28 फरवरी की सुबह सुर्खियां सिर्फ आसमान में उड़ती मिसाइलों और धमाकों तक सीमित नहीं रहीं. ग्लोबल इंटरनेट मॉनिटरिंग डेटा ने एक और चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई. ईरान की इंटरनेट कनेक्टिविटी अचानक तेज गिरावट के साथ नीचे आ गई. हालात ऐसे हो गए कि देश का बाहरी इंटरनेट ट्रैफिक सामान्य स्तर के सिर्फ 4% पर सिमट गया. आसान शब्दों में कहें तो देश के अंदर-बाहर जाने वाला डेटा लगभग ठप जैसा हो गया था.
क्या कहती है NetBlocks की रिपोर्ट?
रियल-टाइम में साइबर सेफ्टी और इंटरनेट गवर्नेंस पर नजर रखने वाली स्वतंत्र संस्था NetBlocks के अनुसार, उसके नेटवर्क डेटा से साफ संकेत मिलते हैं कि 28 फरवरी को सुबह 07:00 UTC से ईरान में बड़े पैमाने पर इंटरनेट बंदी शुरू हुई. NetBlocks ने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान इस समय लगभग पूर्ण इंटरनेट ब्लैकआउट के दौर से गुजर रहा है. संस्था ने यह भी जोड़ा कि यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई जारी है. यह पैटर्न पिछले साल इजराइल के साथ हुए युद्ध के दौरान अपनाए गए उपायों से मिलता-जुलता है.
क्यों जरूरी होते हैं इंटरनेट ब्लैकआउट?
इंटरनेट ब्लैकआउट की सबसे बड़ी खासियत यही है कि बिना जमीन या आसमान में भारी संसाधन झोंके भी किसी देश की अहम क्षमताओं को कमजोर किया जा सकता है. कम्युनिकेशन सिस्टम, मीडिया ब्रॉडकास्ट, बैंकिंग नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स और सरकारी कमांड चेन सब कुछ काफी हद तक डिजिटल ढांचे पर टिका होता है. जैसे ही सूचना का प्रवाह रुकता है, फैसले लेना और तालमेल बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि आधुनिक युद्ध की रणनीति में सबसे पहले दुश्मन के नेटवर्क को निशाना बनाना एक अहम कदम बन चुका है.
कैसे होता है साइबर वॉरफेयर?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह हमला एक नॉर्मल साइबर अटैक नहीं, बल्कि कई स्तरों पर चलाया गया एक इलेक्ट्रॉनिक ऑपरेशन था. इसमें सरकार और मीडिया की वेबसाइट्स को ठप करने के लिए बड़े पैमाने पर DDoS हमले किए जाते हैं. DDoS हमले में हैकर्स हजारों संक्रमित कंप्यूटरों को एक साथ किसी एक सर्वर पर ट्रैफिक भेजने के लिए इस्तेमाल करते हैं. ट्रैफिक जितना ज्यादा होता है, सर्वर पर दबाव उतना ही बढ़ता जाता है. नतीजा यह होता है कि सर्वर धीमा पड़ सकता है या पूरी तरह ठप हो सकता है.
साथ ही, एविएशन और ऊर्जा जैसे जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क में गहरी सेंध लगाने की कोशिश भी शामिल रही. इतना ही नहीं, GPS, नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिग्नल्स को बाधित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीकों का इस्तेमाल किए जाने की आशंका है. इसके अलावा, ब्रॉडकास्ट हाइजैकिंग की घटना भी सामने आई है.
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