पन्नों में कविताई खुशबू

लेखक-पत्रकार अरविंद दास की नयी किताब ‘बेखुदी में खोया शहर- एक पत्रकार के नोट्स’ नयी फसल की आमद की तरह है. अनुज्ञा बुक्स से आयी इस खूबसूरत किताब के पन्नों में कविताई खुशबू है, बाबा नागार्जुन की धमक है, मिथिला पेंटिंग की छटा है और मेरे लिए सबसे प्यारी बात, यहां अंचल की याद बेतहाशा […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | December 9, 2018 7:13 AM
लेखक-पत्रकार अरविंद दास की नयी किताब ‘बेखुदी में खोया शहर- एक पत्रकार के नोट्स’ नयी फसल की आमद की तरह है. अनुज्ञा बुक्स से आयी इस खूबसूरत किताब के पन्नों में कविताई खुशबू है, बाबा नागार्जुन की धमक है, मिथिला पेंटिंग की छटा है और मेरे लिए सबसे प्यारी बात, यहां अंचल की याद बेतहाशा है. देश है, परदेश में भी.
किताब में पत्रकार के फील्ड नोट्स को पांच खंडों में बांटा गया है- परदेश में बारिश, राष्ट्र सारा देखता है, संस्कृति के अपरूप रंग, उम्मीद-ए-सहर और स्मृतियों का कोलाज. पहले खंड में अरविंद ने उन स्मृतियों, हलचलों को शब्द दिया है, जो उन्होंने परदेश में महसूस किया. यह किताब परदेश की नदियों सेन, नेकर, टेम्स के करीब ले जाती है, वहीं यमुना से लेकर कमला-बलान तक का लेखक जिक्र करते हैं.
एक संस्मरण है- ‘घर एक सपना है’, इसे पढ़ते हुए मुझे एक गजल याद आती है- ‘रेखाओं का खेल है मुक्कदर, रेखाओं से मात खा रहे हो’. यह किताब लोक, संस्कृति, भाषा, जन, साहित्य से रूमानी प्रेम करना सिखाती है. ‘उम्मीद-ए-सहर’ में अरविंद ने किताबों, पुस्तकालयों, दिल्ली, कश्मीर, मैकलॉडगंज-तिब्बत आदि की बात की है.
‘चंपारण सत्याग्रह का कलमकार’ लेख पढ़ते हुए पीर मुहम्मद मूनिस (1882-1949) के बारे में जानकारी मिलती है. मूनिस ‘प्रताप’ से जुड़े युवा पत्रकार थे और उन्होंने गांधीजी को चंपारण आने का निमंत्रण देते हुए पत्र लिखा था. लेकिन, मूनिस का नाम न तो गांधी जी की आत्मकथा में मिलता है और न ही आधुनिक भारत के किसी इतिहास में.
लेखक ने विद्यापति, रबींद्रनाथ ठाकुर, नागार्जुन, रेणु, निर्मल वर्मा से लेकर स्पिक मैके के किरण सेठ तक को अपने नोट्स में शब्द दिया है. किताब का सबसे आखिरी नोट्स ‘अंतिम पहर बीता’ भावुक कर देता है. इसमें लेखक ने अपनी दादी को ‘शब्द’ दिया है- ‘दाय निरक्षर पर जहीन थी.
लोक अनुभव का ऐसा संसार उसके पास था, जहां शास्त्रीय ज्ञान बौना पड़ जाता है! जब हम उसे चिढ़ाते, तो वह अपना नाम हंसते हुए लिखकर दिखाया करती- जानकी. यह नाम उसे पसंद नहीं था. वह कहती कि जानकी के जीवन में बहुत कष्ट लिखा होता है…’
यह किताब अपने कवर पर मिथिला पेंटिंग की अद्भुत छटा के लिए भी लोगों को पसंद आयेगी.
गिरींद्र झा