सुजीत कुमार
ईश्वर ने मुङो ऐसा जीवन दिया है. मुङो ना भगवान से शिकायत है और ना ही इंसान से. जैसी जिंदगी रुप, रंग और शरीर मिला है. उसी में खुश रहता हूं. कोशिश भी यही रहती है कि जहां तक हो सके, अपने जैसे लोगों को संतुष्ट कर सकूं. ये कहना है कमल कुमार का. पटना के अगमकुआं के निवासी 65 साल के कमल नि:शक्त हैं. बचपन में इनका बायां पैर पोलियो का शिकार हो गया. तब इनकी उम्र केवल चार साल थी. बावजूद कमल ने हिम्मत नहीं हारी. इनके मंसूबे को पोलियो हरा नहीं पाया. आज कमल अपने जैसों की मदद करते हैं. निर्विकार भाव से, बिना किसी से कोई अपेक्षा किये.
दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर बनाया रास्ता
अपनी जिंदगी के बारे में कमल बताते हैं, करीब 25 साल पहले उनके पिताजी अपने मूल निवास ग्राम सेवदह, हरनौत, नालंदा से पटना रहने आये. दो भाई एक बहन में सबसे बड़े कमल ही थे. गांव में तब वह सरकारी स्कूल में अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. पटना में भी शिक्षा का यही सिलसिला चलता रहा. सरकारी स्कूल से शिक्षा ग्रहण करने के बाद कमल ने इंटर तक की शिक्षा हासिल की. शुरू से ही स्वावलंबी और स्वाभिमानी कमल ने अपने पैरों पर खड़ा होने के उद्देश्य से सन् 1980 में पटना स्थित कमला नेहरू सेवा संस्थान में चमड़े का काम करने के लिए प्रशिक्षण लेने के लिए नामांकन कराया. प्रशिक्षण के दौरान उनका प्रदर्शन बहुत शानदार रहा. इसके लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया गया. उनकी मेधावी प्रवृत्ति को देखते हुए तत्कालीन राज्यपाल ने 1001 रुपये नगद प्रोत्साहन राशि के रुप में दी गयी.
जज्बे से मजबूरी को हराया
कमल बताते हैं, कमला नेहरू सेवा संस्थान में ही प्रशिक्षण के दौरान उन्हें पता चला कि गांधी मैदान में राज्य स्तरीय हैंड ट्राईसाइकिल प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है. उन्होंने इसमें हिस्सा लिया. प्रतियोगिता में उन्हें दूसरा स्थान प्राप्त हुआ. इससे उनकी इच्छाशक्ति और भी मजबूत हो गयी. इसी दौरान कमल ने अपने जैसे कई और लोगों की जिंदगी को बहुत नजदीक से देखा, इनमें से कुछ जन्म से ही नि:शक्त थे और कुछ किसी दुर्घटना का शिकार होकर अंग गंवा चुके थे. इनके मन में ऐसे लोगों के प्रति कुछ काम करने की इच्छा बलवती हुई. वैशाखी के सहारे चलने वाले कमल कहते हैं, अपने तरह के किसी भी आदमी को देखता था तो मेरा मन बेचैन हो जाता था. इसी दौरान कुछ ऐसे भी नि:शक्तों से संपर्क बना जो वैशाखी, कृत्रिम पैर, हाथ खरीदने की चाहत रखते थे लेकिन मूल्य ज्यादा हो जाने के कारण खरीद नहीं पाते थे.
मेहनत से पाया मुकाम
नि:शक्त लोगों को सामान खरीदने में तकलीफ ना हो, इसी सोच के साथ कमल ने विकलांग सेवा केंद्र के नाम से एक दुकान की नींव रखी. यह सन् 1988 की बात है. इसमें इन्होंने हर उस सामान को रखने, बेचने की कोशिश की, जिससे ऐसे लोगों की जरूरत होती है. कमला नेहरू सेवा संस्थान से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कमल दिन में अपना पूरा समय दुकान पर देते थे और रात में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करते थे. इनकी कड़ी मेहनत का प्रतिफल भी सामने आया, जब कंकड़बाग स्थित आर्टिफिशियल लिम्ब सेंटर में अनुदेशक के पद पर इनकी नियुक्ति हो गयी. पूरे मनोयोग से काम करने का फल यहां भी कमल को मिला, जब इनके काम से खुश होकर विभाग की तरफ से विशेष अध्ययन अवकाश प्रदान किया गया, जिसके बाद इनकी प्रोन्नति अनुदेशक से वरीय अनुदेशक के पद पर हो गयी.
करते हैं हर संभव सहयोग
विकलांग सेवा केंद्र के बारे में बताते हए कमल कहते हैं, दुकान में जरूरत का हर वो सामान रखने की कोशिश करता हूं, जो नि:शक्त लोगों के जीवन से सरोकर रखती है. इसमें नकली पैर, हाथ, कैलिपर, बेल्ट, कॉलर मुख्य है. जब तब नौकरी नहीं लगी थी तो सारा ध्यान दुकान और लोगों की सेवा में रहता था. अब नौकरी लगी है तो दुकान का भार इनके भाई संभालते हैं. जो खुद नि:शक्त हैं. उनके इस काम में आम लोगों के साथ पटना के कई नामी डॉक्टर भी मदद करते हैं. बकौल कमल, डॉ. एसएन आर्या, डॉ. केवल शरण, डॉ. पी के कन्नौजिया जैसे नामी डॉक्टर जरूरतमंदों को मेरे दुकान का पता खुद बता देते हैं. कमल वैसे लोगों को उचित मार्गदर्शन करने के साथ सलाह भी देते हैं, जो किसी भी तरह का ऋण या किसी व्यवसाय को शुरू करने की इच्छा रखते हैं. वह कहते हैं, जो भी मेरे पास आता है, कोशिश यही रहती है कि वह संतुष्ट होकर जाये.
जब तक संभव, मदद करूंगा
सहज व्यवहार और शांत प्रवृत्ति वाले कमल बताते हैं, नौकरी में आने के बाद उतना समय तो नहीं मिल पाता है कि दुकान पर बैठ कर लोगों की सहायता कर सकूं लेकिन जहां तक संभव होता है, मदद करता हूं. वेतन का 80 प्रतिशत हिस्सा सहायता करने में लगा देता हूं. किसी जरूरतमंद को अगर सामान खरीदना होता है तो बिना किसी मुनाफे के वह सामान दे देता हूं. मैंने ये दुकान मुनाफे के लिए नहीं बल्कि अपने जैसों की सुविधा के लिऐ खोली है. वह कहते हैं, मेरा ध्येय बस यही रहता है कि मैं किसी ना किसी रुप में उनकी मदद करु. वह कहते हैं, शरीर से सक्षम नहीं, पर दिमाग और सोच से तो इनके लिए कुछ कर ही सकता हूं. ऊपर वाले की कृपा से मेरे दोनों बच्चे सामान्य हैं. आम लोगों विशेषकर नि:शक्तों की सेवा, सहायता करने को लेकर बिहार सरकार द्वारा सन् 2009 में भारत सरकार के पास पुरस्कृत करने की अनुशंसा भी की गयी थी.
नहीं है कोई शिकवा-शिकायत
पटना में विकलांगों के लिए सामान बेचने वाले कई दुकानें हैं, लेकिन विकलांग के द्वारा विकलांगों के लिए संचालित यह अकेली दुकान हैं. कमल कहते हैं, इतने दिन के जीवन में मेरा किसी से कोई भी गिला-शिकवा नहीं है. हालांकि जीवन में कई तरह के लोग आये. कई तरह की बातों को सुना लेकिन हर बात को अनसुना करते हुए अपने काम में लगा रहा. कई बार कुछ ऐसे शब्द कानों तक पहुंचते थे जिसे सुन कर मन विचलित हो जाता था. अब तो बस उद्देश्य यही है कि ईश्वर की गलती और किसी दुर्घटना के शिकार लोगों की सेवा में पूरा योगदान करु. पहले दुकान में सामान रखने वाले कमल अब स्थानीय स्तर पर सामान भी बनवाने लगे हैं. इसके लिए उन्होंने पांच सहयोगियों को रखा है. वह कहते हैं, दुकान को बिना मुनाफे को चलाता हूं. इसके अलावा अगर कोई निहायत ही असहाय आता है तो इसे रुपया, पैसा देकर भी मदद करने की पूरी कोशिश करता हूं. दुकान के सहयोगियों को वेतन देने की बात पर वो कहते हैं, 80 प्रतिशत हिस्सा तो सेवा कर्म में लग जाता है बाकि बचे पैसों में से घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई के लिये छांट कर जितना भी पैसा बचता है. उसे सहयोगियों में बांट दिया जाता है. कमल कहते हैं, मैं जब इस हालात में ऐसा कर सकता हूं तो मेरी आर्थिक रुप से सक्षम उन लोगों से निवेदन है कि वह इंसानियत के नाते से मदद जरूर करें.
नि:शक्तता को मात देने की सीख देते कमल
सुजीत कुमारईश्वर ने मुङो ऐसा जीवन दिया है. मुङो ना भगवान से शिकायत है और ना ही इंसान से. जैसी जिंदगी रुप, रंग और शरीर मिला है. उसी में खुश रहता हूं. कोशिश भी यही रहती है कि जहां तक हो सके, अपने जैसे लोगों को संतुष्ट कर सकूं. ये कहना है कमल कुमार का. […]
