रोज सुबह दस बजे से सुबह चार बजे तक वह स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं. शाम को घर लौटकर तृणमूल के पार्टी कार्यालय में कर्मियों के साथ बैठक करती हैं. वर्ष 2011 के चुनाव में वन मानिकचक से जीती थी. बाद में ममता बनर्जी सरकार में वह महिला शिशु एवं समाज कल्याण विभाग की मंत्री बनी. वह कुछ वर्षों तक तृणमूल की जिला अध्यक्ष भी रहीं.
बाद में उन्हें राहत एवं पुनर्वास मंत्री बनाया गया. राजनीति में रहते तथा मंत्री बनने के बाद वह पिछले पांच वर्षों से ‘लीयेन’पर थीं. इसका मतलब होता है काम नहीं तो वेतन नहीं. वह पांच वर्षों तक स्कूल पढ़ाने नहीं गई और राज्य सरकार की ओर से उन्हें वेतन भी नहीं मिला. लेकिन इस बार मानिकचक से ही वह चुनाव हार गई हैं. उसके बाद वह हर रोज स्कूल जाने लगी हैं. यहां उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नेता गनीखान चौधरी के सान्निध्य में उन्होंने राजनीति की शुरूआत की थी. वह चार बार विधायक भी रहीं. वर्ष 2010 में वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुई और ममता बनर्जी ने उन्हें मालदा का जिला अध्यक्ष बना दिया. उसके बाद तृणमूल के टिकट पर 2011 में मानिकचक से चुनाव जीतकर वह पांचवीं बार विधायक बनीं. ममता बनर्जी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह भी दी.
मालदा शहर के 13 नंबर वार्ड स्थित सदर घाट इलाके में सावित्री मित्रा का घर है. उनके घर से पांच सौ मीटर की दूरी पर आरएन दत्त प्राथमिक स्कूल है. वह वर्ष 1983 से स्कूल शिक्षक रही हैं. अभी वह इस प्राथमिक स्कूल की सहायक प्रधान शिक्षिका हैं.
एक पूर्व मंत्री को स्कूल में बच्चों को पढ़ाते देख अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं तथा कर्मचारी काफी खुश हैं. सभी लोग उन्हें ‘दीदीमनी’ कहते हैं. इनका कहना है कि राजनीति में आने के बाद वह आम लोगों की सेवा में जुटी रहीं. चुनाव में हार के बाद अब बच्चों को पढ़ा रही हैं. इस संबंध में सावित्री मित्रा का कहना है कि चुनाव में हार की वजहों को लेकर एक रिपोर्ट उन्होंने पार्टी सुप्रीमो तथा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी है. अब वह नियमित रूप से स्कूल जा रही हैं और बच्चों को पढ़ाना काफी अच्छा लग रहा है. उन्होंने संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि पार्टी के आदर्श को मानकर ही आगे काम करेंगी. उनकी आठ साल की नौकरी अभी बची हुई है. वह बच्चों को पढ़ा कर काफी खुश हैं.
