क्या Wi-Fi राउटर बिना फोन के भी कर सकता है ट्रैक? जर्मन रिसर्च ने उड़ाई इंटरनेट यूजर्स की नींद

जर्मनी की नयी रिसर्च में दावा किया गया है कि Wi-Fi राउटर अब बिना स्मार्टफोन के भी इंसानों की गतिविधियां ट्रैक कर सकते हैं. AI और रेडियो वेव्स आधारित यह तकनीक डिजिटल प्राइवेसी के लिए बड़ा खतरा बन सकती है.

अब तक लोग सोचते थे कि सिर्फ स्मार्टफोन, कैमरा या स्मार्टवॉच ही उनकी लोकेशन और एक्टिविटी ट्रैक कर सकते हैं. लेकिन जर्मनी से आई एक नयी रिसर्च ने डिजिटल प्राइवेसी को लेकर नयी चिंता खड़ी कर दी है. शोधकर्ताओं का दावा है कि अब सामान्य Wi-Fi राउटर भी बिना किसी फोन या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के इंसानों की गतिविधियों को ट्रैक कर सकते हैं. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह तकनीक किसी कैमरे की तरह काम करती है, लेकिन इसमें तस्वीरें रोशनी से नहीं बल्कि रेडियो वेव्स से तैयार होती हैं.

Wi-Fi सिग्नल से कैसे ट्रैक हो सकता है इंसान?

जर्मनी के Karlsruhe Institute of Technology के रिसर्चर्स ने एक खास तकनीक डेवलप की है, जिसे BFID नाम दिया गया है. यह तकनीक Wi-Fi 5 और उससे आगे के स्टैंडर्ड्स में मौजूद Beamforming Feedback Information यानी BFI फीचर का इस्तेमाल करती है.

आमतौर पर यह फीचर Wi-Fi सिग्नल को बेहतर बनाने के लिए दिया जाता है ताकि इंटरनेट स्पीड और कनेक्शन मजबूत रहे. लेकिन यही सिग्नल लगातार हवा में घूमते रहते हैं. जब कोई व्यक्ति कमरे में चलता है या मूव करता है, तो उसके शरीर से इन रेडियो वेव्स में बदलाव आता है. रिसर्चर्स ने दावा किया है कि इन बदलावों को पास में मौजूद कोई भी Wi-Fi डिवाइस रिकॉर्ड कर सकता है.

AI और मशीन लर्निंग से बन रही ‘रेडियो इमेज’

रिसर्च टीम ने AI और मशीन लर्निंग मॉडल्स की मदद से इंसानी मूवमेंट की ‘रेडियो इमेज’ तैयार की. यह तकनीक शरीर की बनावट, चलने के तरीके और मूवमेंट पैटर्न के आधार पर व्यक्ति की पहचान कर सकती है.

टेस्टिंग के दौरान करीब 197 लोगों पर यह सिस्टम आजमाया गया, जिसमें 99.5 प्रतिशत तक सटीक पहचान का दावा किया गया. इसका मतलब यह है कि भविष्य में किसी व्यक्ति को ट्रैक करने के लिए उसके पास मोबाइल फोन या स्मार्ट डिवाइस होना जरूरी नहीं रहेगा.

प्राइवेसी के लिए कितना बड़ा खतरा?

साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तकनीक आने वाले समय में प्राइवेसी के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है. भले ही Wi-Fi सिग्नल सीधे किसी का नाम न बताते हों, लेकिन अगर इन्हें पुराने लोकेशन डेटा, स्मार्टफोन रिकॉर्ड या दूसरे डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम से जोड़ दिया जाए, तो किसी व्यक्ति की पूरी पहचान सामने लाई जा सकती है.

सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को माना जा रहा है जो एक्टिविज्म, पत्रकारिता या संवेदनशील कामों से जुड़े हैं. मॉल, ऑफिस, एयरपोर्ट या पब्लिक स्पेस में लोगों को यह तक पता नहीं चलेगा कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है.

क्या भविष्य में बढ़ेगी डिजिटल निगरानी?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले वर्षों में स्मार्ट डिवाइसेज और AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऐसी टेक्नोलॉजी और ज्यादा एडवांस हो सकती है. अगर Wi-Fi स्टैंडर्ड्स में मजबूत एन्क्रिप्शन और सिक्योरिटी सिस्टम नहीं जोड़े गए, तो यह निगरानी तकनीक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा सकती है.

यही वजह है कि रिसर्चर्स ने ग्लोबल टेक कंपनियों और रेगुलेटर्स से नये Wi-Fi स्टैंडर्ड्स में मजबूत प्राइवेसी प्रोटेक्शन लागू करने की मांग की है.

खुद को कैसे रखें सुरक्षित?

फिलहाल पूरी तरह बचाव आसान नहीं माना जा रहा, लेकिन कुछ सावधानियां मदद कर सकती हैं. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि पब्लिक Wi-Fi नेटवर्क का इस्तेमाल सोच-समझकर करें और हमेशा राउटर का लेटेस्ट फर्मवेयर अपडेट इंस्टॉल रखें.

इसके अलावा घर और ऑफिस में सुरक्षित नेटवर्क सेटिंग्स, मजबूत पासवर्ड और नये सिक्योरिटी प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करना जरूरी हो सकता है.

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Published by: Rajeev Kumar

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