जान जोखिम में डालकर बहुमंजिली इमारतों को संवारते हैं कोलकाता के दो युवा

रस्सी पर लटक कर काम करने को मजबूर पेट की आग के सामने विवश परिवार के लिए करवा रखा है बीमा सिलीगुड़ी : सिलीगुड़ी मेट्रोपॉलिटन शहर में तब्दील हो चुका है और काफी तेज रफ्तार से बड़े शहरों में शुमार हो रहा है. दिल्ली, कोलकाता के तर्ज पर अब सिलीगुड़ी में भी बहुमंजिली इमारतें दिखाई […]

रस्सी पर लटक कर काम करने को मजबूर
पेट की आग के सामने विवश
परिवार के लिए करवा रखा है बीमा
सिलीगुड़ी : सिलीगुड़ी मेट्रोपॉलिटन शहर में तब्दील हो चुका है और काफी तेज रफ्तार से बड़े शहरों में शुमार हो रहा है. दिल्ली, कोलकाता के तर्ज पर अब सिलीगुड़ी में भी बहुमंजिली इमारतें दिखाई देने लगी है.
इमारतें तो एकबार खड़ी हो जाती हैं. मुश्किल होता है इन बहुमंजिली इमारतों के हमेशा रखरखाव करने की. प्राकृतिक आपदाओं को झेलते-झेलते ये इमारतें कुछ सालों में ही कमजोर पड़ जाती है. इमारतों के कमजोर पड़ने में एक बड़ा अहम कारण है निर्माण में तकनीकि खामियां. प्रमोटर हो या फिर बिल्डर्स अधिक मुनाफे के लिए इमारतों के सही तरीके से निर्माण करने में मापदंडों की अनदेखी करते हैं. नतीजन एक-दो वर्षों में ही इमारतें जवाब देने लगती है. अधिकांशतः इमारतें जगह-जगह से क्रेक करनी शुरू कर देती है.
कभी छज्जा ढहता है तो कभी इमारत के चार-चांद में लगाये गये बड़े-बड़े मोटे ग्लास टूट जाते हैं. कभी-कभी इमारतों को चकाचौंध करनेवाले इलेक्ट्रिक से सुसज्जित सामान ही टूटकर गिर पड़ते हैं. इससे कभी भी कोइ हादसा होने की संभावना बनी रहती है. प्रमोटरों और बिल्डरों की मनमानी कहिये या फिर लापरवाही इन खस्ताहाल इमारतों का मरम्मत करने और वापस संवारने के लिए कुछ युवा अपनी जान जोखिम में डालते हैं. बांस के मचानों के सहारे नहीं, बल्कि रस्सी पर लटक कर ही इन इमारतों पर काम करने को मजबूर हैं. ये युवा पेट की आग के सामने यह जोखिम भरा काम करने को विवश हैं.
ऐसा ही नजारा शनिवार को सिलीगुड़ी के भक्तिनगर थाना के ठीक सामने राष्ट्रीय राजमार्ग पर के किनारे एक कॉमर्शियल इमारत के सामने देखी गयी. दो युवक जान जोखिम में डालकर केवल रस्सी के सहारे इमारत पर इलेक्ट्रिक से सुसज्जित और अंग्रेजी में लिखे बोर्ड बड़े-बड़े अक्षरों की मरम्मत का काम कर रहे थे. केवल रस्सी के सहारे दोनों युवा पूरे जोश में इमारत को वापस चकाचौंध करने का काम कर रहे थे, लेकिन उन्हें काम करते देख रही सैकड़ों आंखें बार-बार पलक झपक रही थी और उनकी धड़कनें समय के साथ तेज हो रही थी. वहीं, किसी के पांव कांप रहे थे. तेज धूप के कारण काम बीच में ही छोड़कर नीचे उतरे दोनों युवक से प्रभात खबर के प्रतिनिधि ने संपर्क किया और उनके इस तरह जोखिम भरे काम करने की वजह जानी. कोलकाता के आगरपाड़ा निवासी संजीव बहादुर व कोलकाता के ही सौदपुर निवासी संजीव विश्वास दोनों ही बहुमंजिलें इमारतों पर केवल रस्सी के सहारे ही काम करते हैं. इस दौरान सुरक्षा का पूरा ख्याल रखते हैं और सावधानी बरतते हैं.
सुरक्षा का पूरा इंतजाम करने के बाद ही रस्सी के सहारे इमारतों पर लटक कर काम करते हैं. इनका कहना है कि पेट की आग शांत करने के लिए जोखिम उठाना मजबूरी है. जान जोखिम में डालकर संजीव बहादुर जहां अपने मां-बाप और बहन का पेट भरता है वहीं, संजीव विश्वास अपनी पत्नी, बच्चा के अलावा बूढ़े हो चले मां-बाप और छोटे भाई-बहन का भरण-पोषण करता है.
यह खतरा भरा काम उन्हें इमारतों का रख-रखाव करनेवाली कंपनियों से मिलता है. दोनों ने ही अपना जीवन बीमा करा रखा है. इसके अलावा कंपनी ने भी उनका दो लाख का बीमा करवा दिया है. एक सवाल पर दोनों की ही आंखें भर आयी और एक जैसा ही जवाब देते हुए कहा कि परिवार की याद तो आती है लेकिन, अपने पेट के साथ-साथ उनके लिए ही इस तरह जान जोखिम में डालकर काम करना हमारी विवशता है.

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