निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटें आर्थिक रूप से लाचार-कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए हैं आरक्षितआरटीआई में पूछे गये सवालों के जवाब से हो रहा शिक्षा विभाग की लापरवाही का खुलासा
शिवशंकर ठाकुर, आसनसोल
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 का घोर उल्लंघन हो रहा है. इस एहसास के साथ बाराबनी इलाके के एक सोशल एक्टिविस्ट ने आरटीआइ का रास्ता पकड़ा. फिर जो सच्चाई सामने आयी, उससे उनके होश उड़ गये. आरटीआइ के तहत जिला शिक्षा विभाग (पश्चिम बर्दवान) से पांच सवाल पूछे गये थे. विभाग ने जवाब में कहा कि ऑफिस के पास इन सवालों से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं. प्रश्नकर्ता एक्टिविस्ट के मुताबिक, विभागीय जवाब से इस बात का पता चलता है कि आरटीई को लेकर प्रशासन कितना सजग है. विभागीय और प्रशासनिक लापरवाही के चलते ही इस एक्ट का उल्लंघन हो रहा है. प्रश्नकर्ता ने अब इसे लेकर कानूनी लड़ाई की बात कही है.
पांच प्रश्नों के जवाब में डीइओ ने जो कहा
जिला शिक्षा अधिकारी (डीइओ) ने आरटीआई के तहत पूछे गये सोशल एक्टिविस्ट बिट्टू शर्मा के पांच सवालों के जवाब देते हुए अपने कार्यक्षेत्र में आने वाले 163 स्कूलों की सूची उपलब्ध करा दी. यह बताते हुए कि ये स्कूल आरटीई के दायरे में हैं. अन्य चार सवालों के जवाब में डीईओ के दफ्तर ने कहा कि उनके पास कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.
एक प्रतिष्ठित स्कूल के प्राचार्य ने जो कहा
भारत, सिंगापुर, नेपाल, यूके, अमेरिका और मॉरीशस आदि देशों में करीब नौ सौ शैक्षणिक संस्थान चलानेवाले एक प्रतिष्ठित संस्थान के एक स्कूल प्रिंसिपल ने कहा कि आरटीई के तहत बच्चों का दाखिला नहीं हो पाता है. वैसे, स्थानीय इलाके से आने वाले कुछ गरीब और मेधाबी बच्चों को अवश्य मौके मिल जाते हैं. उनके आवेदन को स्कूल की स्थानीय प्रबंधन कमेटी (एलएमसी) में पास करवाने के बाद उन्हें निशुल्क पढ़ाई का मौका दिया जाता है.
