गौतम नवलखा केस की सुनवाई से क्यों अलग हो रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के जज

<figure> <img alt="सुप्रीम कोर्ट" src="https://c.files.bbci.co.uk/43DA/production/_105907371_0f622dab-37c7-4965-8213-f39f25b845d4.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p>&quot;बतौर एक संस्था पारदर्शिता जिसकी पहचान है, उस सुप्रीम कोर्ट में बड़ी ज़िम्मेदारी निभा रहे जजों से इतनी उम्मीद तो की जाती है कि वे किसी केस की सुनवाई से अलग होने की वजह बताएं ताकि लोगों के दिमाग़ में ग़लतफ़हमी न पैदा हो…&quot; </p><p>नेशनल […]

<figure> <img alt="सुप्रीम कोर्ट" src="https://c.files.bbci.co.uk/43DA/production/_105907371_0f622dab-37c7-4965-8213-f39f25b845d4.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p>&quot;बतौर एक संस्था पारदर्शिता जिसकी पहचान है, उस सुप्रीम कोर्ट में बड़ी ज़िम्मेदारी निभा रहे जजों से इतनी उम्मीद तो की जाती है कि वे किसी केस की सुनवाई से अलग होने की वजह बताएं ताकि लोगों के दिमाग़ में ग़लतफ़हमी न पैदा हो…&quot; </p><p>नेशनल ज्यूडिशियल एप्वॉयंटमेट्स कमीशन ऐक्ट को असंवैधानिक क़रार देने वाले <a href="http://s3.documentcloud.org/documents/2461419/njac-judgment.pdf">जजमेंट</a> में जस्टिस जोसेफ़ कुरियन ने जब ये लिखा था तो इसकी उम्मीद कम ही लोगों को रही होगी एक दिन उसी सुप्रीम कोर्ट में गौतम नवलखा का मामला आएगा और ये सवाल फिर से सबके सामने होगा कि आख़िर जज बिना कोई वजह बताए क्यों सुनवाई से अलग हो रहे हैं.</p><p>इसी सोमवार (30 सितंबर) को पहले चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई, मंगलवार को जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस बी सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई, और गुरुवार को जस्टिस रवींद्र भट ने भी गौतम नवलखा के केस की सुनवाई कर रही बेंच से अलग होने की घोषणा कर दी.</p><p>दिलचस्प बात ये है कि न तो जस्टिस रवींद्र भट ने और न ही चीफ़ जस्टिस गोगोई ने और न ही सुनवाई से अलग होने वाले सुप्रीम कोर्ट के बाक़ी तीन जजों ने ऐसा करने की कोई वजह बताई.</p><p>किसी मामले की सुनवाई कर रही बेंच से किसी जज के अलग होने का मतलब ये भी होता है कि अब वो मुक़दमा एक नई बेंच को भेजा जाएगा यानी गौतम नवलखा मामले की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट जजों की नई पीठ करेगी. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने गौतम नवलखा की गिरफ़्तारी पर 15 अक्तूबर तक के लिए रोक लगा दी है. </p><h1>कौन हैं गौतम नवलखा</h1><p>पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफ़आईआर से पहले गौतम नवलखा को लोग एक पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर जानते थे. हालांकि ये एफ़आईआर 8 जनवरी, 2018 को दर्ज हुई थी लेकिन गौतम नवलखा का नाम इसमें सात महीने बाद 22 अगस्त को जोड़ा गया.</p><p>नवलखा इसी एफ़आईआर को रद्द कराने और गिरफ़्तारी से बचने के लिए बंबई हाई कोर्ट में खारिज़ होने के बाद और अब सुप्रीम कोर्ट में अपनी अपील पर सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन जजों के एक-एक करके हटते जाने से मामले में एक अजीब असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है.</p><p>आठ साल पहले इन्हीं <a href="https://www.hindustantimes.com/india/naxals-to-release-five-abducted-jawans-in-chhattisgarh/story-eansEdTG88bseerHDcBL7I.html">गौतम नवलखा</a> से छत्तीसगढ़ आर्म्ड फ़ोर्स के पांच जवानों की माओवादियों की क़ैद से रिहाई के लिए सरकार ने मदद मांगी थी. साल भर बाद नवलखा को <a href="https://www.hindustantimes.com/india/naxals-to-release-five-abducted-jawans-in-chhattisgarh/story-eansEdTG88bseerHDcBL7I.html">श्रीनगर एयरपोर्ट</a> पर ये कहते हुए रोक दिया गया कि वे कश्मीर की स्थिरता और शांति के लिए ख़तरा हैं. </p><p>नवलखा कहते हैं कि वे वामपंथी अतिवादी हिंसा के ख़िलाफ़ हैं लेकिन भीमा कोरेगांव मामले में पुणे पुलिस की चार्जशीट इसके उलट कहानी कहती है. वे अनलॉफ़ुल एक्टिविटिज़ प्रिवेंशन एक्ट (ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून) के तहत आतंकवादी गतिविधियों और इसके लिए पैसा इकट्ठा करने जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं.</p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-49727361?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव हिंसा मामला: गिरफ़्तारी के एक साल बाद ना तो जमानत और ना ही सुनवाई</a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-46715272?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव हिंसा के साल भर बाद कैसा है हाल</a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-45364180?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव हिंसा से पहले ‘यलगार परिषद’ में क्या हुआ था?</a></p><h1>सुनवाई से क्यों अलग होते हैं जज</h1><p>किसी केस की सुनवाई से किसी जज का अलग होना कोई नई और अनूठी बात नहीं है. इसकी न्यायिक परंपरा रही है और इसे दलीलों के आधार पर वाजिब ठहराया जा सकता है.</p><p>सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट सूरत सिंह कहते हैं, &quot;केस से ख़ुद को अलग करते समय इसकी वजह बताई जानी चाहिए. इसकी एक वजह हितों का टकराव हो सकता है. कई बार जज अतीत में बतौर वकील किसी पार्टी के लिए पैरवी कर चुके होते हैं. अगर जज को किसी क़िस्म का कोई ख़तरा महसूस हो रहा है. केस से किसी तरह का जुड़ाव या मामले से जुड़ी किसी पार्टी से कोई संबंध हो तो इनमें से कोई भी वजह होती है. लेकिन हमें इस मामले में इसकी वजह नहीं मालूम है.&quot; </p><p>ज्युडिशियल प्रोपराइटी (न्यायिक मापदंड) के स्टैंडर्ड पहले से बने हुए हैं. </p><p>इस पर एडवोकेट सूरत सिंह आगे कहते हैं, &quot;जजों से ये उम्मीद की जाती है कि अगर वे पार्टी या केस से किसी तरह से जुड़े हुए हैं तो वे इसके बारे में पहले ही बता दें या ख़ुद को मामले से अलग कर लें. इंसाफ़ न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए भी दिखना चाहिए.&quot;</p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-48552101?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव: सुधा भारद्वाज अब तक जेल में क्यों?</a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-45328262?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव: पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ता गिरफ़्तार</a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-46249504?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">हिरासत में लिए गए सामाजिक कार्यकर्ता वरवर राव </a></p><figure> <img alt="चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई" src="https://c.files.bbci.co.uk/15B6F/production/_109034988_53d2cc46-9307-4e59-88e4-6898637002fd.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> <figcaption>चीफ़ जस्टिस ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा के ख़िलाफ़ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने की याचिका पर सुनवाई से सोमवार को खुद को अलग कर लिया था</figcaption> </figure><h1>न्यायपालिका का पक्ष</h1><p>एनजेएसी जजमेंट के समय जस्टिस कुरियन ने जो कहा था, वो एक आदर्श स्थिति है. लेकिन किसी मुक़दमे की सुनवाई से ख़ुद को अलग करने की वजह बताने के लिए जज बाध्य नहीं हैं.</p><p>मुंबई हाई कोर्ट के जस्टिस (रिटायर्ड) पीबी सावंत कहते हैं, &quot;कोई जज किसी मामले से ख़ुद को तब तक अलग नहीं करता है, जब तक कि इसकी कोई वजह न हो. पहले भी कई बार एक या दो जजों ने किसी केस की सुनवाई से ख़ुद को अलग किया है. हां, ये ज़रूर है कि पहली बार किसी मामले में पांच जजों ने ख़ुद को सुनवाई से अलग कर लिया.&quot;</p><p>इसकी क्या वजह हो सकती है, इस सवाल पर जस्टिस सावंत कहते हैं, &quot;किसी केस से ख़ुद को अलग करने के फ़ैसले के पीछे कुछ निजी कारण हो सकते हैं. हो सकता है कि वे इसके बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहें. हम जजों की निजी ज़िंदगी में दख़ल नहीं दे सकते हैं. मुमकिन है कि इस मामले में जजों को पार्टी से पहले किसी तरह का कोई संपर्क रहा हो. हो सकता है कि कुछ लोगों ने उनसे संपर्क किया हो. कोई भी वजह हो सकती है. वे ये भी कह सकते हैं कि वे इसकी कोई वजह नहीं बताना चाहते हैं जिससे अभियुक्त के साथ किसी तरह का पक्षपात हो.&quot;</p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-46000851?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव: फ़रेरा और गोंज़ाल्विस फिर से हिरासत में</a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-45545359?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में अगली सुनवाई 19 को </a></p><p><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-47098666?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">आनंद तेलतुंबड़े को पुणे पुलिस ने तड़के 4 बजे गिरफ़्तार किया</a></p><h1>पहले भी केस से अलग होते रहे हैं जज</h1><p>इसी साल फ़रवरी में सीबीआई के अंतरिम डायरेक्टर के तौर पर एम नागेश्वर राव की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से चीफ़ जस्टिस गोगोई ने ख़ुद को अलग कर लिया था और उनके बाद जस्टिस सिकरी और जस्टिस एनवी रमन्ना भी इस केस से हट गए थे.</p><p>हालांकि तब उनके हटने की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई थी. पर बाद में ये बातें सामने आईं कि चीफ़ जस्टिस नए सीबीआई डायरेक्टर को चुनने के लिए बनी सेलेक्शन कमेटी का हिस्सा थे और जस्टिस सिकरी सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को हटाने की सिफ़ारिश करने वाले पैनल में थे. </p><p><a href="https://www.news18.com/news/india/third-sc-judge-recuses-from-hearing-plea-against-nageswara-raos-appointment-as-interim-cbi-chief-2020065.html">जस्टिस रमन्ना</a> ने ये कहते हुए मामले से ख़ुद को अलग कर लिया था कि &quot;नागेश्वर राव मेरे गृह राज्य से हैं और मैं उनकी बेटी की शादी में शरीक हो चुका हूं.&quot; </p><p>कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट में फार्मा कंपनी <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/india/Novartis-case-How-two-SC-judges-had-recused-themselves-from-the-case/articleshow/19334224.cms">नोवार्टिस</a> केस पर सुनवाई से पहले जस्टिस मार्कंडेय काटजू और बाद में जस्टिस दलवीर भंडारी ने ख़ुद को अलग कर लिया था. तब नोवार्टिस केस में जस्टिस काटजू के एक पुराने लेख का ज़िक्र आया था जिसमें उन्होंने बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को उदारता से फार्मा पेटेंट दिए जाने का विरोध किया था. </p><p>इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन के एक इंटरनेशन कॉन्फ़्रेंस में जस्टिस भंडारी के भाग लेने के कारण उन्हें स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा था. दरअसल, नोवार्टिस इस एसोसिएशन का हिस्सा था.</p><h1>क्या है भीमा कोरेगांव मामला</h1><p>मराठा सेना और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध की 200वीं सालगिरह के मौक़े पर 31 दिसंबर, 2017 के दिन ‘भीमा कोरेगांव शौर्य दिवस प्रेरणा अभियान’ के बैनर तले कई दलित संगठनों ने मिलकर एक रैली आयोजित की थी. इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ़ से महार रेजीमेंट लड़ रही थी जिसमें ज़्यादातर दलित सैनिक थे.</p><p>भीमा कोरेगांव की रैली मराठा सेना के ख़िलाफ़ इन्हीं दलितों की शौर्य की याद में आयोजित की गई थी. इसका नाम यलगार परिषद रखा गया. शनिवार वाड़ा के मैदान पर हुई इस रैली में ‘लोकतंत्र, संविधान और देश बचाने’ की बात कही गई. दिवंगत छात्र रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला ने रैली का उद्घाटन किया था. </p><p>इसमें कई नामी हस्तियां मसलन- प्रकाश आंबेडकर, हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस बीजी कोलसे पाटिल, गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी, जेएनयू छात्र उमर ख़ालिद, आदिवासी एक्टिविस्ट सोनी सोरी आदि मौजूद रहे. इनके भाषणों के साथ कबीर कला मंच ने सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किए. </p><p>अगले दिन जब भीमा कोरेगांव में उत्सव मनाया जा रहा था, आस-पास के इलाक़ों- मसलन, संसावाड़ी में हिंसा भड़क उठी और एक नौजवान की जान चली गई. इस मामले में हिंदुत्ववादी संस्था समस्त हिंद अघाड़ी के नेता मिलिंद एकबोटे और शिव प्रतिष्ठान के संस्थापक संभाजी भिड़े के ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज की गई. </p><p>एफ़आईआर दर्ज होने के बाद लंबे समय तक मिलिंद एकबोटे और <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/city/nashik/right-wing-activist-sambhaji-bhide-gets-bail-in-case-over-infertility-curing-mango-claim/articleshow/66986430.cms">संभाजी भिड़े</a> की गिरफ़्तारी नहीं हुई, उन्हें ज़मानत पर छोड़ दिया गया. इसी दौरान यलगार परिषद से जुड़ी दो और एफ़आईआर पुणे शहर के विश्रामबाग पुलिस थाने में दर्ज की गईं. </p><p>पहली एफ़आईआर में जिग्नेश मेवानी और उमर ख़ालिद पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाया गया था. दूसरी एफ़आईआर तुषार दमगुडे की शिकायत पर यलगार परिषद से जुड़े लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज की गई. इस एफ़आईआर के संबंध में जून में सुधीर धवले समेत पांच सामाजिक कार्यर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया. </p><p>इसे बाद 28 अगस्त को पुणे पुलिस ने गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, अरुण फ़रेरा और वरनॉन गोन्ज़ाल्विस को गिरफ़्तार कर लिया, ये सभी लोग जाने-माने सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.</p><p><strong>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप </strong><a href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi">यहां क्लिक</a><strong> कर सकते हैं. आप हमें </strong><a href="https://www.facebook.com/bbchindi">फ़ेसबुक</a><strong>, </strong><a href="https://twitter.com/BBCHindi">ट्विटर</a><strong>, </strong><a href="https://www.instagram.com/bbchindi/">इंस्टाग्राम </a><strong>और </strong><a href="https://www.youtube.com/user/bbchindi">यूट्यूब</a><strong>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</strong></p>

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