कई महिलाएं हैं, जो करना तो बहुत कुछ चाहती हैं, पर मजबूरियों के आगे अपने सपनों से समझौता कर लेती हैं. पर बंशीशिखा रॉय ने न केवल पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाते हुए बेटे को एनडीए की नौकरी के लिए तैयार किया, बल्कि उसके बाद खुद का कुछ करने का सपना भी साकार किया.
मूलत: बंसीशिखा सियालदह की रहनेवाली हैं, जो अब पटना में बस चुकी हैं. उनकी शादी 1990 में हुई. पति के तबादलेवाली नौकरी की वजह से कई शहरों में उनका जाना हुआ. इस बीच दो बच्चे हुए. उनकी परवरिश, पढ़ाई-लिखाई के बीच अपने सपने धरे रह गये. एक रोज बेटे को एनडीए में पायलट की नौकरी मिल गयी. तब लगा कि एक होमवर्क पूरा हुआ, अब दूसरे होमवर्क में जुट जाना चाहिए. मन में सोये वर्षों के ख्वाब को फिर से जगाया.
कुछ नया करना था मुझे
बंसीशिखा कहती हैं कि बच्चे की नौकरी हो गयी, तो मेरे पास कोई काम ही नहीं होता था. मैं बंगाल से थी और मैंने देखा कि बिहार में बंगाल का कोई भी आयटम बहुत ही महंगा मिलता है. सोचा कि क्यों न वहां से कोई खास चीज यहां लाकर बेची जाये. फिर बंगाल से महिलाओं के लिए ड्रेस मटेरियल लाने की सोची, जिस पर कांथा वर्क के जरिये कुछ नया करने की योजना बनायी. इस काम में मैं माहिर रही हूं.
नयी कलाकृतियों को जोड़ा
बंशीशिखा सियालदह से कपड़ा लेकर वहीं कांथा वर्क करवा कर बिहार लाती हैं, क्योंकि वहां यह काम सस्ते में हो जाता है. पहले पटना में वह घर से सारा कारोबार किया करती थीं. वे बताती हैं, मुझे उपेंद्र महारथी केंद्र, पाटलिपुत्र में एक जगह भी मिल गयी है. यहां अपना एक स्टॉल लगाया है. इससे बिहार के लोगों को कांथा वर्क का सामान सस्ते में मिल जाता है. कांथा वर्क में पहले फुल-पत्ती का ही वर्क होता था, लेकिन अब उसमें राम-सीता विवाह आदि कलाकृतियों को भी मैंने जोड़ दिया है. इससे लोगों से अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.
रांची से हुई थी शुरुआत
बंशीशिखा के मुताबिक 2010 में पांच हजार रुपये की पूंजी लगा कर इसे शुरू किया था. तब वह रांची में थीं. आज दो लाख रुपये तक का बिजनेस कर लेती हैं. अब पटना में भी यह काम चल पड़ा है. कांथा वर्क से बने सूट पीस के अलावा साड़ी और ड्रेस मेटेरियल भी रखती हैं. वे कहती हैं, मैं खुश हूं कि बंगाल के कांथा वर्क को बिहार और झारखंड के लोगों में किफायती दर में पहुंचा रही हूं. आज अपने पैरों पर खड़ी हूं.
