पाकिस्तान में आतंक आर-पार की लड़ाई का वक्त

पाकिस्तान में आतंक आर-पार की लड़ाई का वक्तपिछले 15 वर्षो में हजारों पाकिस्तानी नागरिक नृशंस आतंकी हिंसा के शिकार हो चुके हैं और लगभग 70 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है. इससे पड़ोसी देश भी बुरी तरह से प्रभावित हैं. अंतत: पाकिस्तानी सरकार और सेना ने वजीरिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमला शुरू कर […]

पाकिस्तान में आतंक आर-पार की लड़ाई का वक्त
पिछले 15 वर्षो में हजारों पाकिस्तानी नागरिक नृशंस आतंकी हिंसा के शिकार हो चुके हैं और लगभग 70 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है. इससे पड़ोसी देश भी बुरी तरह से प्रभावित हैं. अंतत: पाकिस्तानी सरकार और सेना ने वजीरिस्तान के आतंकी ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया है, जिसमें अब तक 100 से अधिक आतंकवादी मारे गये हैं. मसले के जरूरी आयामों पर विशेष प्रस्तुति..

जब हम पाकिस्तान में आतंक को रोकने के बारे में सोचते हैं, तो कई तरह के भ्रम खड़े हो जाते हैं. पहला, षड्यंत्र की धारणाएं जो यह मानती हैं कि तालिबानी भारतीय, अमेरिकी और इजरायली एजेंट हैं. फिर, पाकिस्तान मुसलिम लीग नवाज, पाकिस्तान तहरीके-इंसाफ और जमाते-इसलामी जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां हैं, जो आतंकियों के साथ बातचीत के जोरदार पक्षधर हैं. दूसरी तरफ, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, अवामी नेशनल पार्टी एवं मुतहिद कौमी मूवमेंट जैसी पार्टियां हैं जिन्होंने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाईयों का हमेशा समर्थन किया है, लेकिन पिछले एक-दो साल से वे भी ढुलमुल रवैया प्रदर्शित कर रहे हैं.

पहले की घटनाओं की ठोस समझ अनिवार्य रूप से आगे की गलतियों या असफलताओं से बचने की गारंटी नहीं है, लेकिन इससे अपने वर्तमान और भविष्य की बेहतर जानकारी का आधार जरूर मिलता है. पाकिस्तान के सामने ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण हैं, जिनसे सबक लेकर सरकार और सेना तहरीके-तालिबान पाकिस्तान और अन्य आतंकी गिरोहों द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का बखूबी सामना कर सकते हैं.

इतिहास से एक उदाहरण श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों से निपटने में वहां की सेना को मिली सफलता है. 1983 से 2009 तक चले गृहयुद्ध का पटाक्षेप श्रीलंका सेना की जीत के साथ हुआ. लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम ने ही आधुनिक आतंकवाद के इतिहास में आत्मघाती बेल्ट पहने हमलावरों का ईजाद किया था तथा महिला हमलावरों का सुनियोजित इस्तेमाल करना शुरू किया था. विद्रोहियों ने श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी की थी. तमिल विद्रोहियों के आतंक ने देश के पर्यटन और आर्थिक स्थिति पर गहरा असर डाला. असुरक्षा की स्थिति इस कदर बढ़ गयी थी कि 1996 के क्रिकेट विश्व कप के दौरान ऑस्ट्रेलिया व वेस्टइंडीज की टीमों ने वहां जाने से मना कर दिया था.

सरकार ने विद्रोहियों से चार बार शांति-वार्ता की नाकाम कोशिश की. अंतत: 2006 में उसे प्रभाकरण के नेतृत्ववाले ईलम के खिलाफ जोरदार मोर्चा खोलना पड़ना और 2009 में सरकार ने पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित कर लिया. इस प्रकरण में महत्वपूर्ण बात यह है कि तमिल विद्रोहियों के विरुद्ध कारवाई में पाकिस्तान सेना व वायु सेना ने श्रीलंकाई सरकार को मदद की थी और तमिल ईलम के कई ठिकानों पर बमबारी की थी.

भारत में नक्सल आंदोलन के रूप में शुरू हुआ कम्युनिस्ट विद्रोह भूमिगत माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में देश के कई हिस्सों में फैला हुआ है. सरकार के आकलन में यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है. 2009 में सरकार ने प्रभावित इलाकों में माओवादी विद्रोहियों को नियंत्रित करने के लिए एक कार्यक्रम बनाया जिसे ‘इंटिग्रेटेड एक्शन प्लान’ का नाम दिया गया है. 2010 में शुरू हुए इस अभियान में 50 हजार से अधिक सुरक्षाबलों को लगाया गया, जो काफी प्रभावी साबित हुआ है. भारत सरकार ने माओवादियों को पीछे धकेलते हुए उन्हें बातचीत की पेशकश की, लेकिन नेतृत्व ने उसे ठुकरा दिया. इस अभियान के तहत नक्सल-प्रभावित इलाकों में आर्थिक विकास की परियोजनाएं और पुलिस-तंत्र को बेहतर बनाने के लिए धन भी आवंटित किया जा रहा है ताकि नक्सलियों के प्रभाव-विस्तार को रोका जा सके.

आयरलैंड और इंग्लैंड में सक्रिय आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के साथ ब्रिटेन की सरकार ने तभी शांति-समझौता किया, जब संगठन ने अपने हथियार छोड़ दिये.

पाकिस्तान में षड्यंत्र के सिद्धांतों में भरोसा रखनेवाले लोग यदि यह मानते हैं कि तहरीके-तालिबान पाकिस्तान भारत, इजरायल या अमेरिका का एजेंट है, तो फिर उसके साथ बातचीत का कोई मतलब नहीं है. अगर वे हमारे अपने लोग हैं, तो फिर वे राज्य की सत्ता को चुनौती दे रहे हैं और उनके साथ कड़ाई से निपटने की जरूरत है, क्योंकि उनके साथ अब तक हुई वार्ताएं असफल रही हैं. वार्ता के प्रस्ताव मजबूती की जगह खड़े होकर दिये जाते हैं, कमजोरी से नहीं.

हमारे सामने 2010 में पिछली सरकार के दौरान स्वात क्षेत्र में चलाये गये पाकिस्तानी सेना के सफल अभियानों के उदाहरण हैं. तालिबान द्वारा शांति-समझौते के उल्लंघन के बाद हुई यह कारवाई रणनीति, योजना और सफलता से उन्हें लागू करने का ठोस प्रतिमान है. सेना ने तहरीके-तालिबान पाकिस्तान के नियंत्रण से इलाके को मुक्त किया, आंतरिक रूप से शरणार्थी बनने को मजबूर लोग घर लौट सके और अब इस क्षेत्र में देश भर से पर्यटक आ रहे हैं.

इसलिए, अब किसी तरह के किंतु-परंतु का समय नहीं है. यह समय तहरीक और अन्य आतंकियों के विरुद्ध कारवाई का है. इस अभियान में कुछ जानो-माल का नुकसान भी होगा, लेकिन हमें यह तय करना होगा कि हम इस तात्कालिक नुकसान को सहें या तालिबान और उसकी मानसिकता से हो रहे नुकसान को सैकड़ों वर्षों तक सहते रहें. (‘पाक टी हाउस’ से साभार)

फजल अब्बास

पाकिस्तानी स्तंभकार

बम या हथियार से खत्म नहीं हो सकती आतंकी विचाराधारा

अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ अमेरिकी हमले के बाद से पाकिस्तान में आतंकी घटनाएं बढ़ गयी हैं. इसमें न सिर्फ हजारों नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गये हैं, बल्कि इसकी चपेट से पड़ोसी देश भी नहीं बच पाये हैं. पाकिस्तान में राजनीति और सेना के बीच खींचतान से आतंकवाद को मजबूती मिली है. हालांकि अब वहां की सरकार और सेना आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है. आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर पाकिस्तानी अखबार ‘डान’ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार जावेद नकवी से विस्तार से बातचीत की वसीम अकरम ने.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के पिछले महीने भारत आने के बाद से पाकिस्तान में आतंकी सरगर्मियां तेज हुई हैं. इसे किस तरह से देखते हैं आप?

ऐसा नहीं है कि नवाज शरीफ के भारत दौरे के बाद से ही वहां हमले बढ़ गये हैं. हां, यात्र के दौरान ही अफगानिस्तान के हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर एक हमला हुआ था, जिसे भारत से जोड़ कर देखा जा सकता है. लेकिन पाकिस्तान के बाकी हमलों को इस तरह नहीं देखा जा सकता है. जहां तक कराची के एयरपोर्ट पर हमले का सवाल है, ठीक उसी समय इराक की गतिविधियां बेहद संवेदनशील थीं, जहां अल-कायदा जैसे कट्टरपंथी संगठन बेहद सक्रिय हैं. लेकिन, चूंकि हम भारत में रहते हैं, इसलिए पाकिस्तान की हर गतिविधि को खुद से जोड़ कर देखने लगते हैं. खतरनाक गतिविधियों के लिए पहले सीरिया जाना जाता था, लेकिन वर्तमान में इराक नजर आ रहा है. पाकिस्तान में तो अभी इराक से कम ही हमले हो रहे हैं. मेरा ख्याल है कि हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी गतिविधियों के मद्देनजर सिर्फ पड़ोसी देशों को नहीं, बल्कि दुनिया के और देशों में देखना चाहिए, जहां के हालात बहुत ही संवेदनशील बने हुए हैं. पिछले दिनों इराक के मौसूल में आतंकियों ने एक पूरे इलाके को उसी वक्त कब्जा किया, जब कराची के एयरपोर्ट पर हमले की गूंज सुनायी दी. इराक और पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों से तो यही लगता है कि अल-कायदा जैसी कोई एक तहरीक है, जिसके निशाने पर सीरिया, इराक, पाकिस्तान, अफगान आदि हैं.

ऐसे हालात में भारत का क्या रुख होना चाहिए, क्योंकि इनमें से कुछ देशों के हम पड़ोसी भी हैं?

यह तो हमें तय करना होगा कि हमारा स्टैंड क्या होगा. क्योंकि अगर हम सऊदी अरब से दोस्ती करेंगे, तो हमें तालिबान से भी दोस्ती करनी होगी, क्योंकि कुछ हद तक खबर है कि उन्हें वहीं से ताकत मिलती है. यह तो भारत की डिप्लोमेसी ही तय करेगी कि उसका क्या रुख होगा, क्योंकि मामला विदेशी नीति के साथ-ही-साथ अर्थनीति का भी है. हमें जहां से सस्ता तेल मिलेगा, हम उससे दोस्ती रखेंगे और उससे सभी तरह की नीति भी साधेंगे. लेकिन, अगर वहाबी या इस्लामी आतंकवाद से लड़ना है, उसे रोकना है, तो फिर आपको यह तय करना होगा कि आपका दोस्त कौन है? सऊदी अरबिया हमारा दुश्मन नहीं है, लेकिन जिस तरह के तत्वों को वह तरजीह देता है- चाहे वह पाकिस्तान में हो या अफगानिस्तान में- वह कहीं से भी हमारे लिए सेहतमंद नहीं है. मामले की तह में जायें, तो बार-बार हम पाकिस्तान को दोष देकर अपनी बौनी शख्सियत का ही प्रदर्शन करते हैं. इस तरह की चीजों से हमें बचना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि थोड़ा गहराई से सोचें. हमें पाकिस्तान सेंट्रिक होकर बात नहीं करनी चाहिए.

रोजाना खबरें आती हैं कि पाकिस्तान के इस इलाके में हमला हुआ, इतने आतंकी मारे गये और इतने लोग हलाक हुए. रोज बड़ी संख्या में आतंकियों के मरने के बाद भी उनकी संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है. ऐसा क्यों?

यही तो सोचनेवाली बात है. इसलिए ही मैं कह रहा हूं कि हमें अपने देश को लेकर पाकिस्तान सेंट्रिक नहीं सोचना चाहिए. वाकई में पड़ोसी देश में आतंकी गतिविधियां हमारे लिए अच्छी बात नहीं है, लेकिन सोचना यह है कि आखिर पाकिस्तान में इनको कौन शह दे रहा है और कौन कहां से संचालित कर रहा है. कराची में या वजीरिस्तान में जिन्होंने हमले किये वे कौन थे? कहीं इनका लिंक उन लोगों से तो नहीं, जो इराक में हमले कर रहे हैं और बहुत मजबूती के साथ वहां की धर्मनिरपेक्ष शासन को चुनौती दे रहे हैं. इसलिए मेरा मानना है कि इसको थोड़ा विस्तृत परिप्रेक्ष्य में सोचना चाहिए.

किसी आतंकी संगठन ने पिछले दिनों कहा कि वह अफगानिस्तान के रास्ते कश्मीर में घुसेगा. इस धमकी को कैसे देखते हैं आप?

हम लोग मजाक हैं क्या, जो कोई ऐसा आसानी से कर जायेगा. हमारी पूरी फौज लगी हुई है और 24 घंटे मुश्तैद है. पहली बात तो यह कि अफगानिस्तान से कश्मीर के बीच में पाकिस्तान की भी सेना होगी, जो उस संगठन को कहेगी कि आप कश्मीर में घुस जाइए. ऐसा संभव है क्या? यह सब बचकानी चीजें हैं, जो मीडिया में चल रही हैं. वे वहां से चलेंगे और कश्मीर पर कब्जा कर लेंगे, ऐसा कोई सोच भी कैसे सकता है. हमारे देश की सेना कोई पाकिस्तान या अफगानिस्तान की दो पैसे वाली सेना जैसी नहीं है.

दूसरी बात यह कि इराक से अमेरिका वापस चला गया. जब गया था, तो यही सोच कर कि उसने सब कुछ ठीक कर दिया है, लेकिन वहां आतंकियों ने फन काढ़ लिया. उसी तरह वह अब अफगानिस्तान से जा रहा है, तो यह मुमकिन हो सकता है कि वहां भी वे अपनी गतिविधियों को अंजाम दें. अमेरिका का सोचना गलत है, क्योंकि वे एक विचारधारा हैं, जिसे खत्म नहीं किया जा सकता है. वह विचारधारा हमारे देश पर जबरन थोपी नहीं जा सकती, लेकिन उसको देश में ही बैठे कुछ लोगों में बिठायी जा सकती है, जिससे हमें आगाह होना होगा. वे आसमान से उड़ कर हम पर हमला नहीं करेंगे, इसलिए उनसे डरने की जरूरत नहीं, बल्कि अपने देश के भीतर बैठे उन लोगों से लड़ने की जरूरत है, जो उस विचारधारा का समर्थन करते हैं. यह ज्यादा खतरनाक है.

यह तो घर का भेदी लंका ढाये वाली बात हो गयी. ऐसे में आतंकवाद को खत्म करने की कवायदों का क्या मतलब है?

किसी भी जगह से आतंकवाद का खात्मा राजनीतिक इच्छाशक्ति के जरिये ही हो सकता है. जब उनके जाहिल लोग देशों के पढ़े-लिखे राजनीतिकों से मिलेंगे, मिल-बैठ कर बातचीत करेंगे, वे कहेंगे कि, भाई! हथियार और आतंक के अलावा भी एक बेहतरीन तरीका है जिंदगी जीने का, तभी संभव है कि उस विचारधारा को बदला जा सकेगा, नहीं तो हथियार के दम पर, बम और गोला-बारूद के दम पर किसी भी विचारधारा को बदल पाना बहुत ही मुश्किल है. आतंकी गतिविधियों के लिए जिम्मेवार मौजूदा विचारधारा में दुनिया के कई देशों के लोग शामिल हैं, जैसे हिंदुस्तान में हिंदुत्व के. जब तक विकास की बात करते हैं, तब तक ठीक मालूम पड़ते हैं, लेकिन जब सड़क पर निकल कर संस्कृति के नाम पर लोगों को मारते-पीटते हैं, तो वही बुरा लगने लगता है.

जब भी कहीं आतंकी हमला होता है, तो वहां का प्रशासन उसे नाकाम करने के लिए गोलीबारी करता है. इसमें कई निदरेष भी मारे जाते हैं. तो क्या जो काम आतंकी करते हैं, कुछ वैसा ही काम प्रशासन का भी नहीं है?

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. अगर प्रशासन कार्रवाई नहीं करेगा, तो यह भी हो सकता है कि दो निदरेषों के बजाय चार, आठ या बारह निदरेष मारे जायें. इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई और आतंकी हमलों को एक ही तरह नहीं देखा जा सकता है. भई, अगर प्रशासन कार्रवाई नहीं करेगा, तो आतंकी उन्हें मिठाई नहीं बांटेंगे, बल्कि पूरी और भी बड़ा हमला करने की कोशिश करेंगे. हालांकि यह बात सच है कि इसमें दोनों तरफ से कुछ निदरेष भी निशाना बन जाते हैं, लेकिन यह भी सच है कि सैन्य प्रशासन को अपना काम करना पड़ता है.

तालिबान ने कहा है कि पाकिस्तान में जितने भी विदेशी हैं, वे पाकिस्तान छोड़ दें, नहीं तो हमले के लिए तैयार रहें. इस पर पाकिस्तान का क्या रुख होना चाहिए?

ठीक वैसा ही जैसा हर देश अपनी सुरक्षा को लेकर और विदेशी मेहमानों को लेकर सुरक्षा-संरक्षा की नीति अपनाता है. पाकिस्तानी सेना ऐसी धमकियों का कड़ा जवाब देने की कोशिश करेगी, क्योंकि पाकिस्तान भी तो आतंकवाद से परेशान है. उसकी भी अपनी उस बेगुनाह जनता के प्रति जवाबदेही है, जिसके परिजन इन हमलों में बेवजह ही मारे जाते हैं.

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