Jubilee Review: सिनेमा के सुनहरे दौर को जीवंत करती है विक्रमादित्य की जुबली...चमके अपारशक्ति और सिद्धांत

Jubilee Review: जुबली शब्द सिनेमा के लिए बीते दौर की बात हो चुकी है। इसी बीते दौर के शब्द के साथ निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी ने भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर को अपनी सीरीज जुबली से जीवंत कर दिया हैं. 50 का दौर जिसे सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा जाता है

वेब सीरीज – जुबली

निर्देशक – विक्रमादित्य मोटवानी

कलाकार – प्रोसेनजीत चटर्जी, अपारशक्ति खुराना, अदिति राव हैदरी, वामिका गब्बी, सिद्धांत, राम कपूर, नंदीश सिंह संधू, श्वेता बसु प्रसाद, अरुण गोविल और अन्य

प्लेटफार्म -अमेजॉन प्राइम वीडियो

रेटिंग – साढ़े तीन

जुबली शब्द सिनेमा के लिए बीते दौर की बात हो चुकी है। इसी बीते दौर के शब्द के साथ निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी ने भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर को अपनी सीरीज जुबली से जीवंत कर दिया हैं. 50 का दौर जिसे सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा जाता है, क्योंकि सिनेमा की विकास यात्रा यही से शुरू होती है. सिनेमा के चकाचौंध ही नहीं उसके अंधेरे को भी यह सीरीज बखूबी उजागर करती है, जिसमें लालच, स्वार्थ,मक्कारी,मौकापरस्ती, साजिशें भी शामिल है. जिस डिटेलिंग के साथ परदे पर कहानी को साकार किया गया वह इस सीरीज को खास बना गया है.

कहानी आधी हकीकत आधा फ़साना

विक्रमादित्य मोटावानी की इस सीरीज की कहानी आधी हकीकत आधा फ़साना है. हिंदी सिनेमा में अगर आपकी दिलचस्पी है, तो भारत की पहली महिला सुपरस्टार देविका रानी, निर्माता पति हिमांशु रॉय और उनके प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कम्पनी बॉम्बे टॉकीज से आप परिचित होंगे ही और देविका रानी और अभिनेता नज्म उल हसन की प्रेम कहानी भी आपसे छिपी नहीं होगी. यह हकीकत हिमांशु रॉय तक ज़ब पहुंचा था, तो उन्होने नज्म उल हसन को बॉम्बे टॉकीज से निकालकर अपने लैब अस्सिटेंट कुमुद गांगुली यानि अशोक कुमार को रातों रात बॉम्बे टॉकीज का स्टार बना दिया था.

इस सीरीज की मूल कहानी का बीज इसी से प्रेरित है, हां सिनेमा की कहानी है, तो सिनेमाई लिबर्टी भी जमकर ली गयी है. सिनेमाई लिबर्टी वाली इस कहानी मे लैब असिस्टेंट बिनोद कुमार ( अपारशक्ति खुराना ) की यह कहानी है. उसकी अपनी महत्वकाक्षाएं हैं, वह खुद को रॉय टॉकीज का अगला सुपरस्टार मदन कुमार के तौर पर देखना चाहता है. इसके लिए वह चलाकियों से लेकर चालबाजियों तक करने से हिचकता नहीं है, लेकिन वह रॉय टॉकीज के मालिक श्रीकांत रॉय (प्रोसेनजीत ) का वफादार भी है. इसी बीच रॉय उसे अपनी अभिनेत्री पत्नी सुमित्रा देवी (अदिति ) और रॉय टॉकीज के होने वाले अगले सुपरस्टार मदन कुमार (नंदिश संधू ) के अफेयर के बारे में बताता है और जानकारी देता है कि वह दोनों देश छोड़कर भागने वाले हैं. लखनऊ से मुंबई वापस उन्हें लाने की जिम्मेदारी बिनोद कुमार को मिलती है, बिनोद सिर्फ सुमित्रा को वापस ला पाता है और हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि रॉय,बिनोद को ही रॉय टॉकीज का अगला मदन कुमार बना देते हैं.

बदले की आग में जल रही सुमित्रा का अब सिर्फ एक ही सपना है मदन कुमार यानि बिनोद कुमार की बर्बादी. इसके लिए वह रॉय टॉकीज को भी तबाह कर सकती है. इन सबके बीच कहानी का दो सिरा और भी है. लखनऊ की एक तवायफ नीलोफर (वामिका गब्बी) मुंबई आकर फिल्मों में किस्मत आजमाने की तैयारी में है, तो वहीं करांची के मशहूर थिएटर कम्पनी से ताल्लुक रखने वाले जय खन्ना (सिद्धांत) को आजादी के बाद हुए हिंसा ने मुंबई में शराणार्थी बना दिया है,लेकिन उसके के ख्वाबों की मंजिल भी सिनेमा में ही है. क्या रॉय टॉकीज से जुड़कर इनके सपने सच होंगे या ये कोई और राह अपनाएंगे. क्या होगा सुमित्रा के बदले का और बिनोद कुमार के सच का. यही सीरीज की आगे की कहानी है. इसके साथ ही सरकार अपने हित के लिए किस तरह से सिनेमा का इस्तेमाल करना चाहती है. यह भी इस सीरीज में दिखाया गया है, जो आज भी प्रासंगिक लगता है और आजादी के बाद भारत के रेडियो और फिल्मों का इस्तेमाल रूस और अमेरिका अपने फायदों के लिए करना चाहता था. यह सीरीज उस पर भी रोशनी डालती हैं. यह सीरीज सिनेमा के चकाचौंध के साथ – साथ बंटवारे के बाद हुईं त्रासदी को भी सामने लेकर आती है.

स्क्रिप्ट में ढेरों हैं खूबियां

इस सीरीज की कहानी को विक्रमादित्य ने अतुल सबर वाल और सौमिक सेन ने लिखा है. पहले पांच एपिसोड में जिस तरह के उतार -चढ़ाव से कहानी आगे बढ़ती है. वह पूरी तरह से आपको बांधे रखता है. अब आगे क्या होगा. यह सवाल लगातार बना रहता है, जो लेखन टीम की जीत है. इस सीरीज का हर किरदार ग्रे है, जो इस सीरीज को हकीकत से और जोड़ देता है. इसके साथ ही हर किरदार को बखूबी गढा गया है और उन्हें स्क्रीनप्ले में भी पूरा मौका दिया गया है. इसके साथ ही लेखन टीम ने सीरीज में सिनेमा के विकास की यात्रा को बखूबी जोड़ा गया है. प्लेबैक सिंगिंग इसी का एक अहम हिस्सा थी.

थोड़ी बहुत चूक भी है

सीरीज के पांच एपिसोड के आधार पर खामियों की बात करें, तो सीरीज में अब तक पांच एपिसोड दिखाए जा चुके हैं और आखिर के पांच एपिसोड अगले शुक्रवार को दस्तक देंगे. ऐसे में यह सवाल जेहन में आ ही जाता है, जो सवाल अब तक के एपिसोडस सामने लेकर आयी है, क्या उन सबके जवाब यह सीरीज अपने बचे हुए एपिसोड में दे पाएगी या फिर कह सकते हैं कि न्याय कर पाएगी. कहीं आनन -फानन में निपटा देने वाला मामला तो नहीं होगा, क्योंकि जिस तरह से अब तक कहानी को दिखाया गया है. यह जल्दीबाजी में निपटा देने वाली सीरीज नहीं है, बल्कि इत्मीनान से बैठकर हर दृश्य के साथ जुड़ने वाली सीरीज है. इसके अलावा सीरीज से जुड़ी खामियों की बात करें तो यह बात भी अखरती है कि कहानी को 5-5 एपिसोड में बाँटा गया है, अगले शुक्रवार को अब आगे की कहानी के लिए रुकना पड़ेगा. बिंज वॉच करने वाले दर्शकों को यह बात थोड़ी अखर सकती है. एक और बात जो इस सीरीज से जुड़ी अखरती है कि जिस तरह से संवाद में गालियों का जमकर इस्तेमाल हुआ है. क्या 40 के दशक में गालियां इतने धड़ल्ले से बोलना आम था, हालांकि गालियों को नज़रअंदाज करें तो फिल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं. वह किरदारों और उनसे जुड़े हालातों को बखूबी सामने लेकर आते हैं.

चमके हैं अपारशक्ति खुराना और सिद्धांत गुप्ता

अभिनय की बात करें तो इस सीरीज की कास्टिंग इसकी यूएसपी है, लेकिन इस कमाल की कास्टिंग में अपारशक्ति खुराना और सिद्धांत गुप्ता चमके हैं. दोनों ने यादगार परफॉरमेंस दी है. अपने किरदार से जुड़े हर शेड्स को उन्होने बखूबी जिया है. इस सीरीज में उनदोनों के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी थी और इस जिम्मेदारी पर दोनों खरे उतरे हैं. प्रोसेनजीत चटर्जी रॉय बाबू के किरदार में अपने अनुभव से छाप छोड़ते हैं, तो वामिका गब्बी की मौजूदगी सीरीज में हर पल एक नया रंग भरती है. अदिति रॉय हैदरी के लिए शुरुआत के पांच एपिसोड में करने को कुछ खास नहीं था, लेकिन वह अपने हिस्से की भूमिका को बखूबी निभा गयी हैं. राम कपूर भी अपनी भूमिका में जमे हैं. अरुण गोविल को एक अरसे बाद परदे पर देखना दिलचस्प है. बाकी के किरदारों ने भी अपने -अपने किरदारों के साथ न्याय किया है.

तकनीकी पक्ष भी है सुपरहिट

यह सीरीज 40 के मध्य के दशक को परदे पर उतारती है. जिस डिटेलिंग के साथ परदे पर उस दौर को उकेरा गया है. उसके लिए मेकर्स की जितनी तारीफ की जाए कम है. कपड़ों, हेयरस्टाइल से लेकर सेट डिजाइन सभी में बारीकी का ध्यान रखा गया है. विक्रमादित्य मोटवानी के सिनेमा की स्कूलिंग संजय लीला भंसाली की फिल्मों में असिस्टेंट के तौर पर हुईं है. इस सीरीज का क्राफ्ट एक बार फिर इस बात को बयान करता है. इसके लिए आर्ट डायरेक्टर प्रीति और योगेश, कॉस्ट्यूम डिजाइनर श्रुति कपूर और सिनेमाटोग्राफर प्रतीक शाह की भी तारीफ बनती है, जो उन्होने उस दौर को परदे पर अपने काम से साकार कर दिया है. फिल्म के गीत-संगीत में भी उस दौर के एहसास को लिए हुए है, इसके लिए कौसर मुनीर के शब्दों और अमित त्रिवेदी के संगीत शब्दों को श्रेय दिया जाता है. सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक अलोकानंद का है और एडिटिंग से आरती बजाज का नाम जुड़ा है जो इस सीरीज के तकनीकी पक्ष को और उम्दा कर गया है.

देखें या ना देखें

उम्दा अभिनय, बेहतरीन कहानी और लाज़वाब प्रस्तुति की वजह से यह सीरीज सभी को पसंद आएगी.

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लेखक के बारे में

Author: कोरी

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