वीना श्रीवास्तव
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बिहार में शराबबंदी से वे पत्नियां और बच्चे बहुत खुश होंगे, जिनके घर शराब पीने की लत से बरबाद हो रहे थे. हालांकि चोरी-छुपे-ब्लैक में मिलना शायद जारी रहे, मगर इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं होगी जैसे पहले मिलती थी. इस ऐतिहासिक फैसले के लिए बिहार सरकार का बहुत-बहुत धन्यवाद. झारखंड के गांवों में भी महिलाओं ने नशा मुक्ति के लिए मुहिम चलायी हुई है.
जहां-जहां महुआ से शराब और चावल से हड़िया बनती है, बिकती है, वे महिलाएं लाठी-डंडे लेकर वहां जाकर विरोध करती हैं. सारी शराब फेंक देती हैं और साथ ही नशा करनेवाले पुरुषों की पिटाई भी करती हैं. अभी दो सप्ताह पहले ही एक मेल आपसे शेयर किया था, जो एक विवाहिता का था. महिला ने लिखा था कि वह अपने जीवन से खुश नहीं है और शादीशुदा जीवन से छुटकारा चाहती है, क्योंकि उसका पति बहुत शराब पीता है.
मगर वह अपने पति से इतना प्यार करती है कि छोड़ कर नहीं जा पा रही. उन सभी महिलाओं को बधाई जिनके पतियों को शराब की लत थी. जिस किसी के घर में कोई भी पुरुष नशे का सेवन करता है, उन सबसे यही कहूंगी कि वे हौसला बनाये रखें. स्वयं पर विश्वास रखें. बस अपने विश्वास व हौसले को न टूटने दें, क्योंकि जहां हौसला टूटता है वहीं कदम डगमगाते हैं. पंख भले ही कमजोर हों, मगर हौसला है तो ऊंची उड़ान से कोई नहीं रोक सकता. आप सब अपनी दुआओं में ये जरूर मांगें कि ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे. सबके मार्ग का अंधकार दूर करे. इनसान कभी अपना विवेक न खोये.
जिसे दुख दे, उसे दुख सहने की क्षमता भी दे. जब आप सबके लिए ईश्वर से दुआ करेंगे तो आपको खुद को अच्छा लगेगा. मन से हल्का महसूस करेंगे और कहा जाता है न- दूसरों का भला चाहनेवालों का ईश्वर कभी भी बुरा नहीं करते. ये तो दोनों हाथों में लड्डू होने जैसी बात हुई न ! इसलिए अबसे अपनी दुआओं में सबको शामिल करिए और अपने बच्चों को भी सबके हित की बात सोचने के लिए प्रेरित कीजिए.
एक अच्छी खबर बिहार की थी और दूसरी दुखद खबर झारखंड के जमशेदपुर की है. आनंदी के नाम से घर-घर पहचान बनानेवाली प्रत्युषा बनर्जी ने आत्महत्या कर ली. हालांकि हत्या या आत्महत्या कहा नहीं जा सकता मगर प्रथम दृष्टया तो आत्महत्या ही माना जा रहा है.
प्रत्युषा की मृत्यु से आज के युवाओं को सबक लेने की जरूरत है. उसे उसके परिवारवालों ने बार-बार समझाया, मगर वह गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे रही. लड़कियों को यह सोचना होगा कि जो लड़का विवाह से पहले लड़की के साथ मारपीट करे, यहां तक कि सबके सामने हाथ उठाये, वह भला किस तरह से विवाह के काबिल हो सकता है?
जो महिला का मान-सम्मान न जाने, वह जीवनसाथी बनने योग्य नहीं. यह बात आज की लड़कियों को समझनी होगी. अगर माता-पिता अपने अनुभवों के आधार पर कुछ कहते हैं, तो उसको नजरंदाज नहीं करना चाहिए. महानगरों और खासकर फिल्म इंडस्ट्री की दुनिया ही चकाचौंध की है.
इससे पहले भी कई अभिनेत्रियों, मॉडलों ने आत्महत्या की जिसकी वजह उनका यौन शोषण था. सब गंवाने के बाद भी वे असफल रहीं. उनमें इतनी हताशा भर गयी कि जीवन की किरणें भी उनको जलाने लगीं और उन्होंने जीवनलीला खत्म कर ली. इतनी महत्वाकांक्षा पालना भी अच्छा नहीं जिसके लिए आपको किसी भी स्तर तक जाकर समझौते करने पड़ें.
बचपन से ही ‘बिली ग्राह्म’ की यह कोटेशन अपने पापा से अकसर सुनी- “व्हेन वेल्थ इज लॉस्ट नथिंग इज लॉस्ट, व्हेन हेल्थ इज लॉस्ट समथिंग इज लॉस्ट, व्हेन करेक्टर इज लॉस्ट एवरीथिंग इज लॉस्ट” यानी अगर धन खोया तो वास्तव में कुछ नहीं खोया, अगर स्वास्थ्य खोया तो कुछ खोया, मगर जब चरित्र खोया तो समझो सबकुछ खो गया.
इसीलिए मुझे लगता है कि जो बातें हम बच्चों के मन में, चरित्र में, उनके व्यक्तित्व में डालना चाहते हैं, वे बातें माता-पिता को उनके सामने बचपन से ही दोहरानी चाहिए क्योंकि उस समय कही गयीं बातें बच्चों के मन में कहीं गहरे पैठ जाती हैं जो आसानी से नहीं निकलतीं और जब भी उससे संबंधित कोई वाक्या या मौका आता है, वे बातें जेहन में बिजली की तरह कौंधती हैं. महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है. होना भी चाहिए, मगर उस महत्वाकांक्षा के पूरे होने या न होने के बीच बहुत बारीक-सी लाइन होती है, जिसे झीना-सा परदा कहेंगे, अभिभावकों को बच्चों को उस बारीक लाइन का फर्क समझाना होगा.
उनको महत्वाकांक्षी बनाइए मगर उनको समझाइए कि अपना रिमोट अपने हाथों में रखें. उनका रिमोट किसी और के हाथों में नहीं जाना चाहिए. अकसर ऐसा होता है कि उनकी महत्वाकांक्षा उनकी कमजोरी बन कर सब कुछ छीन लेती है. एक और कोटेशन है एलबर्ट आइन्स्टीन की- “वीकनेस ऑफ एटिट्यूड बिकम्स वीकनेस ऑफ करेक्टर” यानी प्रवृत्ति की कमजोरी चरित्र की कमजोरी बन जाती है‘ अपने एटिट्यूड को अपने करेक्टर की कमजोरी न बनने दें.
आप सब 17-18 वर्ष के होते ही घर से दूर पढ़ने चले जाते हैं, पहले पढ़ाई, नौकरी और फिर विवाह करके. उसके बाद आप हमेशा बाहर ही रहते हैं. हमेशा दिल की बात सुनें, मगर कभी-कभी दिमाग से भी काम लेना चाहिए. अगर प्रत्युषा ने भी दिमाग से काम लिया होता, घरवालों की बात मानी होती, तो वह टेलेंडेड लड़की आज हमारे बीच होती. छोटी उम्र में ब्वॉय-गर्लफ्रेंड जैसी बातों से दूर रहिए. जब बड़े धोखा खा जाते हैं, तो छोटे बच्चे तो छोटे ही हैं.
अपने फैसलों में अपने माता-पिता की राय जरूर लें. अब भी वक्त है आप संभल जाइए और अपनी पढ़ाई पर ही ध्यान केंद्रित रखिए. संतोष ही असली धन है. इस संतोष को अपने जीवन में उतारिए.
क्रमश:
