आरोप है कि न तो राज्य की तृणमूल सरकार और न ही पार्टी, उनकी मदद के लिए आगे आयी है. आदिवासी विकास परिषद की ओर से आंदोलन करने के चक्कर में श्री लाकड़ा के ऊपर कई मुकदमे दर्ज हैं. इन मुकदमों की वजह से बीमार स्थिति में भी कोर्ट-कचहरी का चक्कर काटना पड़ता है. उन्हें ब्रेन ट्यूमर की शिकायत है. उनके माथे की दो बार सर्जरी हो गई है, उसके बाद भी कोई लाभ नहीं हुआ है.
इस बीमारी से निजात पाने के लिए उन्हें एक बार और सर्जरी की आवश्यकता है. पैसे की कमी की वजह से वह अपना इलाज नहीं करा पा रहे हैं. इस मुद्दे पर विस्तर पर पड़े श्री लाकड़ा का कहना है कि आदिवासी विकास परिषद की ओर से आंदोलन करना संभवत: उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल थी. उस आंदोलन की वजह से उनके ऊपर कई मुकदमे चल रहे हैं और वह कई महीनों तक जेल की हवा भी खा चुके हैं. घर में ही उनकी केमोथेरेटी चल रही है. हर महीने ही इलाज का पचास हजार रुपये खर्च होता है. श्री लाकड़ा पेशे से शिक्षक हैं. स्कूल नहीं जा पाने की वजह से उन्हें तनख्वाह भी लगभग नहीं के बराबर मिलती है.
ऐसा नहीं है कि उनके इस बीमारी की जानकारी शीर्ष आदिवासी नेताओं को नहीं है. लेकिन सभी मदद करने से कतरा रहे हैं. शुरू में आदिवासी विकास परिषद के नेताओं ने घर आकर उनसे मुलाकात की थी. आज कोई भी मिलने नहीं आता. श्री लाकड़ा की पत्नी कुशा लाकड़ा का कहना है कि आदिवासी समाज के लिए उनके पति ने आंदोलन किया और समाज का कोई भी व्यक्ति आज उनके साथ नहीं है. अगर कहीं से आर्थिक सहायता मिलती, तो उनके पति की जान बच सकती है. इलाके के प्रमुख समाजसेवी संजय कुजूर का कहना है कि आदिवासी विकास परिषद का नाम लोग राजेश लाकड़ा की वजह से ही जानते हैं. उनके आंदोलन की वजह से ही डुवार्स में हिन्दी कॉलेज की स्थापना हुई. करम पूजा में छुट्टी की घोषणा की गई. राजेश लाकड़ा की बदौलत ही तेज कुमार टोप्पो एवं बिरसा तिरकी जैसे नेताओं को पहचान मिली. आज यही नेता राजेश लाकड़ा से दूर भाग रहे हैं. राजेश लाकड़ा के एक पुत्र अनुराग लाकड़ा बिन्नागुड़ी के एक गैर-सरकारी स्कूल में पढ़ाई करता है. श्री लाकड़ा एवं उनकी पत्नी दोनों ही प्राइवेट स्कूल में शिक्षक हैं. उनकी मां भी लकवे की शिकार है. उनकी इलाज में भी काफी रुपये की आवश्यकता पड़ती है. चिकित्सा में इस परिवार की पूरी जमा पूंजी खत्म हो गई है. अब उनके पास सिर्फ घर ही बचा है. घर बेच कर इलाज कराने की वह नहीं सोच रहे हैं.
