हार के बाद भी भाजपा ने लगायी ऊंची छलांग

सिलीगुड़ी: इस बार के विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन सिलीगुड़ी महकमा के तीनों सीटों पर पार्टी ने अच्छा-खासा वोट लाकर राजनीतिक पंडितों एवं विरोधियों को हैरान कर दिया है. दार्जिलिंग जिले में विधानसभा की कुल 6 सीटें हैं. इनमें से सिलीगुड़ी महकमा की तीन सीटों […]

सिलीगुड़ी: इस बार के विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा हो, लेकिन सिलीगुड़ी महकमा के तीनों सीटों पर पार्टी ने अच्छा-खासा वोट लाकर राजनीतिक पंडितों एवं विरोधियों को हैरान कर दिया है. दार्जिलिंग जिले में विधानसभा की कुल 6 सीटें हैं.

इनमें से सिलीगुड़ी महकमा की तीन सीटों सिलीगुड़ी, माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी तथा फांसीदेवा सीटों पर भाजपा ने अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, जबकि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की तीन सीटों दार्जिलिंग, कर्सियांग तथा कालिम्पोंग में अपने सहयोगी गोजमुमो के उम्मीदवारों का समर्थन किया था. पहाड़ की तीनों सीटों पर जहां गोजमुमो की जीत हुई, वहीं समतल के तीनों सीटों पर भाजपा ने मत प्रतिशत के मामले में छलांग लगाई है.

सिलीगुड़ी विधानसभा सीट की यदि बात करें, तो भाजपा उम्मीदवार गीता चटर्जी यहां तीसरे स्थान पर रहीं, लेकिन वह 19300 मत पाने में सफल रही. जो कि कुल मतों का 11.46 प्रतिशत है. सिलीगुड़ी सीट से माकपा उम्मीदवार 46.36 प्रतिशत मतों के साथ चुनाव जीतने में सफल रहे हैं. उन्होंने तृणमूल तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार वाइचुंग भुटिया को हराया है. अशोक भट्टाचार्य 78 हजार 54 तथा वाइचुंग भुटिया 63 हजार 982 यानि 38 प्रतिशत मत पाने में सफल रहे. यहां उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार अरुण प्रसाद सरकार की जमानत जब्त हो गई थी. तब वह मात्र 6 हजार 69 वोट पाने में ही सफल रहे थे. उन्हें मात्र चार प्रतिशत मतों से ही संतुष्ट होना पड़ा था. इस बार के चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत में करीब तीन गुणी वृद्धि हुई है और यह बढ़कर 11.46 प्रतिशत हो गया है.

माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी विधानसभा सीट की यदि बात करें, तो यहां भाजपा के मत प्रतिशत में पांच गुणी से भी अधिक वृद्धि हुई है. भाजपा के आनंदमय वर्मन भले ही तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन वह 44 हजार 625 मत पाने में सफल रहे. जो कि वर्ष 2011 के सात हजार 351 मत के मुकाबले काफी अधिक है. 2011 के चुनाव में इस सीट से भाजपा उम्मीदवार असीम सरकार सात हजार 351 मत लेकर चौथे स्थान पर रहे थे. उनसे कहीं अधिक मत केपीपी के अतुल राय लाने में सफ रहे थे. अतुल राय 11906 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे. इस बार के विधानसभा चुनाव में इस सीट से गठबंधन उम्मीदवार कांग्रेस के शंकर मालाकार चुनाव जीते हैं. तृणमूल कांग्रेस के अमर सिन्हा 67 हजार 814 मत लेकर दूसरे स्थान पर रहे हैं. शंकर मालाकार को 86 हजार 444 यानि 41.28 प्रतिशत मत हासिल हुआ है. इसी तरह से सिलीगुड़ी महकमा के एक अन्य सीट फांसीदेवा में भी भाजपा उम्मीदवार दुर्गा मुर्मू ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है. श्री मुर्मू 32 हजार 894 मत पाने में सफल रहे हैं, जो कुल मतदान के 18.14 प्रतिशत है. 2011 के चुनाव के मुकाबले भाजपा के मत प्रतिशत में यहां भी भारी वृद्धि हुई है. तब दिला सैगो पांच हजार 734 मत लाकर चौथे स्थान पर रहे थे. उन्हें मात्र चार प्रतिशत मतों से ही संतोष करना पड़ा था.

इस बार दुर्गा मुर्मू ने करीब चार गुणे से भी अधिक मत हासिल किये हैं. ऐसे इस सीट से 73 हजार 198 वोट लेकर कांग्रेस के सुनील चन्द्र तिरकी चुनाव जीते हैं. तृणमूल कांग्रेस के कारलोस लाकड़ा तीसरे स्थान पर रहे. स्वाभाविक तौर पर भाजपा के इस मत प्रतिशत से जिले के तमाम आला पार्टी नेता तथा समर्थक गदगद हैं. अब भाजपा नेता वर्ष 2021 के चुनाव तैयारी में लग गये हैं. भाजपा नेताओं ने 2021 के चुनाव में सत्ता पर कब्जा करने का दावा किया है. भाजपा के जिला उपाध्यक्ष नंदन दास ने कहा है कि भले ही पार्टी चुनाव हार गई हो, लेकिन उत्तर बंगाल सहित जिस तरह से पूरे राज्य में पार्टी के मत प्रतिशत में वृद्धि हुई है, वह एक शुभ संकेत है.

श्री दास ने कहा कि भाजपा को और भी अधिक सीटें मिलने की उम्मीद थी, लेकिन कांग्रेस तथा वाम मोरचा के गठबंधन से भाजपा को अधिक नुकसान हुआ है. राज्य भर में ऐसे मतदाताओं की संख्या काफी अधिक थी, जो भाजपा को वोट देना चाहते थे. ऐसे मतदाताओं को लग रहा था कि पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती है, इसलिए इन लोगों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया. इस वजह से तृणमूल कांग्रेस के सीटों पर इतनी अधिक वृद्धि हुई है. इस बार के चुनाव में मिले मत प्रतिशत से यह तय हो गया है कि भाजपा राज्य में एक मजबूत ताकत हो गई है. 2021 के चुनाव में लोगों को विकल्प का अभाव नहीं होगा.

तब राज्य के लोग भाजपा को वोट देंगे और राज्य में भाजपा की सरकार बनेगी. श्री दास ने कहा कि पहले 34 वर्षों तक वाम मोरचा के शासनकाल में आम लोगों का दमन एवं उत्पीड़न हुआ. उसके बाद पांच वर्षों तक तृणमूल के शासनकाल में भी आतंक का माहौल कायम रहा. लोग विकल्प की तलाश कर रहे थे. भाजपा कमजोर थी. इसी वजह से लोगों ने एक बार फिर से तृणमूल का समर्थन किया. अगले विधानसभा चुनाव में ऐसी स्थिति नहीं रहेगी.

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