऋषि के एक सिख परिवार को दंगों से बचाते हुए स्वयं दंगाई हो जाने की कहानी है. कहानी झारखंड के बोकारो शहर में घटती है, जो 84 के भीषण दंगों का गवाह रहा है.
झारखंड के बोकारो से ताल्लुक रखने वाले सत्य व्यास की पहली दो किताबें ‘बनारस टॉकीज’ और ‘दिल्ली दरबार’ कॉलेज रोमांस पर आधारित थीं. चौरासी भी एक प्रेम कथा ही है, लेकिन इसके बैकड्रॉप में 1984 का दंगा है. यह उपन्यास दंगों के बीच प्यार का एक अफसाना है.
इस किताब के बारे में लेखक खुद लिखते हैं…
किरदार के नाम पर कहानी में कुल जमा चार लोग हैं. ऋषि जो पहला किरदार है. 23 साल का लड़का है. बचपन में ही मां सांप काटने से मर गयी और दो साल पहले पिता बोकारो स्टील प्लांट में तार काटने में जाया हो गये.
अपने पीछे ऋषि के लिए एक मोटरसाइकिल और एलआइसी के कुछ कागज छोड़ गये. ऋषि ने कागज फेंक दिया और मोटरसाइकिल रख ली. पिछले दो सालों से बिला नागा बोकारो स्टील प्लांट के प्रशासनिक भवन के बाहर पिता की जगह अनुकंपा पर नौकरी के लिए धरने पर बैठता है.
मेधावी है तो बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर खर्च निकाल लेता है. मुहल्ले के सारे काम में अग्रणी है. आप कोशिश करके भी किसी काम से थक गये हैं तो ऋषि ही उसका इलाज है.
मोटर, बिजली बिल, चालान, जलावन की लकड़ी, कोयला, मिट्टी तेल, बिजली मिस्त्री, राज मिस्त्री इत्यादि सबका पता सबका समाधान ऋषि के पास है.
दूसरे किरदार छाबड़ा साहब हैं. छाबड़ा साहब सिख हैं. पिता की ओर से अमृतधारी सिख और माता की ओर से पंजाबी हिंदू. अपने घर में सबसे पढ़े-लिखे भी. मसालों का खानदानी व्यवसाय था मोगा में. अगर भाइयों से खटपट नहीं हुई होती तो कौन आना चाहता है इन पठारों में अपना हरियाला पिंड छोड़ कर! अपने गांव, अपने लोग छोड़ कर! बोकारो शहर के बसते-बसते ही छाबड़ा साहब ने अवसर भांप लिया था और यहां चले आये.
थोड़ी बहुत जान-पहचान से कैंटीन का काम मिल गया. पहले काम जमाया, फिर भरोसा. काम अच्छा चल पड़ा तो एक बना-बनाया घर ही खरीद लिया. ऋषि ने इनके कुछ अटके हुए पैसे निकलवा दिये थे, इसलिए ऋषि को जब कमरे की जरूरत पड़ी तो छाबड़ा साहब ने अपना नीचे का स्टोरनुमा कमरा उसे रहने को दे दिया.
उनकी बेटी ‘मनु’ ही इस कहानी की धुरी है. मनजीत छाबड़ा. मनु जो मुहल्ले में रूप-रंग का पैमाना है. मुहल्ले में रंग दो ही तरह का होता है- मनु से कम या मनु से ज्यादा. आंखें भी दो तरह की- मनु से बड़ी या मनु से छोटी. मुस्कुराहट मगर एक तरह की ही होती है- मनु जैसी प्यारी. ‘आये बड़े’ उसका तकिया कलाम है जिसके जरिये वह स्वत: ही सामने वाले को अपने स्तर पर ले आती है.
भोली इतनी कि रास्ते में मरे जानवर की दुर्गंध पर छाबड़ा साहब अगर सांस बंद करने को कहें तो तब तक नहीं खोलती जब तक वह सांस छोड़ने को न कह दें.
बीए प्रथम वर्ष की छात्रा है और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी सिर्फ इस भरोसे से करती है कि एक दिन ऋषि उसे भी पढ़ायेगा. ऋषि एक-दो बार इसके लिए यह कह कर मना कर चुका है कि वह स्कूल के बच्चों को पढ़ाता है, कॉलेज के बच्चों को नहीं. चौथा और सबसे महत्वपूर्ण किरदार यह साल है, 1984. साल जो कि दस्तावेज है. साल जो मेरी छाती पर किसी शिलालेख की भांति खुदा है. मैं न भी चाहूं तो भी तारीख मुझे इसी साल की बदौलत ही याद करेगी, यह मैं जानता हूं.

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