स्वच्छ वातावरण और मन के लायक काम और उचित मार्गदर्शन देकर बच्चों को सही राह दिखायी जा सकती है. इसके लिए समाज में हर किसी को अपनी जिम्मेवारी स्वीकार करनी होगी. बच्चों के मन को टटोलना, उनकी रुचि को जानना बड़ों की जिम्मेदारी होनी चाहिए. बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए किस स्तर पर पहल हो? इसमें कैसी बाधाएं हैं? इन सभी बातों को जानने के लिए बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था ‘किलकारी’ की निदेशक ज्योति परिहार से सुजीत कुमार ने बात की. प्रस्तुत है प्रमुख अंश :
बच्चों के विकास के लिए सरकार की किस- किस तरह की योजनाएं हैं?
योजनाएं तो बहुत सारी हैं. जैसे राज्य स्तर पर किलकारी को लीजिए. यह एक बाल भवन है. प्रथम प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने पहला बाल भवन बनवाया. अन्य राज्यों में बाद में बना. बिहार में भी बाद में बना. इस परिकल्पना को पूरा करने में लगभग हर पूर्ववर्ती सरकार ने आनाकानी की. नीतीश सरकार ने सन् 2011 में इसके लिए पहल किया. एक एनजीओ के रुप में निबंधित किया गया. किलकारी हमारा अपना नाम है. अन्य राज्यों में इसका क्या नाम है. इसे बताने में असुविधा होगी. विकास के लिए कई तरह की योजनाएं हैं. इनमें सबसे मुख्य है इनकी सृजनशीलता को बढ़ावा देना. खुद किलकारी में भी करीब 25-30 तरह के प्रशिक्षण दिये जाते हैं. ये बहाने होते हैं. बच्चों से जुड़ने के लिए.
इसके जरिये बच्चों को डेवलप करने का प्रयास किया जाता है. योजनाएं जो बने उनमें यह जरूरी है कि काम से ज्यादा प्रक्रिया को अपनाया जाये. खुद बच्चों को यह कोशिश करने की छूट दी जाये. दूसरे विभागों में भी बच्चों के विकास के लिए कई योजनाओं पर कार्य हो रहे हैं. शिक्षा विभाग कला, संस्कृति पर ध्यान दे रहा है. इन क्षेत्रों के प्रति बच्चों में रुझान पैदा हो, इसे कैसे पूरा कर सकते हैं, इसकी प्रक्रिया को समझाने के लिए प्रशिक्षक द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है. शनिवार के दिन इस विषय पर कार्य होता है. कल्याण विभाग की कुछ योजनाएं हैं. इसमें मुख्य केंद्र में उन बच्चों को रखा जाता है, जो पिछड़े तबके से हो, मंद बुद्धि हो. इसमें लड़कों के लिए ‘ अपना घर ’ और लड़कियों के लिए ‘ निशांत ’ नाम से कार्यक्रम चलाये जाते हैं. लड़कियों में भी उन पर खास ध्यान रखा जाता है जो रेड लाइट क्षेत्रों से ताल्लुक रखती हैं. इनको व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि ये अपने खुद को सक्षम बना सके. जहां तक किलकारी के द्वारा बच्चों के विकास की योजना की बात है, पटना के दस स्कूलों में बाल केंद्र खोले जा चुके हैं. नौ अन्य जिलों में बाल केंद्र हैं. गया और भागलपुर में दो बाल भवन खोले गये हैं. बाल केंद्रों को अन्य जिलों में भी खोलने की पहल हो रही है. उद्देश्य यही है कि ऐसे केंद्रों से बच्चे जुड़े और उनका सर्वागीण विकास हो.
बच्चों के शैक्षणिक, शारीरिक और मानसिक विकास के लिए संस्थागत तौर पर किस तरह की पहल देश में हो रही है?
बच्चों के इस तरह के विकास के लिए कोई निर्धारित मानक नहीं है. रुचि के हिसाब से बच्चों के लिए खुली जगह होनी चाहिए. हमने यही किया. साथ ही लाइब्रेरी, मोबाइल लाइब्रेरी की व्यवस्था होनी चाहिए. क्रियेटिव राइटिंग के प्रयास पर ध्यान दिया जा रहा है. हमने बच्चों की इन चाहतों को समझा. इन सारी चीजों की व्यवस्था की. बच्चों के जीवन निर्माण के लिये जिस तरीके से पहल होनी चाहिए, वह नहीं हो रही है. मानसिक विकास के लिए ऐसी पहल होनी चाहिए कि बच्चे अपने सवालों का जवाब खुद खोजें. स्कूलों में भी ऐसा नहीं हो रहा है. शिक्षक की भूमिका सहायता करने के रुप में होनी चाहिए. ऐसा नहीं हो रहा है. किलकारी में बच्चे अपना अखबार निकालते हैं. मेरे ख्याल से यह अपने आप में एक उदाहरण है. इसमें बच्चे खुद अपने स्तर से लेख को चुनते हैं. उसकी समीक्षा करते हैं. फिर अखबार में उनको स्थान मिलता है. मेरे ख्याल से जिस स्तर पर संस्थागत पहल देश में होनी चाहिए.
वैसी नहीं हो रही है. काम करने के लिए सरकार या अन्य कोई भी संस्था आगे नहीं आ पाती. सरकार के पास किसी भी चीज की कमी नहीं है. मशीनरी उनकी है, संसाधन भी पूरे हैं, लेकिन उच्च स्तर की पहल का अभाव है. इसे दूर करना होगा. बच्चों के चरित्र निर्माण से बड़ा कोई कार्य नहीं है. खुद मैंने नहीं सोचा था कि यह काम करुंगी. यह जरूर सोची थी कि शादी के बाद घरवालों ने काम नहीं करने दिया तो कम से कम एक बच्चे को गोद जरूर लुंगी. बच्चों के चरित्र का निर्माण सृजन का काम होता है. इसमें निष्ठा, समर्पण की जरूरत होती है. यह काम ही नहीं हो रहा है. बच्चों की बातों को समझने के लिए हमें उनके स्तर तक जा कर उन्हें समझना होता है. अगर उनसे नहीं जुड़े तो उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं. किलकारी जिस तरह की पहल कर रही है. मेरी जानकारी में देश स्तर पर यह अनोखी पहल है. ऐसे ही कदम उठाने की जरूरत भी है. राष्ट्रीय स्तर पर जो एक मुख्य काम है, बच्चों के हित में, वह है चाइल्ड लाइन नंबर. 1098 नंबर पर इनकी परेशानियों का समाधान हो सकता है. ग्रामीण स्तर पर आंगनबाड़ी केंद्र भी प्रयास का ही हिस्सा है. शिक्षा के लिए सर्वशिक्षा अभियान पूरे देश में चल रहा है.
बिहार – झारखंड में इस तरह के प्रयासों के बारे में आप हमारे पाठकों को जानकारी दें.
प्रयास तो हो ही रहा है लेकिन इसकी रफ्तार बहुत कम है. सबसे बड़ी बात यह है कि किलकारी जैसी संस्था और बने. बहुत सारे एनजीओ हैं, जो अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. बच्चों के लिए काम करने वाले एनजीओ को प्राथमिक के आधार पर काम करने की जरूरत है. बिहार में सन् 2011 से हम इस काम को कर रहे हैं. अभी तक का सफर तो अच्छा है. झारखंड के बारे में कुछ निश्चित नहीं बता सकती. सबसे अहम यह है कि जो भी ऐसे प्रयास को करे, उसे खोदना नहीं चाहिए. यह भी देखने को मिलता है कि बच्चों के लिए काम करने के इच्छुक लोगों की संख्या बहुत है, लेकिन वह पहल नहीं करते. इस बात का इंतजार करते हैं कि कोई दूसरा आगे बढ़े तो इसमें शामिल हो जायेंगे. इस धारणा को बदलने की जरूरत है. एक और एक से ग्यारह होता है. इस स्तर से काम हो कि सवाल पूछने का मौका ही नहीं आये.
तकनीक और आइटी का जिस तरह से विकास हुआ है, उसमें बच्चों के सही मार्गदर्शन की किस तरह की चुनौतियां पैदा हुई हैं? अभिभावक, शिक्षक और प्रबुद्ध समाज की इसमें किस तरह की भूमिका होनी चाहिए?
इन क्षेत्रों में विकास जोखिम वाला हो गया है. विज्ञान इन बच्चों के लिए हानि पहुंचाने का काम कर रहा है. बच्चे पूरी तरह से इनसे आकर्षित हो गये हैं. ऐसे विकास बच्चों और उनकी मासूमियत के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो गयी है. इसके लिए अभिभावक को चाहिए कि वह पूरी तरह से सतर्कता बरतें. बच्चे अगर कंप्यूटर को ऑपरेट कर रहे हैं तो यह नहीं सोचे की वह बड़ा हो गया है. बड़ा तो तब समङोंगे जब वह कंप्यूटर की खराबी को दूर कर सकने में सक्षम हो सके. यही हाल इन बच्चों में मोबाइल को लेकर हो गया है. बच्चे खेल के मैदान में खेलने की अभिरूचि को कम और मोबाइल गेम खेलने में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. अभी यह आलम है तो आने वाले समय में स्थिति और कितनी बदल जायेगी.
इस बात का अंदाजा किसी को भी नहीं है. अभिभावकों को भी चाहिए कि वह इनके लिए एक कैलेंडर बनाये. उसमें हर काम के लिए समय निर्धारित हो. खेलकुद के लिए प्रेरित करें. कोशिश करें कि वह ग्रुप में खेले. इससे उनके अंदर सामाजिकता और एकता की भावना का निर्माण होता है. शिक्षकों के लिए यह जरूरी है कि वह इस बात को समङो कि उनके ऊपर बच्चों की निर्भरता ना हो. उनके दोस्त होकर काम कराये. डर दिखा कर बच्चों से कोई काम नहीं करा सकते हैं. उनके मुङरये चेहरे को देखे तो कारण पूछे. दोस्त बन कर उनकी परेशानी को दूर करने की कोशिश करें. मैं किलकारी की बात बताना चाहूंगी. यहां जितने भी प्रशिक्षक आते हैं. उनके लिए यह अनिवार्य है कि वह हमेशा अपने होठों पर मुस्कान बनाये रखे. बच्चों की प्रवृति भी अलग-अलग होती है. कुछ अंर्तमुखी होते हैं. कुछ बर्हिमुखी होते हैं. बहुत ऐसे बच्चे हैं जो मोबाइल पर खूब बातें करते हैं, लेकिन घर में कोई आता है तो बुत बन जाते हैं.
जब तक हम उनके बीच खुद को नहीं ढ़ालेंगे, वह हमारी बातों पर ध्यान नहीं देंगे. प्रबुद्ध वर्ग भी अपनी महत्ती भूमिका निभा सकते हैं. प्रबुद्ध वर्ग को चाहिए कि वह बच्चों से मिलें. हमारे सदियों पुराने पर्व त्योहार के अवसर पर बच्चों की सहभागिता को सुनिश्चित करे. उन्हें अच्छी-अच्छी जानकारी दे. समय – समय पर सार्वजनिक रुप से ऐसे खेल या किसी कार्यक्रम का आयोजन करें, जिसमें बच्चों की सहभागिता हो. इससे इनमें एक – दूसरे को जानने की प्रवृति आयेगी. बच्चे एक दूसरे को जानेंगे तो अपनी सोच के हिसाब से दोस्ती कर सकेंगे. ये छोटी छोटी लेकिन बहुत काम की बातें हैं. इन सारी बातों से बच्चों की सामाजिक सोच विकसित होगी. यह सारी विविधता खत्म हो रही हैं. इसे शुरू करने की जरूरत है. समय अंतराल पर ऐसे आयोजन होने चाहिए.
बच्चों को लेकर बिहार – झारखंड में क्या स्थिति है? किस-किस तरह की संस्थाएं काम कर रही हैं?
दोनों जगहों पर बाल संरक्षण आयोग है. कई तरह के कार्यक्रम हैं. मुख्यत: दो तरह की बातें हैं. सिद्धांत के लिए यूनिसेफ जैसी संस्था है, जो इनके लिए काम करती है. कई और भी संस्थाएं हैं. आयोग भी कई तरह के काम कर रहे हैं. आयोगों को बच्चों की अभिरूचि और अधिकार के लिए और संजीदा होकर काम करने की जरूरत है. इन क्षेत्रों में क्रियान्वयन करने की जरूरत है. अभी जो स्थिति है, उसके अनुसार बहुत काम करने की आवश्यकता है. इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और जिम्मेदार लोगों की जरूरत है. अभी की स्थिति बहुत उल्लेखनीय नहीं कही जा सकती है.
ज्योति परिहार
निदेशक, किलकारी
पटना
