सामाजिक क्रांति के रास्ते पर शहरी भारत की बेटियां
सूचना तकनीक की क्रांति के युग में समाज तेजी से बदल रहा है. बेटियां भी अब मां-बाप के हाथ की कठपुतली नहीं रहीं. पुरुषों के साथ बेटियां भी कदम-दर-कदम साथ बढ़ना चाहती हैं. उनके लिये भी कैरियर सबसे ऊपर हो चुका है, शादी करके घर बसाने और बच्चे पैदा करने की बातें अब उन्हें दकियानूसी ख्याल लगते हैं. आनेवाले समय में सामाजिक ताने-बाने पर इसका असर जरूर पड़ेगा. मातृत्व पर भारी पड़ते कैरियर पर पढ़ें यह सर्वेक्षण आधारित रिपोर्ट..
तैंतीस वर्षीय सुनयना ओझा मुंबई के एक मल्टीनेशनल बैंक में कॉरपोरेट वकील (लॉयर) हैं और हर समय काम में व्यस्त रहती हैं. उनके पास न शादी के लिए सोचने का वक्त है, न बच्चों के लिए. वे कहती हैं, मैं 36 की होने से पहले शादी और बच्चों के बारे में सोच भी नहीं सकती. सुनयना को भविष्य को लेकर कोई हड़बड़ी नहीं है. फिर भी उन्होंने दो चीजों की योजना तैयार कर ली है – पैसे और मातृत्व की सुरक्षा. शादी के बाद बिना किसी परेशानी के मां बनने के सुख के लिए उन्होंने अपने एग्स फ्रीज करवा लिये हैं.
सुनयना के मुताबिक, एक आजाद लड़की को जीवन में एक बार इस दुविधा से गुजरना होता है कि वह कैरियर या मातृत्व में से किसे चुने. मुङो एक को चुनने के लिए दूसरे की बलि नहीं देनी थी. लिहाजा जहां मैं कैरियर पर ध्यान दे रही हूं, वहीं अपने एग्स भी फ्रीज करवा लिये हैं, जिससे 40 की उम्र में भी मैं मां बन सकूं .
इसे स्त्रीवादी आदर्शो का बढ़ता प्रभाव कहें या फिर आर्थिक स्वावलंबन के नये औजार, लेकिन हकीकत यही है कि आज देशभर में ऐसी आधुनिक शहरी महिलाओं की तादाद बढ़ती जा रही है, जो मातृत्व से ज्यादा कैरियर को तवज्जो दे रही हैं. इंडियन काउंसिल फॉर मार्केट रिसर्च द्वारा हाल ही में चार महानगरों और बेंगलुरु में 18 साल से ज्यादा उम्र वाले युवाओं के बीच कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार, 73 फीसदी से ज्यादा लोगों ने माना कि बच्चे उनकी आजादी की राह में रोड़ा हैं. 87 फीसदी ने कहा कि उनकी निकट भविष्य में बच्चे पैदा करने की कोई योजना नहीं है.
मातृत्व की सुरक्षा : इस तरीके को अपनाने और ऐसा सोचने वाली सुनयना अकेली नहीं हैं. माना जाता है कि हॉलीवुड अदाकारा जेनिफर एनिस्टन ने भी अपने एग्स फ्रीज करवाये हैं. एक रियलिटी टीवी शो, कीपिंग अप विथ द कार्डेशियंस की सोशलाइट किम को अपने एग फ्रीज करने की तैयारी के लिए हार्मोन का इंजेक्शन लेते हुए पूरी दुनिया ने देखा था. आइवीएफ विशेषज्ञ डॉ मालपानी कहती हैं, यह तरीका बच्चे को जन्म देने की सही उम्र और सामाजिक-आर्थिक नजरिये से बच्चे पैदा करने की उम्र के बीच बढ़ते अंतर को पाटने में मदद करता है.
पश्चिम की तुलना में भारत में यह बात अब भी शुरुआती दौर में है, लेकिन कुछ सालों में इसमें 20-25 फीसदी का इजाफा हो सकता है. उनमें भी अकेली महिलाओं की संख्या ज्यादा है.
सही समय पर करें फ्रीज
उम्र बढ़ने के साथ-साथ अंडाणु की संख्या घटती है और वे उतने स्वस्थ भी नहीं रहते. अंडाणु सहेजने की सबसे उपयुक्त उम्र 20-30 (आदर्श तौर पर 35 से पहले) है. महिला की उम्र जितनी कम होगी, मां बनने की संभावना उतनी अधिक होगी, लेकिन अंडाणु फ्रीज करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी न होने के कारण महिलाएं इस विकल्प के बारे में बहुत देर से सोचती हैं. हाल के आंकड़े इस बात की तसदीक करते हैं कि एग फ्रीजिंग अपनानेवाली महिलाओं की औसत उम्र 38 वर्ष तक होती है और तब उनके मां बनने की संभावना काफी कम हो चुकी होती है.
क्या है एग बैंकिंग प्रक्रिया
एग फ्रीजिंग में अंडाणु का संरक्षण किया जाता है. इसमें अंडाणुओं को फ्रीज कर स्टोर कर दिया जाता है. इसे एग बैंकिंग भी कहा जाता है. इसे संरक्षित करने का सबसे अच्छा समय 35 साल की उम्र के पहले होता है क्योंकि कम उम्र के अंडाणु स्वस्थ होते हैं. इसकी प्रक्रिया वैसी ही है जैसी आइवीएफ की रहती है. इसके लिए कुछ दिनों तक हॉर्मोनल इंजेक्शन लेने होते हैं.
इससे ज्यादा अंडाणु बन पाते हैं. इसके बाद इनको निकाल लिया जाता है. इसे निकालने के लिए अल्ट्रासाउंड गाइडेड नीडिल का प्रयोग किया जाता है. निकालते ही अंडो को फ्रीज कर दिया जाता है. इनको कई वर्षो तक संभाल कर रख सकते हैं. हाल ही में रैपिड फ्रीजिंग तकनीक भी विकसित हुई है. इसे विट्रिफिकेशन भी कहा जाता है. इसमें अंडाणुओं को संरक्षित करने में आइस क्रिस्टल का फॉर्मेशन नहीं होता है. इससे ये सालों तक सुरक्षित रहते हैं. अध्ययन बताते हैं कि फ्रीज किये हुए अंडाणुओं को वेट्रिफिकेशन के बाद गरम कर फर्टिलाइज करते हैं.
दुनिया में पहली बार
विश्व में पहली बार फ्रोजन अंडाणुओं से गर्भधारण 1986 में हुआ था. दुनिया में अब तक इस तकनीक से 1000 से ज्यादा बच्चे जन्म ले चुके हैं. इस तकनीक से अब तक किसी भी माताओं को किसी तरह का कोई खतरा या बच्चों को कोई परेशानी नहीं हुई है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इसके दुष्प्रभाव भी देखने को मिले हैं.
