42 नंबर वार्ड अंतर्गत पारिजात पथ निवासी गोपाल पाल और जेबा रानी को हर तरह की मूर्ति बनाने का है हुनर
सिलीगुड़ी : हुनर की कोई उम्र नहीं होती है. चाहे जो भी पेशा हो, अगर कलाकार प्रतिभासंपन्न है तो उसकी कलाकारी निखर कर सामने आ ही जाती है. शहर के 42 नंबर वार्ड के पारिजात पथ स्थित अपने मकान में ही एक बुजुर्ग दंपती श्यामा काली की मूर्ति को सजीव स्वरूप देने में व्यस्त हैं. नाम है गोपाल पाल (72) व रेबा रानी पाल (66). उम्र के इस पड़ाव पर भी अपने पुश्तैनी धंधे के अस्तित्व को संजोये रखने की जद्दोजेहद में लगे हुए हैं.
बुजुर्ग दंपती का कहना है कि उन्हें हर देवी-देवताओं की मूर्ति बनाने का हुनर है. हर तरह की छोटी-बड़ी मूर्तियां बनाने में निपुण हैं. लेकिन अब इस ढलती उम्र में बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनाने के लिए शरीर साथ नहीं देता. गोपाल पाल का कहना है कि उन्हें बचपन से ही मूर्तियां बनाने का शौक रहा है. इस उम्र में न चाहते हुए भी इस हुनर के लगाव से अपने-आप को रोक नहीं पा रहे हैं.
मां दुर्गा, श्यामा काली, सरस्वती, गणेश, विश्वकर्मा, मां लक्खी आदि देवी-देवताओं की मूर्ति त्योहार आने से काफी पहले ही बनाना शुरू कर देते हैं. युवाओं के जोश की तरह ही आज भी पति-पत्नी परस्पर आपसी सहयोग व मनोयोग से मूर्तियां बनाते हैं.
विरासत में मिली पेशे को आगे भी बचाये रखने की चिंता इन बुजुर्ग मूर्तिकारों को सता रही है. गोपाल पाल का कहना है कि हमारे बाद इसे संभालने वाला कोई नहीं है. एक लड़का है जितेन पाल पेशे से शिक्षक है. वो पारिजात स्कूल का संचालन करता है. इसके साथ उसे राजनीति का शौक भी है. हमेशा इन्हीं कामों में व्यस्त रहता है. श्री पाल का कहना है कि मूर्ति गढ़ने की हुनर उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय जुरान पाल से बचपन में ही सीख ली थी. वे लोग मूलरूप से कूचबिहार जिले के बक्शीरहाट के रहनेवाले हैं. 40 साल उनकी शादी हुई थी.
उसके बाद वे सिलीगुड़ी आकर बस गये. वहीं गोपाल पाल की धर्मपत्नी रेबा रानी का कहना है कि वह भी बचपन से ही मूर्तियां बनाने में निपुण है. कोलकाता के राजारहाट निवासी स्वर्गीय बनी माधव पाल उसके पिता थे, जिन्होंने मूर्ति बनाना सिखाया था. ज्ञात हो कि शनिवार रात 12 बजे से अमावस्या शुरू होने के साथ श्यामा पूजा भी आरंभ हो जायेगी.
