प्रभात कुमार
ऐतिहासिकता, शांत सुबह, रोमानी शाम
शिवालिक पहाड़ियों पर सन 1621 में नाहन को बसाने में तीन व्यक्तियों का सहयोग रहा. एक योद्धा राजकुमार, एक साधु जो यहां पालतू शेर के साथ रहता था और एक कुख्यात लुटेरा जो लूट का माल यहां छिपाता था. नाहन उम्दा मौसम के कारण हिमाचल के चुने हुए शहरों में शुमार है. चार दर्जन राजाओं द्वारा शासित रहे शहर की बसावट प्रशंसनीय है.
यह बात साल 1820-30 में राजा फतेह प्रकाश के शासन के दौरान नाहन आये लेफ्टिनेंट जॉर्ज फ्रांसिस व्हाॅइट ने भी लिखी थी. नाहन की सुबह शांत है. स्थानीय लोग व पर्यटक विला राउंड स्थित जॉगर्स पार्क व छतरी के पास चीड़ के स्वास्थ्यवर्धक वृक्षों के सानिध्य में सुबह-शाम सैर करते हैं और 130 वर्षीय पुराने रानीताल बाग में टहलते हैं. सर्दी में यहां कोहरा नहीं पड़ता. गर्मी का तापमान मैदानों से तीन-चार डिग्री कम रहता है. शहर में बरसात का पानी रुकता नहीं. शाम होते ही नाहन का दिल ‘चौगान’ में चहल-पहल जवां हो जाती है.
सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक
प्रकृति, कला, संस्कृति, साहित्य, सर्वधर्म सदभाव, सहजता भरे नगर नाहन में अनेक एतिहासिक इमारतें, पुराने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा व चर्च हैं. रानीताल में विशिष्ट शैली में निर्मित प्राचीन शिवालय है. शहर के दो मेले बावनद्वादशी व छड़ियों का मेला बेहद प्रसिद्ध हैं. यहां का मुहर्रम खास है. अन्य जगहों पर शिया संप्रदाय मुहर्रम आयोजित करता है, मगर नाहन में सुन्नी संप्रदाय करता है. ऐसा यहां राजा के जमाने से हो रहा है.
तालाब, पैदल, साल और चीड़
अंतरराष्ट्रीय ख्यात कलाकार जेसी फ्रेंच 1931 में नाहन आये, यहां की सुंदरता से प्रभावित हुए, उनकी किताब ‘ट्रैवल इन वैस्टर्न हिमालयाज’ पढ़कर पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव, कलाप्रेमी एसएस रंधावा 1963 में आये और यहां के तालाबों की तारीफ की. कालिस्थान तालाब, पक्का तालाब व रानी ताल के कारण ही नाहन को तालाबों का शहर कहा जाता है. यहां बावलियां भी हैं. पूंजीपतियों ने बहुत कोशिश की, मगर पर्यावरण प्रेमियों ने इन जलस्रोतों को मरने नहीं दिया.
तालाब जमीन में नमी बरकरार रखते हुए सामाजिक उपयोगिता के साथ, पारिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखने में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं. मुख्य शहर चंद घंटों में पैदल घूम सकते हैं. यहां ज्यादातर लोग पैदल ही चलते हैं. पुराने बाजार में वाहन प्रयोग की मनाही है. यहां शॉपिंग और गपशप एक साथ कर सकते हैं. शहर में और आस-पास सुगंधित चीड़ अन्य वृक्ष और अनेक जड़ी बूटियां उपलब्ध हैं. हरियाली के साये में कुछ समय गुजारेंगे, तो कुदरत से प्यार हो जायेगा.
कैसे पहुंचें
कहावतों ऐसे नहीं उगतीं. नाहन के बारे में कहते हैं- ‘नाहन शहर नगीना/ आये दो दिन, ठहरे महीना’. इतिहास में रहना मुश्किल है, लेकिन आज भी यहां आकर सहज, शांत व आराम महसूस होता है. आप किसी भी मौसम में यहां आ सकते हैं.
नाहन शहर चंडीगढ़ से 90 किमी , शिमला से 135 किमी व देहरादून से 90 किमी है. आप पांवटा साहिब होकर भी आ सकते हैं. ठहरने के लिए यहां रेस्ट हाउस और प्राइवेट होटल उपलब्ध हैं. पास-पड़ोस में आरामदायक रिजॉर्ट्स भी हैं. इसलिए उन पुरानी, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाना छोड़िये. इस बार नाहन तशरीफ लाइये, तो निर्मल आनंद की अनुभूति आपकी जिंदगी की किताब का हिस्सा बन जायेगी.
