लोहिया साहित्य के प्रचार-प्रसार में बदरी विशाल पित्ती का अप्रतिम योगदान

डॉ कंजीव लोचन ने कहा कि बगैर ठोस विचारधारा के राजनीति नहीं हो सकती. अगर होती है तो वह समाज के लिए घातक है, क्योंकि जिस तरह कोई भटका हुआ व्यक्ति किसी दूसरे को राह नहीं दिखा सकता उसी प्रकार विचारशून्य राजनीति और दल समाज और देश में बदलाव का वाहक नहीं हो सकता.

समाजवादी कर्मयोगी बदरी विशाल पित्ती की 20वीं पुण्यतिथि पर विश्वविद्यालय इतिहास विभाग में एक परिसंवाद का आयोजन किया गया. डॉ राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली द्वारा इस संगोष्ठी में रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष अभिषेक रंजन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि राममनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन एवं लोहिया साहित्य के प्रकाशन एवं प्रसार में महामना बदरी विशाल पित्ती जी का अप्रतिम योगदान है. डॉ लोहिया की मृत्यु के बाद बदरी विशाल पित्ती जी ने एक मिशनरी भाव से इस कार्य को आगे बढ़ाया.

डॉ कंजीव लोचन ने कहा बगैर ठोस विचारधारा के राजनीति नहीं हो सकती

इस अवसर पर डॉ कंजीव लोचन ने कहा कि बगैर ठोस विचारधारा के राजनीति नहीं हो सकती. अगर होती है तो वह समाज के लिए घातक है, क्योंकि जिस तरह कोई भटका हुआ व्यक्ति किसी दूसरे को राह नहीं दिखा सकता उसी प्रकार विचारशून्य राजनीति और दल समाज और देश में बदलाव का वाहक नहीं हो सकता.

अभिजीत कुमार ने कहा- डॉ लोहिया राजनीति के अग्रणी योद्धा बने रहे

पूरनचंद फाउंडेशन के सचिव अभिजीत कुमार ने कहा कि डॉ लोहिया जीवनपर्यंत वैचारिक राजनीति के अग्रणी योद्धा बने रहे. संसोपा में शामिल नेताओं और कार्यकर्ताओं को जन और मैनकाइंड जैसी पत्रिकाओं से वैचारिक खाद- पानी मिलता था. इसका श्रेय श्री बदरीविशाल पित्ती जी को जाता है. इस परिसंवाद में विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के छात्र-छात्राओं की अच्छी भागीदारी रही. इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ सुजाता सिंह, प्रो कंजीव लोचन, डॉ मोहित कुमार लाल, डॉ राजकुमार, डॉ राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष अभिषेक रंजन सिंह और पूरनचंद फाउंडेशन के सचिव अभिजीत कुमार ने बदरीविशाल पित्ती के जीवनवृत्त पर प्रकाश डाला.

लोहिया साहित्य युवजनों के बीच पहली पसंद बनी

हैदराबाद स्थित डॉ राममनोहर लोहिया समता न्यास द्वारा प्रकाशित लोहिया साहित्य युवजनों के बीच पहली पसंद बनी. तीन वैचारिक पत्रिकाएं – जन, मैनकाइंड और चौखम्भा उस दौर की बेहद लोकप्रिय मैग्जीन थीं. इसके अलावा साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ का प्रकाशन भी बदरी विशाल पित्ती जी करते थे. कल्पना ने तो हिंदी के कई साहित्यकारों को पहचान दी.

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