सिलीगुड़ी. स्टेम सेल थेरेपी से आटिज्म जैसी बीमारी का इलाज संभव है. बस जरूरत है समय पर रोग की पहचान और जल्दी से जल्दी चिकित्सा शुरू करने की. यह बातें न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट की उप निदेशक तथा चिकित्सा सेवा प्रमुख डॉ नंदिनी गोकुलचंद्रन ने कही. वहां सिलीगुड़ी में संवाददाताओं से बातचीत कर रही थीं. उन्होंने कहा कि यह एक अजीब तरह की बीमारी होती है.
इसमें बच्चा अपने में ही खोया रहता है. वह या तो गुमशुम रहता है या फिर काफी चंचल होता है. आमतौर पर जन्म के समय से ही बच्चा इस बीमारी से पीड़ित होता है,लेकिन परिवार के लोग इसकी पहचान नहीं कर पाते. कुछ लोग बच्चों के समाज से अलग-थलग पड़ने के डर से भी इस बीमारी को नहीं बता पाते.इसकी वजह से लगातार स्थित बिगड़ती जाती है.
डॉ गोकुलचंद्रन ने कहा कि इसे बीमारी कहना भी सही नहीं है. यह एक प्रकार से न्यूरो समस्या है. इसे मानसिक विकार कहा जा सकता है.अमेरिका में 68 में से एक बच्चा आटिज्म का शिकार होता है. अब भारत में भी इसकी संख्या बढ़ रही है.भारत में अभी यह संख्या 250 बच्चों में एक बच्चे की है.देश में अभी भी इस समस्या को लेकर आमलोगों में जागरूकता की कमी है.इसकी वजह से इस आंकड़े के आने वाले दिनों में और बढ़ने की संभावना है.इसी बात को ध्यान में रखकर वह इनदिनों जागरूकता फैलाने का काम कर रही है. डॉ गोकुलचंद्रन ने आगे कहा कि कल रविवार को जलपाईगुड़ी में ब्लूमिंग डेल स्कूल के सहयोग से एक सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. इस दौरान एक कार्यशाला का भी आयोजन किया गया. जिन बच्चों को इस प्रकार की समस्या है,उनके माता-पिता को कार्यशाला में इस प्रकार के बच्चों के देखरेख की जानकारी दी जायेगी.
धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है अरित्रो
इस संवाददाता सम्मेलने में 12 वर्षीय अरित्रो घोष हाजरा तथा उसकी मां मौसुमी घोष हाजरा ने भी अपने विचार रखे.अरित्रो को बचपन से ही यह समस्या थी. उसकी चिकित्सा न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट में की गयी. अब वह धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है. उसकी मां ने बताया कि वह बचपन से काफी चंचल था.लेकिन वह अपना कोई भी काम नहीं कर पाता था. उसकी समस्या समझ में नहीं आ रही थी.आम बच्चे उसके साथ खेलने से कतराते थे. अब वह धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है.
