नागराकाटा : न्यूनतम मजदूरी को लेकर एक तरफ चाय बागानों के श्रमिकों में बेचैनी बढ़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर इसमें लगातार देरी हो रही है. चाय श्रमिकों के संगठनों का ज्वाइंट फोरम भले ही तीन दिन की हड़ताल को सफल बनाने में जुटा हो, पर सरकारी सूत्रों का कहना है कि अगर पूरी प्रक्रिया सुचारु रूप से चले तो भी चाय श्रमिकों को न्यूनतम मजूदरी व्यवस्था के तहत लाने में कम से कम तीन महीने और लगेंगे. श्रम विभाग के सूत्रों के मुताबिक इस पर अचानक से फैसला लेना संभव नहीं है. इसकी एक प्रक्रिया है, जिसे पूरा करना ही होगा.
श्रम विभाग के सूत्रों के मुताबिक, न्यूनतम मजदूरी की प्रक्रिया के तीन चरण हैं. सबसे पहले न्यूनतम मजदूरी संबंधी सलाहकार कमेटी मजदूरी की रकम निर्धारण को लेकर अपना फैसला लेगी. कमेटी की इस सिफारिश को सरकार के पास भेजा जायेगा. इसके बाद प्रस्तावित मजदूरी का सरकारी स्तर पर विश्लेषण किया जायेगा. जरूरत के मुताबिक सरकार संशोधन या बगैर संशोधन के इसे न्यूनतम मजदूरी पर्षद के पास भेजेगी. इस पर्षद के अध्यक्ष श्रम मंत्री खुद होते हैं.
जानकारों के मुताबिक इस काम के लिए कम से कम एक महीना चाहिए. इसके बाद उज्र और आपत्तियों का दौर शुरू होगा. सब पर विचार करने के बाद ही सरकार के शीर्ष स्तर से अंतिम फैसला संभव होगा. अगर विभिन्न आपत्तियों का निवारण समुचित ढंग से नहीं किया गया, तो मामला अदालत में जा सकता है. उदाहरण के लिए, सरकार ने बॉटलीफ फैक्ट्रियों के श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी गजट के जरिये अधिसूचित की थी.
लेकिन मालिक पक्ष अदालत चला गया. नतीजा यह हुआ कि अब भी बॉटलीफ के श्रमिक दो-पक्षीय समझौते के जरिये ही मजदूरी पा रहे हैं.श्रम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि तरह-तरह के मतभेद के चलते अभी मामला पहला चरण ही पार नहीं कर पाया है. इसलिए अगर अब सबकुछ ठीक से चले तो भी कम से कम तीन महीना और लगेगा ही.
