एवरेस्ट अभियान पर सिलीगुड़ी के लोगों ने उठाये सवाल
सिलीगुड़ी: विश्व की सर्वोच्च पर्वत शिखर एवरेस्ट फतह कर ख्याति अर्जित करने की तमन्ना रखने वाले पर्वतारोहियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. पिछले कुछ दिनों के दौरान जिस तरह से एवरेस्ट अभियान के दौरान कइ पर्वतारोहियों की मौत हुयी है उससे ना केवल राज्य सरकार अपितु पर्यावरण प्रमियों को भी झकझोर दिया है.आरोप है […]
सिलीगुड़ी: विश्व की सर्वोच्च पर्वत शिखर एवरेस्ट फतह कर ख्याति अर्जित करने की तमन्ना रखने वाले पर्वतारोहियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. पिछले कुछ दिनों के दौरान जिस तरह से एवरेस्ट अभियान के दौरान कइ पर्वतारोहियों की मौत हुयी है उससे ना केवल राज्य सरकार अपितु पर्यावरण प्रमियों को भी झकझोर दिया है.आरोप है कि पर्वतारोही हिमालय की मर्यादा को रौंद रहे हैं. पर्यावरण से खिलवाड़ करना मंहगा भी साबित हो रहा है. पहले के मुकाबले वर्तमान में एवरेस्ट पर चढ़ने वालों की संख्या काफी बढ़ गयी है. पर्वतारोही की संख्या बढ़ने से वहां भी एंजेसियां पनपने लगी है. शव और गंदगी से वहां का वातावरण भी दूषित हो रहा है. इन सभी विषयों को लेकर सरकार द्वारा समीक्षा करना अत्यंत आवश्यक है.
इस मामले पर जब सिलीगुड़ी में कुछ लोगों से बात की गयी तो उन्होंने बताया कि 20 वर्ष पहले एवरेस्ट पर चढ़ने वालों की संख्या काफी कम होती थी. उस समय पर्वतारोहियों को प्रशिक्षित होना आवश्यक था. इसके अतिरिक्त एवरेस्ट पर चढने के लिये उन्हें कई परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता था. हृदय रोग,अस्थमा तथा अन्य गंभीर रोगों से ग्रसित लोगों को पहाड़ पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती थी. समय के साथ-साथ पर्वतारोहियों की संख्या बढ़ती चली गयी. सरकार की ओर से इस विषय पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया.
अब यह समस्या परवान चढ़ने को है. 20 वर्ष पहले पांच सदस्यों की एक टीम को एवरेस्ट फतह करने के लिये करीब 1 करोड़ का खर्च पड़ता था. जबकि वर्तमान में मात्र 15 से 16 लाख में कोई भी एवरेस्ट पर चढ़ सकता है. पर्वत शिखरों पर चढ़ाई करना कई लोगों का शौक है, जबकि कुछ लोग इसे ख्याति अर्जित करने का एक माध्यम मानने लगे हैं. पर्वतारोहियों के बदलते नजरिये ने पर्वतारोहण का व्यवसायीकरण कर दिया है. इस व्यवसायीकरण ने कुछ एंजेसियो को जन्म दिया है. इस तरह की एजेंसिया मात्र 15 से 20 लाख रूपये में लोगों को एवरेस्ट जैसे पर्वत शिखर पर खड़ा कर देती है. एवरेस्ट फतह के दौरान कई पर्वातारोहियों की मौत भी हो जाती है. इससे एजेंसियो का कुछ फर्क नहीं पड़ता. पर्वातारोहियों की समय सीमा, प्रशिक्षण आदि इन एजेंसियों के लिये कोई मायने नहीं रखता है. रूपये के बदले ये किसी को भी एवरेस्ट पर चढ़ाने को तैयार हैं.
पहले रूपये के इतने बड़े आंकड़े को देखकर ही अधिकांश लोग ठिठक जाते थे. एजेंसियो की वजह से अब यह आंकड़ा काफी नीचे उतर आया है. सोने पर सुहागा यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार पर्वतारोहियों को एवरेस्ट फतह के लिए पांच लाख रूपये मुहैया करा रही है. हांलाकि इसमें शर्त है कि पर्वतारोही बंगाल का रहने वाला होना चाहिए. राज्य की सत्ता में तृणमूल सरकार ने कदम रखते ही इसकी घोषणा कर दी थी. राज्य सरकार के इस फैसले पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं.
पर्वतारोहियों को रूपया मुहैया कराने से पहले सरकार को उनकी उम्र, प्रशिक्षण, क्षमता आदि पर ध्यान देना चाहिए. जबकि ऐसा कुछ किये बिना ही राज्य की तृणमूल सरकार रूपया मुहैया करा रही है. कइ लोगों ने कहा कि सरकार की ओर से मिलने वाली यह सहायता एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ाने वालों की संख्या बढ़ा रही है. भीड़ बढ़ने से इस प्रकृतिक स्तंभ पर विनाश का खतरा मंडराने लगा है. एवरेस्ट फतह करने निकले कई लोगों का शव रास्ते में पड़ा मिलता है. भीड़ बढ़ने से स्वाभाविक रूप से एवरेस्ट के निकट कचरे का अंबार लग रहा है. फलस्वरूप पर्यावरण भी प्रदूषित हो र है. समाज सेवियों व पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि अब सरकार को इसकी समीक्षा करानी चाहिए.विश्व का सर्वोच्च शिखर हिमालय का एवरेस्ट भारत के पड़ोसी देश नेपाल में स्थित है. एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिये नेपाल सरकार 6 लाख रूपये रॉयल्टी वसूलती है. दिन प्रतिदिन पर्वतारोहियों की भीड़ बढ़ने से प्रदूषण फैल रहा है. लेकिन रोयल्टी के चक्कर में नेपाल सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया है. हिमालया नेचर एंड एडवेंचर फांउडेशन (नैफ)के अध्यक्ष अनिमेश बसु ने कहा कि रॉयल्टी के एवज में विश्व के इस धरोहर को नहीं खोया जा सकता. यह बात सच है कि पर्यटन नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन समस्या का समाधान भी जरूरी है. विश्व स्तर पर विचार विमर्श कर समस्या का समाधान आवश्यक है. नेपाल सरकार रॉयल्टी बढ़ाकर पर्वातारोहियों की संख्या सीमित कर सकती है.
क्या कहना है पर्यावरण प्रेमियों का
इस संबध में पर्यावरण प्रेमी राज बसु ने कहा कि दिन प्रतिदिन पर्वतारोहियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. सरकार इस पर लगाम लगाने में अबतक विफल रही है. उन्होंने बताया कि भारत के किसी भी पर्वत शिखर पर चढ़ने के लिये इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन की अनुमति आवश्यक है. जबकि एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिये ऐसी किसी अनुमति की जरूरत नहीं है. पर्वतारोहियों का नजरिया भी बदल गया है. पहले पर्वत का सम्मान किया जाता था जबकि अब व्यक्तिगत सम्मान का ख्याल रखा जा रहा है. इसके अतिरिक्त एवरेस्ट पर पर्वतारोहण का व्यवसायीकरण कर दिया गया है. एजेंसिया 20 लाख रूपये के एवज में किसी को भी एवरेस्ट शिखर पर चढ़ाने को तैयार है. इनके लिये पर्वतारोहियों की उम्र सीमा, रोग, शारीरिक स्थिति और प्रशिक्षण कोई मायने नहीं रखता है. फलस्वरूप एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ रही है. स्वाभाविक रूप से गंदगी भी है. अब तो एवरेस्ट पर प्रदूषण हो रहा है.
क्या कहते हैं अनिमेश बसु : हिमालयान नेचर एंड एडवेचर फाउंडेशन के अध्यक्ष अनिमेश बसु ने कहा कि सरकार को इस पर रोक लगानी चाहिए. पहले एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिये तकरीबन एक करोड़ रूपये की आवश्यकता होती थी. पर्वतारोहण का व्यवसायीकरण कर एजेंसिया मात्र 15 से 20 लाख रूपए में लोगों को एवरेस्ट पर चढ़ा रही है. पर्वतारोहियों की उम्र सीमा, प्रशिक्षण का कोई मोल नहीं है. प्रदूषण के साथ हादसे भी बढ़ रहे हैं.