Raksha Bandhan Movie Review: मेलोड्रामा और मसखरेपन का ओवरडोज है रक्षाबंधन

फ़िल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक के रहने वाले केदार(अक्षय कुमार) की है. जिसकी गोलगप्पे की दुकान है. 80 के दशक की फिल्मों की तरह उसने अपनी मरती मां को वचन दिया है कि वह चारों बहनों की शादी करने के बाद ही अपनी शादी करेगा. उसकी प्रेमिका सपना भी उसके साथ शादी के इंतज़ार में बैठी है.

फ़िल्म-रक्षा बंधन

निर्माता-कलर येल्लो फिल्म्स

निर्देशक-आनंद एल राय

कलाकार- अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर,सादिया ख़तीब, दीपिका खन्ना, शाहजमीं,स्मृति और अन्य

रेटिंग-दो

फ़िल्म के एक दृश्य में एक संवाद है कि जो भी लड़का इस मोहल्ले में किसी लड़की को छेड़ेगा, उस लड़के को उस लड़की के साथ शादी करनी पड़ेगी. यह संवाद फ़िल्म के नायक के हैं . कमाल की बात है कि यह 70 या 80 के बैकड्रॉप पर बनी फिल्म नहीं है यह आज के समय की फ़िल्म है. फ़िल्म से जुड़े मेकर्स यह दलील दे सकते हैं कि यह फ़िल्म दहेज जैसे अहम मुद्दे पर संदेश देती है ,लेकिन जिस तरह से फ़िल्म का ट्रीटमेंट और स्क्रीनप्ले है वह इस मुद्दे को ना सिर्फ हल्का कर गया बल्कि महिला पात्रों को बहुत कमज़ोर बना गया है. कुलमिलाकर मामला रक्षा में हत्या वाला हो गया है. संजीदा विषय वाली इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले और किरदार बेहद असंवेदनशील हैं.

मेलोड्रामा और मसखरेपन का ओवरडोज है कहानी

फ़िल्म की कहानी दिल्ली के चांदनी चौक के रहने वाले केदार(अक्षय कुमार) की है. जिसकी गोलगप्पे की दुकान है. 80 के दशक की फिल्मों की तरह उसने अपनी मरती मां को वचन दिया है कि वह चारों बहनों की शादी करने के बाद ही अपनी शादी करेगा. उसकी प्रेमिका सपना (भूमि पेंडेकर) भी उसके साथ शादी के इंतज़ार में बैठी है.

फ़िल्म की सारी लड़कियों की ज़िंदगी का मकसद सिर्फ शादी ही है और यह शादी आसान भी नहीं है, क्योंकि अपनी बहनों की शादी के लिए केदार को ढेर सारे दहेज की ज़रूरत है. बाप-दादाओं के लिए अजीबोगरीब लिए कर्ज के लोन को वह अब तक चुका रहा है.उसपर इतना दहेज कैसे जमा पाएगा. क्या अक्षय अपनी बहनों के लिए दहेज इकट्ठा कर पाएगा.यही मेलोड्रामा से भरी फ़िल्म की कहानी है. फ़िल्म की कहानी दहेज जैसे मुद्दे पर चोट करने के लिए बनायी गयी है लेकिन फ़िल्म में यह मुद्दा उस तरह से प्रभावी बन नहीं पाया है .इंटरवल के बाद उम्मीद जगी थी लेकिन सबकुछ मेलोड्रामा और मसखरेपन में ही खत्म हो गया.

आमतौर पर निर्देशक आनंद एल राय की फिल्मों में महिला पात्र बहुत सशक्त होती हैं, लेकिन इस फ़िल्म में उन्हें हर दूसरे दृश्य में कमतर महसूस करवाया गया है. मोटापे, उनके रंग से लेकर उनके कपड़े पहनने के ढंग तक सभी का मज़ाक बनाया गया है. सबसे बुरा पहलू ये है कि एक वक्त पर इन लड़कियों को भी ये लगने लगता है कि यह उनकी खामी है और ये इस पर काम करेंगी. आखिर के कुछ दृश्यों में ही महिला सशक्तिकरण सही ढंग से परदे पर आ पाया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

अभिनय है औसत

अक्षय कुमार अभिनय में अपने चित परिचित अंदाज़ में ही नज़र आए हैं. इमोशनल दृश्यों में वह जमे हैं जबकि कॉमेडी में इस बार वह बहुत लाउड हो गए हैं.फ़िल्म में उनका लुक भी उनके साथ इस बार भी न्याय नहीं कर पाया हिमउनकी मूंछे इस फ़िल्म के भी कई दृश्यों में अजीबोगरोब सी लगती है.दाढ़ी में सफेद बाल है लेकिन मूंछे एकदम काली क्योंकि वो नकली हैं.पूरी फिल्म अक्षय कुमार की है.बाकी के किरदारों को गढ़ने में ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया है.जिस वजह से वह स्क्रीन पर ज़्यादा छाप नहीं छोड़ पाए हैं .

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तकनीकी पक्ष की खामियां और खूबियां

फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.दिल्ली के चांदनी चौक के सेट को बखूबी गढ़ा गया है. गीत-संगीत औसत है तो फ़िल्म के संवाद बहुत ज़्यादा रिग्रेसिव हैं.

देखें या ना देखें

अगर आपकी पसंद 80 के दशक की मैलोड्रामा से भरी पारिवारिक फिल्में रही हैं,तो यह फ़िल्म आपको पसंद आ सकती है.

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लेखक के बारे में

Author: कोरी

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